भिंडरावाले की विरासत को मिट्टी में मिलाने वाले ये चेहरे,

Khalistan आंदोलन की निकाल कर रख दी थी हवा

अभिनय आकाश

1940 में वीर सिंह भट्टी ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था। इस आंदोलन के समर्थन में कुछ पर्चियां भी छपवाई थी। फिर कुछ सालों बाद इस आंदोलन को जगजीत सिंह ने ब्रिटेन से इसे ऑपरेट किया।

90 के दशक में खालिस्तानी जब चरम पर थे तो पंजाब के सुपरकॉप ने सड़क पर उतरकर एक-एक खालिस्तानी की कमर तोड़ दी वहीं भारत के जेम्स बॉन्ड ने तो जत्थेदार का रूप धर ऑपरेशन ब्लैक थंडर को सफल बनाया। आज आपको उन्हीं जाबांजों की कहानी से रूबरू करवाएंगे जिन्होंने बिना डरे और बिना अपनी जान की परवाह किए भिंडरावाले की विरासत को मिट्टी में मिलाने वाले केपीएस गिल, जुलियस रिबेरो, के एस बरार और अजीत डोभाल की भूमिका के बारे में बताएंगें। कैसे उन्होंने जमीन पर उतरकर खालिस्तान आंदोलन की हवा निकाल कर रख दी। हाल के सप्ताहों और महीनों में खालिस्तानी समूह भारत और विदेशों दोनों के भीतर अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं। इसकी प्रेरणा स्पष्ट रूप से बाहर से है, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। लेकिन अमृतपाल सिंह के वारिस पंजाब डे के उदय के साथ अब ये पंजाब में भी जोर-शोर से अपने पांव पसार रहा है और हमारे सीमावर्ती राज्य में तबाही मचाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के बाहर, हमारे राजनयिक मिशनों पर हमला किया जा है, जिसमें हाल ही में लंदन और सैन फ्रांसिस्को में भी शामिल है। ऑस्ट्रेलिया और अन्य जगहों पर कई हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की खबर है। वहीं अमृतपाल सिंह की गतिविधियों ने तो पंजाब पुलिस की नाक में दम कर ही रखा है। वैसे तो इन खालिस्तानियों का इतिहास खून से रंगा हुआ है। 1940 उठी मांग आज इतने दशकों बाद भी हूबहू कायम है। 1940 में वीर सिंह भट्टी ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था। इस आंदोलन के समर्थन में कुछ पर्चियां भी छपवाई थी। फिर कुछ सालों बाद इस आंदोलन को जगजीत सिंह ने ब्रिटेन से इसे ऑपरेट किया। लेकिन ये भी इतिहास है कि जब जब खालिस्तानी चरमपंथियों ने सिर उठाने की कोशिश की तब तब पंजाब पुलिस ने उनके फन कुचलने में देर नहीं की।

अमृतपाल सिंह पंजाब की भगवंत मान सरकार और केंद्र के सिर का दर्द बना हुआ है। एक वक्त ऐसे ही जरनैल सिंह भिंडरावाले पंजाब के गले की फांस बना हुआ था। 1980 के दौर में भिंडरावाले ने हिंसा और उग्रवाद की आग लगाई, उसे बुझाते-बुझाते कई पीढ़ियों की कमर टूट गई थी। सैन्यबलों को बुलाए जाने वाली टीम में लेफ्टिनेंट जनरल रंजीत सिंह दयाल, एवं मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार सम्मिलित थे। केएस बरार को चुने जाने की दो वजहें ती। एक तो वे भिंडरावाले के तौर तरीकों को अच्छी तरह से जानते थे। दूसरा वे पूर्व सैन्य अफसर और भिंडरालवाले के अनुचर शाहबेग सिंह के शिष्य थे। वे भिंडरावाले की तरह ही जट्ट सिख थे और उनके ऊपर तत्कालीन सेनाध्यक्ष अरुण श्रीधर वैद्य को काफी विश्वास था। भिंडरावाले की मौत के बाद के एस बरार भी खालिस्तानियों के हिटलिस्ट पर थे, और 2012 में उनपर घातक हमला भी हुआ था।

