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देश का विभाजन और सावरकर…. अध्याय 4, भारत में इस्लामिक सांप्रदायिकता और अंग्रेजी सरकार

भारत में इस्लामिक सांप्रदायिकता और अंग्रेजी सरकार

हिमांशु कुमार नामक गांधीवादी लेखक अपने उपरोक्त लेख में आगे लिखते हैं कि ‘याद रखिये मुस्लिम लीग का गठन हिन्दुओं के खिलाफ नहीं हुआ था। आप मुझे मुस्लिम लीग का कोई स्टेटमेंट हिन्दुओं के खिलाफ दिखा दीजिये, वहीं दूसरी तरफ हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं को संगठित करने के लिए किया गया था। इन हिंदुत्ववादी  संगठनों ने शुरू से ही मुसलमानों के खिलाफ ज़हर और नफरत फैलाना और उन्हें हिन्दुओं से दूर करने का लगातार काम किया, जबकि गांधी लगातार हिन्दुओं और मुसलमानों को जोड़ने और मिलकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल करने के लिए कोशिश कर रहे थे, हिन्दू महासभा के नेता भाई परमानन्द ने 1908 में ही इसकी शुरुआत कर दी थी। भाई परमानंद ने विशेष रूप से उर्दू में ऐसा साहित्य लिखा जिसमें मुख्य रूप से कहा जाता था कि हिंदू ही भारत की सच्ची संतान हैं और मुसलमान बाहरी लोग हैं। सन् 1908 के प्रारंभ में ही उन्होंने विशिष्ट क्षेत्रों में संपूर्ण हिंदू व मुस्लिम आबादी के आदान-प्रदान की योजना प्रस्तुत कर दी थी।’

भारत में इस्लामिक सांप्रदायिकता

इस संदर्भ में इन लेखक महोदय को बताना होगा कि मुस्लिम लीग का जन्म ही हिंदू विरोध को लेकर हुआ था। इसमें अंग्रेजों की पूर्ण सहमति रही थी। इसके अतिरिक्त मुस्लिम लीग भारतीय इतिहास की उस दीर्घकालिक परंपरा की फलश्रुति थी जिसे इतिहास में इस्लामिक सांप्रदायिकता के नाम से जाना जाता है। स्पष्ट है कि भारत में इस्लामिक सांप्रदायिकता 712 में मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से ही आरंभ हो गई थी। प्रत्येक इस्लामिक आक्रांता ने भारत पर आक्रमण करने का अपना उद्देश्य केवल भारत और भारतीयता का विनाश करना सुनिश्चित किया था। यदि उसी परंपरा का निर्वाह मुस्लिम लीग कर रही थी तो कहने की आवश्यकता नहीं कि इसका जन्म ही हिंदू विरोध के लिए हुआ था।
भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के संदर्भ में हमें यह समझना चाहिए कि प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी के विरुद्ध जब जब हमने मोर्चे बनाए या संयुक्त राष्ट्रीय सेना का गठन कर उनका सामना किया, तो वह हमारे राष्ट्रवाद का ही परिचायक था। ऐसी घटनाएं मोहम्मद बिन कासिम के द्वारा 712 ई0 में किए गए आक्रमण के समय से ही अनेक बार घटित हो चुकी थीं। अतः यह कहना की मुस्लिम लीग से पहले हिंदू राष्ट्रवाद का उदय भारत में हो रहा था ,एक मूर्खतापूर्ण वक्तव्य है। हां, इतना अवश्य है कि जब 1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने भारत में मुसलमानों को हिंदुओं का साथ देते हुए देखा तो उन्होंने 1885 में जहां कांग्रेस जैसी ब्रिटिश राज भक्त और चाटुकार संस्था को जन्म दिया, वहीं 1906 में उन्होंने मुस्लिम लीग को इसलिए स्थापित कराया कि वह धीरे-धीरे आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसी राष्ट्रवादी संस्थाओं का दमन करने में अंग्रेजों का साथ दें और भारत की राष्ट्रीय एकता को दुर्बल करने में भी ब्रिटिश सरकार का मोहरा बने। मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों की इसी प्रकार की नीति को समझ कर उसका साथ देने का निर्णय अपने जन्म से भी पूर्व ले लिया था अर्थात इसके जनक रहे मुस्लिम नेताओं ने ब्रिटिश सरकार को ऐसा ही करने का विश्वास दिला कर मुस्लिम लीग की स्थापना की।
सर सैयद अहमद खान केवल मुस्लिम हितों के लिए संघर्ष करने वाले नेता के रूप में उस समय स्थापित हो चुके थे, जिन्हें अपना मोहरा बनाना ब्रिटिश शासकों ने उचित माना। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि ब्रिटिश शासकों ने सर सैयद अहमद खान को ही आगे इसलिए किया था कि उनके भीतर पहले से ही ऐसे परमाणु मौजूद थे जिनसे वे भारत में मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहित कर सकते थे। लॉर्ड कर्जन ने मुस्लिम हितों को हवा देते हुए बंगाल का विभाजन किया था। उस समय लॉर्ड कर्जन कई बार बंगाल के दौरे पर गया था। उसने वहां जाकर मुस्लिमों को बार-बार यह विश्वास दिलाया था कि उनके हितों की रक्षा के लिए ही वह बंगाल का विभाजन कर रहा है। लॉर्ड कर्जन की इस बात को मुस्लिम नेतृत्व ने अपने हितों के अनुकूल समझा, इसलिए उसे अपना पूर्ण समर्थन देने का निर्णय लिया।

