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धर्म-अध्यात्म

सत्य की खोज*

अष्टावक्र
डॉ डी के गर्ग

पौराणिक कथा: उद्दालक ऋषि ने अपने शिष्य कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्चात् उसके साथ अपनी कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिये बेटे को इस अपमान के लिए श्राप दे दिया कि वो विकंलाग के रुप में जन्म लेगा और उसका शरीर आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा।
एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल में डुबा दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुये कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।
चुंकि श्राप के कारण उसका शरीर आठ जगहों से टेड़ा पैदा हुआ तो उन्हें अष्टावक्र का नाम मिला। बारह साल तक अष्टावक्र ने अपने नाना उद्दालक से शिक्षा ली। ऋषि बंदी से शास्त्रार्थ करने उ वे राजा जनक के दरबार में गए।और ऋषि बंदी को शास्त्रार्थ में हरा दिया। तो परिणाम स्वरूप ऋषि कहोद वापस आए और उन्होंने अपने बेटे अष्टावक्र को श्राप से मुक्त किया। इस प्रकार अष्टावक्र को विकंलागता से मुक्ति मिल गई।
कथा की वास्तविकता का विश्लेषण:
उपरोक्त कथा एक अच्छी तुकबंदी और अवैज्ञानिक है और आज के युग मे ऐसी गप कथायें धर्म के नाम पर परखी जानी चाहिए।
अष्टावक्र नाम का अर्थ केवल शरीर के आठ जगह से मुड़ना का मतलब नहीं हो सकता अन्य भी अर्थ निकल सकते है, जिसने अष्टावक्र का अर्थ शरीर आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) होने की बात कही है ये एक ऋषि का अपमान है और हमारे पूर्वजो का भी। दूसरी बात ये है की जब इस कथानक के अनुसार शाप के बाद शरीर ठीक हो गया तो नया नाम क्या रहा ? और फिर तने मारने या अपंगता का मजाक वाले नाम को जारी क्यों रखा ? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है।
ये पौराणिक कथा एक ऋषि का चरित्र हनन है। ये सभी जानते है की गर्भ में शिशु का निर्माण धीरे धीरे ईश्वर के नियम से होता है और बच्चे को जन्म के समय कुछ नहीं आता, वेद मंत्रो के ज्ञान की बात तो दूर की है।

अष्टावक्र कौन थे और अष्टावक्र का क्या तात्पर्य है ?

अष्टावक्र नाम गुण वाचक है. हमारे देश मे ही अधिकांश नामकरण किसी व्यक्ति के गुणों के आधार पर भी हुए है ,या पुराने नाम बदलकर नए नाम से प्रसिद्द हुए है। इसके अलावा गुणों के कारण उपाधियाँ भी दी गयी है। इतिहास में ऐसे अनेको उदाहरण मिलेंगे जिनमे व्यक्ति का नाम उसके गुणों /योग्यता के कारण जाना गया। इसको भाषा के अनुसार अलंकारिक नामकरण भी कह सकते है।
हम जानते है की पृथ्वी गोल है। और दिशाओं के हिसाब से इसको पहले ४ फिर अतिरिक्त ४ दिशाओं में बांटा गया है।
पूर्व दिशा – इस दिशा से रोज सूर्योदय होता है
पश्चिम दिशा – पश्चिम दिशा में सूर्य अस्त होते हैं
उत्तर दिशा ,दक्षिण दिशा ,उत्तर पूर्व दिशा – उत्तर पूर्व दिशा को ‘ईशान कोण’ भी कहा जाता है, उत्तर पश्चिम दिशा – यह दिशा उत्तर और पश्चिम दिशा की ओर से बना होता है, इसलिए इसे ‘वायव्य कोण’ भी कहा जाता है ,दक्षिण पश्चिम दिशा – दक्षिण दिशा को ‘नेत्रत्य दिशा’ भी कहा जाता है और यह दिशा दक्षिण और पश्चिम के कोण पर बनती है और दक्षिण पूर्व दिशा- इसे ‘आग्नेय कोण’ कहते हैं।
इन ८ दिशाओं का ज्ञान होना जरुरी है ,ज्योतिष शाश्त्र और वास्तु शाश्त्र मूलतः दिशा ज्ञान पर ही आधारित है। प्राचीन काल में आधुनिक यन्त्र नहीं होने पर भी विशाल भवन, मंदिरो का निर्माण हुआ जिंसमे वायु के प्रवाह का ध्यान रखा गया की गर्मी में शीतलता बानी रहे और सर्दियों में उष्णता रहे। कोणार्क का सूर्य मंदिर और दक्षिण के भव्य मंदिर इसी कला ने उदहारण है।
चिकित्सा के क्षेत्र में भी खोज हुई की पूर्व की वायु का निरंतर प्रवाह गठिया /जोड़ो में दर्द देने वाला होता है और पश्चिम के वायु का निरंतर प्रवाह सूखा लाता है। इसी आधार पर हमारा दिशा ज्ञान हमारी मदद करता है कि किस दिशा में पैर करके सोना चाहिए ,घर का द्वार किस दिशा में हो आदि। धुव्रतारा उत्तर दिशा में उदित होता है, इसीलिये दिशा जानने के लिये भी सहायक होता है। और राहगीर वायु प्रवाह , तारो , सूर्य ,चंद्र आदि के द्वारा अपनी मंजिल आसानी से पहुँचते थे।
हमारा देश ऋषि मुनियो का देश रहा है जिन्होंने विश्व की उत्कृष्ट खोजे की जैसे आर्यभट्ट ,चरक ,श्रुश्रुत ,अष्टावक्र आदि।
महाराज अष्टावक्र एक विद्वान ऋषि थे। महाराज अष्टावक्र को इन आठ दिशाओं का विशेष ज्ञान था उन्होंने इस ज्ञान की खोज की ,महाराजा अष्टावक्र अष्ट चक्र की विवेचना जानते थे। अष्ट चक्रों के मूल को जानते थे। इसलिए उन्हें अष्टावक्र भी कहते थे। अष्टावक्र उनका मूल नाम नहीं था। बल्कि उनकी एक उपाधि दी गयी थी। ऋषि अष्टावक्र मूलाधार में पृथ्वी विज्ञान को जानते थे। वह वायु विज्ञान ,अंतरिक्ष विज्ञान को जानते थे ।
अष्टावक्र गीता: अष्टावक्र की मुख्य शिक्षाओ के सकल्प की अष्टावक्र गीता का नाम दिया। ये अष्टावक्र और राजा जनक के बीच का संवाद है, जो हमें जीने की कला सिखाती है। अतः अष्टावक्र ऋषि के विषय में सही ज्ञान ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है।

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