कुंवर पाल सिंह गिल

इस जाबांज पुलिस अधिकारी ने खालिस्तानियों के मिशन को कई बार अलग-अलग वक्त में धूल में मिलाया। हालांकि उनके ऊपर सैकड़ों सिख युवाओं के एनकाउंटर के आरोप भी लगे। पंजाब के डीजीपी की कमान संभालने वाले केपीएस गिल ने उग्रवादियों के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गई। जरूरत के मुताबिक उग्रवादियों का एनकाउंटर भी करवाया। एक समय ऐसा भी आया जब खालिस्तान समर्थकों के पसीने ही केपीएस गिल का नाम सुनते छूटने लग जाते थे। 90 के दशक में वो पंजाब पुलिस के बीच सुपरकॉप के नाम से मशहूर हो चुके थे। 1985 में जब वे पंजाब आए थे तब राज्य में आतंकवाद चरम पर था। यहां अपने करीब 10 साल के कार्यकाल के दौरान वो आतंकवाद से लड़ते रहे। गिल ने ही मई 1988 में ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ का नेतृत्व किया था। इस अभियान के तहत अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छुपे उग्रवादियों को बाहर निकाला गया था। यह अभियान बेहद सफल रहा था, क्योंकि इस अभियान के दौरान 1984 के सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के मुकाबले गुरूद्वारे को बहुत कम नुकसान पहुंचा था। ऑपरेशन ब्लैक थंडर में करीब 67 सिखों ने आत्मसमर्पण किया था और 43 मारे गये थे।

रिक्शा चलाकर स्वर्ण मंदिर के पास दी खालिस्तानियों के पोजीशन की जानकारी

बात 1988 की है। स्वर्ण मंदिर के पास जहां एक ज़माने में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तूती बोलती थी, वहां अमृतसर के लोगों और ख़ालिस्तानी अलगाववादियों ने एक रिक्शावाले को बहुत तन्मयता से रिक्शा चलाते देखा। वो इस इलाक़े में नया था और देखने में वो ऐसा ही प्रतीत हो रहा था जैसा कि आम रिक्शावाले हुआ करते हैं। लेकिन फिर भी ख़ालिस्तानियों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चला था। स्वर्ण मंदिर की पवित्र दीवारों के आसपास ख़ुफ़ियातंत्र के पैतरों और जवाबी पैतरों के बीच उस रिक्शा वाले को ख़ालिस्तानियों को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उसे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है। रिक्शावाला स्वर्ण मंदिर के अहाते में घुसा और पृथकतावादियों की असली पोज़ीशन और संख्या के बारे में महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारी लेकर बाहर आया। वो रिक्शावाला और कोई और नहीं बल्कि भारत सरकार के वर्तमान सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल थे।

भिंडरावाले से आंख से आंख मिलाने वाले जुलियो रिबेरो

1980 में जब जरनैल सिंह भिंडरावाले की लोकप्रियता चरम पर थी। उसके लाखों अनुयायी एक इशारे पर कुछ भी कर गुजरने पर आपदा थे। उस दौर में भिंडरावाले से आंख से आंख मिलाने वाले पुलिस अधिकारी जुलिया रिबैरो का नाम भी खालिस्तानियों के लिए खौफ का पर्याय बना। 1982 से पंजाब पुलिस में सेवाएं संभालने वाले जुलियो रिबेरो का नाम सुनते ही खालिस्तानियों की हवाईयां उड़ जाती हैं। इंदिरा सरकार के कार्यकाल में चलाए गए खास सैन्य ऑपरेशन में जुलियो रिबेरो की खास भूमिका रही, वो उस वक्त पंजाब पुलिस में डीजीपी थे। स्वर्ण मंदिर में घुसकर सैकड़ों उग्रवादियों को सेना ने ढेर किया। वो अप्रत्यक्ष तौर पर जुलियो रिबेरो का ही मास्टर प्लान था। कहा जाता है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार भले ही सेना के संरक्षण में था लेकिन इसकी पूरी जुलियो रिबेरो से सलाह के साथ ही की गई थी।

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