राष्ट्र भाषा हिन्दी की दुर्गति, भाग-3


भारत में संविधान के अंदर एक दर्जन से भी अधिक भारतीय भाषाओं को मान्यता प्रदान कर दी गयी है। यदि राजभाषा हिंदी अपने सही ढंग से उन्नति करती और उसकी उन्नति पर हमारी सरकारें (केन्द्रीय और प्रांतीय दोनों) ध्यान देतीं तो आज जो क्षेत्रीय भाषाई लोग अपनी-अपनी भाषाओं को भी संवैधानिक स्थान दिलाने की मांग कर रहे हैं-वह नहीं करते। उस परिस्थिति में हिन्दी को जो संघर्ष अपने अस्तित्व के लिए इस समय करना पड़ रहा है-वह न करना पड़ता।
एक अनुमान के अनुसार अकेले भारत में 300 से अधिक बोलियां बोली जाती हैं। वह दिन दूर नहीं-जब हर बोली बोलने वाला समाज भी अपनी-अपनी बोली को संविधान में स्थान दिलाने के लिए लड़ाई लड़ेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि देश के विभिन्न आंचलों से ऐसी आवाजें सुनाई देने भी लगी हैं-जो अपनी बोलियों को भाषा के रूप में संविधान में स्थान दिलाने का संघर्ष करती दिखायी दे रही हैं।
हमारा आशय हिंदी की ऐसी पद प्रतिष्ठा से नहीं है कि वह अन्य भाषाओं को लील जाए। अन्य भाषायें भी रहें-परंतु हिंदी चूंकि भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत से उद्भूत है और 90 प्रतिशत भारतीय उसे समझते हैं, इसलिए हमारे दैनिक कार्यों के निष्पादन और राजकीय प्रयोग की भाषा वह मात्र संविधान के पन्नों में ही न बने-अपितु उससे बाहर भी आये, यही हमारा प्रयास है। यह प्रयास पूर्णत: देशभक्तिपूर्ण प्रयास माना जाना चाहिए। यदि संसार के अन्य देश अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति सजग और सावधान हो सकते हैं तो भारतवासियों को भी ऐसा करने का अधिकार है।
हिन्दी भारत की आत्मा है। इसे अपने हाथों मारना राष्ट्र की हत्या करना है। हिंदी भारत की परंपराओं, आस्थाओं, और मान्यताओं की प्रतीक है, उसकी पावन संस्कृति और समृद्घ सांस्कृतिक धरोहर की प्रतीक है। इसलिए उसका समुचित विकास हमारा राष्ट्रीय कत्र्तव्य है। देखिये वेद का कथन है कि-
‘जनम बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवीं यथौकसम्’ (अथर्ववेद 12-1-45)
अर्थात पृथ्वी पर विभिन्न भाषाओं और संप्रदायों के लोग आपस में एक परिवार के सदस्यों की भांति रहें। इस आदर्श व्यवस्था को हिंदी ही स्थापित करा सकती है, क्योंकि वह संस्कारप्रद भाषा है, और संस्कारों से ही समाज, राष्ट्र और संस्कृति का निर्माण हुआ करता है।
अपनी राष्ट्रोन्नति के लिए इतिहास की भूलों से शिक्षा लेते हुए हम निज भाषा की उन्नति को अपना राष्ट्रीय लक्ष्य बनायें, इसी में हम सबका भला है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में यदि चूक की गयी तो अनर्थ हो जाएगा।
देखिये, महर्षि दयानंद जी महाराज का कथन है कि-‘हिन्दी सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरो सकती है।’ भारतेन्द्र हरिश्चंद्र जी ने भी कहा था-
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।।
प्रतिवर्ष 14 सितंबर को अपनी राष्ट्रभाषा की उन्नति के लिए ‘राष्ट्रीय भाषा हिन्दी दिवस’ मनाकर कार्य करते रहने का संकल्प ले लेना तो मात्र एक नाटक है, पाखण्ड है। वास्तव में व्यवहार में हिन्दी की उन्नति के लिए कार्य किये जाने की आवश्यकता है।
डा. जाकिर हुसैन ने कहा था-
‘हिंदी देश की एकता की कड़ी है।’
पद्मश्री आचार्य क्षेमचंद्र सुमन मानते हैं-
‘कश्मीर से कन्याकुमारी और राजस्थान से सुदूरपूर्वी आंचल में बोली जाने वाली एक मात्र भाषा हिन्दी है, जो सभी भारतीयों को एक सूत्र में जोडऩे की कड़ी का काम करती है।’
इसी प्रकार भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति रहे बी.डी. जत्ती साहब ने कहा था-‘हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जिससे भारतीय संस्कृति सुरक्षित रह सकती है।’
हमें स्मरण रखना चाहिए कि हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है-जिसे संसार के सर्वाधिक लोग समझते, बोलते और लिखते-पढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त संसार की अन्य भाषाएं हिन्दी के समक्ष उसकी वैज्ञानिकता और उसके वैयाकरणिक स्वरूप के कारण भी उसका सामना करने में स्वयं को अक्षम और असमर्थ पाती हैं। अत: प्राणपण से इसकी उन्नति के लिए कार्य करने की आवश्यकता है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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