लॉर्ड मिंटो की योजना

लॉर्ड मिंटो ने उस समय हिंदू मुस्लिम के बीच की खाई को और चौड़ा करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर अपने निजी सचिव स्मिथ को अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल आर्चीवाल्ड से मिलने के लिए भेजा। इस बैठक में यह बात निश्चित हुई कि मुसलमानों को एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में वायसराय से मिलना चाहिए जो उन्हें बहुत कुछ देने के लिए तैयार हैं। इसी बैठक में मुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देने के हर बिंदु और मुद्दे पर विचार किया गया । मुसलमानों ने अंग्रेजों की इस चाल का भी भरपूर समर्थन किया। इस प्रकार यहां से मुसलमान और अंग्रेज दोनों का साझा शत्रु हिंदू हो गया।आर्चीवाल्ड ने स्मिथ का सुझाव अलीगढ़ कॉलेज के सचिव नवाब मोहसिन-उल-मुल्क को समझाया तो उसकी बांछें खिल गई।
इस प्रस्ताव के परिणाम स्वरूप मुसलमानों ने निर्णय लिया कि वायसराय से होने वाली बैठक में पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की जाएगी। परिणाम स्वरूप नवाब मोहसिन-उल-मुल्क ने 4000 मुसलमानों के हस्ताक्षरयुक्त एक प्रार्थना-पत्र तैयार किया। 35 प्रमुख मुसलमानों के प्रतिनिधिमंडल ने सर आगा खां के नेतृत्व में 1 अक्टूबर, 1906 ई. को वायसराय से शिमला में भेंट की। गांधीवादी उपरोक्त लेखक यदि इस मीटिंग की पड़ताल करें तो उन्हें पता चलेगा कि इसी बैठक में वायसराय के साथ मुसलमानों के इन 35 प्रतिनिधियों ने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की यही प्रक्रिया आगे चलकर पाकिस्तान के रूप में फलीभूत हुई। किसी भी वृक्ष का जन्म किसी बीज से ही हुआ करता है और बीज को भी पहले मिट्टी में मिलना पड़ता है।
जहां तक हिंदू नेतृत्व की बात है तो हिंदू नेतृत्व इस प्रकार की सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की सोच और उसके पीछे की प्रत्येक चाल को समझ कर पहले दिन से उसका विरोध कर रहा था। गांधी और गांधीवादी लोग चाहे इस रणनीति को नहीं समझे पर प्रत्येक वह हिंदूवादी नेता जो क्रांतिकारी उपायों में विश्वास रखता था, इस प्रकार की चालों को पहले दिन से समझ रहा था। वायसराय से मिले इस प्रतिनिधिमंडल ने मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान प्राप्त करने नौकरियों में प्रतियोगी तत्व की समाप्ति करने, प्रत्येक उच्च न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश बनाने ,नगर पालिका में दोनों समुदायों को प्रतिनिधि भेजने की सुविधा प्रदान करने, विधान परिषद के लिए मुस्लिम जमीदारों ,वकीलों, व्यापारियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्य और 5 वर्षों का अनुभव वाले मुस्लिम स्नातकों का एक वर्ग अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने और वायसराय की काउंसिल में भारतीयों की नियुक्ति करने के समय मुसलमानों के हितों का ध्यान रखने की बात उठाई। इसके अतिरिक्त एक मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाने पर भी विचार किया गया।
तब लॉर्ड मिन्टो ने कहा था कि –“मुस्लिम सम्प्रदाय को इस बात से पूर्णतः निश्चित रहना चाहिए कि मेरे द्वारा प्रशासनिक पुनर्संगठन का जो कार्य होगा उसमें उनके अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे।”

मौलाना मोहम्मद अली का वक्तव्य

उपरोक्त गांधीवादी लेखक महोदय को इस संबंध में मौलाना मुहम्मद अली को अवश्य पढ़ना चाहिए । जिन्होंने अंग्रेजों और मुसलमानों के इस खेल पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘ मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल अंग्रेजों के द्वारा बजाई गई बाँसुरी थी। उसमें हिंदू विरोधी लोगों की प्रधानता थी। प्रतिनिधिमंडल की सफलता से मुसलमान अधिक उत्साहित हुए और उधर अंग्रेज़ अधिकारी भी प्रसन्न हो गए। एक अंग्रेज़ अधिकारी ने मिन्टो की पत्नी मेरी मिन्टो को यह सूचित किया कि – ” आज एक बहुत बड़ी बात हुई. आज एक ऐसा कार्य हुआ है, जिसका प्रभाव भारत और उसकी राजनीति पर चिरकाल तक रहेगा। 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है।” तब मेरी मिन्टो ने अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह एक युगांतरकारी घटना है।
मेरी मिंटो का इस प्रकार का कथन यह स्पष्ट करता है कि अंग्रेज इस घटना को लेकर इसलिए उत्साहित और प्रसन्न थे कि वह जो करना चाहते थे, उसमें सफल हो गए थे।
जब अंग्रेजों की पूर्ण कृपा मुस्लिमों पर होती हुई दिखाई दी तो मुस्लिम नेतृत्व के मन में अपना एक संगठन बनाने की
बात आई। मुसलमान अब तक यह भली प्रकार समझ चुके थे कि यदि वह कोई अपना संगठन बनाते हैं तो इससे ना केवल मुसलमानों के हितों की रक्षा हो सकेगी बल्कि हिंदुओं के विरोध में अंग्रेजों की कृपा भी उन्हें प्राप्त होती रहेगी। बात स्पष्ट है कि मुसलमानों ने यहीं से अपनी कीमत वसूलने का मन बना लिया था । उन्होंने समझ लिया था कि यदि हिंदुओं के विरुद्ध जाकर अंग्रेजों से अधिक से अधिक सुविधाएं प्राप्त की जा सकती हैं तो उन्हें लेने में किसी भी प्रकार से परहेज नहीं करना चाहिए। यदि तत्कालीन मुसलमान नेताओं की सोच राष्ट्रवादी होती तो वह स्वार्थ प्रेरित राजनीति न करके राष्ट्रनीति करने पर चिंतन करते।

मुस्लिमों को राजनीति में आने का आमंत्रण

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो ने मुस्लिमों की मानसिकता को समझा और उसने भी अपनी ओर से अभिजात मुसलमानों को भारत की राजनीति में प्रवेश करने का आमंत्रण दिया। मुस्लिम और अंग्रेज दोनों मिलकर संकेतों में ही एक दूसरे की बातों को समझ रहे थे और हिंदू विरोध या राष्ट्रविरोध के किसी भी अवसर को चूकने नहीं देना चाहते थे। मुस्लिमों और अंग्रेजों की इसी चालाकी भरी कपट नीति के चलते अब भारत में मुसलमानों के एक राजनीतिक दल या संगठन की स्थापना की बातें होने लगी थीं। फलस्वरूप अंग्रेजों के संरक्षण में ढाका में मुसलमानों का एक सम्मेलन 30 दिसंबर 1906 को आहूत किया गया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता नवाब बकार-उल-मुल्क द्वारा की गई थी। इसी स्थान पर ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।
अब हिमांशु कुमार जी को इन नवाब वकार-उल-मुल्क के विषय में भी बताते हैं कि नवाब साहब ने अलीगढ़ के विद्यार्थियों की सभा में उस समय कहा था कि “अच्छा यही होगा कि मुसलमान अपने-आपको अंग्रेजों की ऐसी फ़ौज समझें जो ब्रिटिश राज्य के लिए अपना खून बहाने और बलिदान करने के लिए तैयार हों।” नवाब वकार-उल-मुल्क ने कांग्रेस के आन्दोलन में मुसलमानों को भाग नहीं लेने की सलाह दी थी। ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा रखना मुसलमानों का राष्ट्रीय कर्तव्य है।
मुस्लीम लीग का दूसरा अधिवेशन  1907 ई. में कराँची में आहूत किया गया था। इधर-उधर की कई बातों को करने के उपरांत इस अधिवेशन में मुस्लिम लीग के संविधान को अंतिम स्वरूप दिया गया था। जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय मुसलमानों में निष्ठा की भावना पैदा करना और इस योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधारणाओं को दूर करना इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य होगा। मुस्लिम लीग के नेताओं के द्वारा इस प्रकार का वचन दिए जाने पर अंग्रेजों ने भी पुरुष पुलिस का मुस्लिमीकरण करना आरंभ कर दिया था। यह इसलिए किया जा रहा था कि अब अंग्रेज इस बात को लेकर आश्वस्त हो गए थे यदि भारतवर्ष में 1857 को किन्ही कारणों से पुनः दोहराया गया तो इस्लाम को मानने वाले पुलिस के सिपाही और ब्रिटिश राजभक्त मिलकर हिंदुओं का दमन कर सकेंगे।

हिंदुओं का सहयोग करने से पीछे हटी मुस्लिम लीग

इस प्रकार की व्यवस्था से यह स्पष्ट कर दिया गया था कि ब्रिटिश सरकार यह कभी न सोचे कि मुसलमान हिंदुओं के साथ मिलकर देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ेगा । हम अपने समुदाय के लोगों के लिए अधिकारों की मांग करेंगे और उसकी एवज में सरकार का पूर्ण सहयोग और समर्थन करते रहेंगे। यह कहना कि मुस्लिम लीग का जन्म हिंदुओं के विरुद्ध नहीं हुआ था , पूर्णतया गलत है। ऐसा कहकर ये तथाकथित गांधीवादी गांधीजी और गांधीवाद के प्रति देश के लोगों का सम्मान कम करते हैं। इन्हें दीवार पर लिखी इबारत दिखाई नहीं देती।
उपरोक्त लेखक का कहना है कि मुझे आप मुस्लिम लीग की ओर से दी गई एक भी ऐसी स्टेटमेंट दिखा दे जो हिंदुओं के विरोध में हो?
इसके संबंध में लीग के सचिव जकाउल्लाह खान ने मुस्लिम लीग की स्थापना के समय ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘कांग्रेस के साथ हमारी एकता संभव नहीं हो सकती, क्योंकि हमारे और कांग्रेसियों के उद्देश्य एक नहीं। वह प्रतिनिधि सरकार चाहते हैं, मुसलमानों के लिए जिसका मतलब मौत है। वे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा चाहते हैं और इसका मतलब होगा कि मुसलमान सरकारी नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे। इसलिए हम लोगों को (हिंदुओं के साथ) राजनीतिक एकता के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं।’
उस समय अलीगढ़ में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए नवाब वकार- उल- मुल्क ने भी यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘अगर हिंदुस्तान से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई तो उस पर हिंदू राज करेंगे और तब हमारी जिंदगी ,जायदाद और इज्जत पर सदैव खतरा मंडराया करेगा। इस खतरे से बचने के लिए मुसलमानों के लिए एकमात्र उपाय है ,ब्रिटिश हुकूमत जरूर बनी रहे। मुसलमान अपने को ब्रिटिश फौज समझें और ब्रिटिश राज के लिए अपना खून बहाने और अपनी जिंदगी कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहें। आपका नाम बेटे हिंदुस्तान की तारीख में सुनहरे शब्दों में लिखा जाएगा। आने वाली पीढ़ियां आपका एहसान मानेंगी।’

खिलाफत आंदोलन और गांधीजी

स्पष्ट रूप से इस प्रकार के बयान हिंदू विरोध में दिए गए बयान ही थे। गांधीजी के खिलाफत आंदोलन को भुनाते हुए मुसलमानों ने उस समय केरल के मोपला में बड़ी संख्या में हिंदुओं को मौत के घाट उतारा था। जब गांधी जी ने 1922 में अचानक असहयोग आंदोलन रोक दिया तो मुसलमानों को यह बात उचित नहीं लगी। उस समय के मुस्लिम नेताओं ने पूरे देश में घूम घूम कर यह प्रचार किया कि गांधी जी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया है।’मोपला हत्याकांड पर हम अलग से लिख चुके हैं इसलिए उस पर अधिक प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है।
उपरोक्त लेखक का यह मत पूर्णतया निराधार है कि हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं को संगठित करने के लिए किया गया था। इसके स्थान पर सच यह है कि ये संगठन इस्लाम के मूलतत्ववाद अर्थात दारुल हरब और दारुल इस्लाम से पूर्णतया परिचित थे। मुस्लिम नेताओं की सोच और उनके उद्देश्य के प्रति पूर्णत: सजग थे। यही कारण था कि ये संगठन और उनके नेता मुस्लिम लीग और उसके नेताओं पर सदा कड़ी दृष्टि रखते थे।
इस कड़ी दृष्टि को ही गांधीवादी लेखकों ने हिंदूवादी संगठनों की इस्लामिक संगठनों के प्रति ‘शुरू से ही ज़हर और नफरत फैलाने वाली नीति कहकर प्रचारित किया। ऐसे ही गांधीवादी लेखकों ने राष्ट्रवादी संगठनों पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से दूर करने का लगातार काम किया।
यह कहना कि हिन्दू महासभा के नेता भाई परमानन्द ने 1908 में ही मुसलमानों के विरुद्ध हिंदुओं को उकसाने या उग्रवाद की राजनीति आरम्भ कर दी थी, भी पूर्णतया निराधार है। 1908 में मुस्लिम लीग क्या कर रही थी और क्या उसके उद्देश्य थे? – उसे ब्रिटिश शासकों की ओर से किस प्रकार देश के बहुसंख्यक समाज के विरुद्ध प्रयोग किया जाने लगा था? इसको भाई परमानंद जैसे नेताओं ने बड़ी गंभीरता से समझ लिया था। इस सच को समझ कर ही भाई परमानंद ने ‘उर्दू में ऐसा साहित्य लिखा जिसमें मुख्य रूप से कहा जाता था कि हिंदू ही भारत की सच्ची संतान हैं और मुसलमान बाहरी लोग हैं। सन् 1908 के प्रारंभ में ही उन्होंने विशिष्ट क्षेत्रों में संपूर्ण हिंदू व मुस्लिम आबादी के आदान-प्रदान की योजना प्रस्तुत कर दी थी।’
यह भविष्य के संकट को समझ कर लिखा जाने वाला साहित्य था। देश को जगाना और देश के युवाओं को आसन्न खतरे के प्रति सचेत करना प्रत्येक लेखक और देश के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य होता है। निश्चित रूप से भाई परमानंद जी जागरूक करने वाले साहित्य का सृजन कर अपने इसी दायित्व का निर्वाह कर रहे थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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