क्या है हरियाणा और पंजाब को लड़ाने वाली सतलुज यमुना लिंक नहर का सच

अभिनय आकाश

पंजाब-हरियाणा को लड़वाने वाला सतलुज यमुना लिंक नहर क्या है, जिस विवाद का निपटारा अभी तक नहीं हो सका
सतलुज यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) के पानी को लेकर सिद्धू मूसेवाला ने एक गाना बनाया था। इसमें मूसेवाला ने पंजाब के पानी की एक भी बूंद किसी को न देने की बात कही थी। इसे लेकर विवाद इतना बढ़ गया था कि इसके जवाब में हरियाणा के गीतकारों ने भी गीत लिखकर रिलीज कर डाले। गाना थोड़े ही समय में यूट्यूब से हटा भी दिया गया था। मतलब मामला काफी गहमा-गहमी वाला है। दो भाईयों के बीच में पिताजी की जमीन को लेकर झगड़े के बार में आपने अक्सर सुना होगा। वैसे ही हरियाणा और पंजाब को दो भाई मान लीजिए और इनमें पानी को लेकर झगड़ा लंबे समय से चला आ रहा है। जिसमें एसवाईएल सबसे चर्चित और टेंड्रिग टॉपिक है।

शुरुआत नाम से करते हैं यानी सबसे पहले बात सतलुज की करेंगे। पंजाब यानी पांच नदियों का क्षेत्र और इन्ही में से एक नदी का नाम सतलुज है। तिब्बत के मानसरोवर के पास से निकलती हुई ये नदी राकसताल, भाकड़ा से पंजाब में दाखिल होती हुई व्यास से मिल जाती है। जबकि यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना उत्तराखंड, हरियाणा से होते हुए उत्तर प्रदेश के प्रयाग में गंगा से मिल जाती है। बात 1955 की है जिस वक्त हरियाणा राज्य का गठन नहीं हुआ था। तब केंद्र सरकार ने नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर एक बैठक आयोजित की जिसमें राजस्थान, अविभाजित पंजाब और जम्मू कश्मीर राज्य शामिल हुए। अविभाजित पंजाब में तब हिमाचल प्रदेश और हरियाणा भी शामिल थे। बैठक में तय हुआ कि राजस्थान को हर साल 8 एमएएफ (मिलियन एकड़ फुट), अविभाजित पंजाब को 7.20 एमएएफ और जम्मू कश्मीर को 0.65 एमएएफ पानी दिया जाएगा।

दो राज्यों के बीच पानी का बंटवारा

साल 1966 में राज्यों का पुनर्गठन होता है। 1966 में पंजाब से अलग होकर 1 नवंबर को हरियाणा अलग राज्य बना था। दोनों राज्यों ने चंडीगढ़ को अपनी राजधानी के रूप में दावा किया। पंजाब को यहां की संपत्तियों में 60 फीसदी हिस्सा मिला, जबकि ​हरियाणा को 40 फीसदी हिस्सा हाथ लगा। जिसके बाद दोनो राज्यों में पानी को लेकर विवाद शुरु हो जाता है। हरियाणा बनने के एक दशक बाद फिर से केंद्र सरकार की एंट्री होती है। 1976 में केंद्र सरकार की तरफ से एक नया नोटिफिकेशन जारी किया जाता है। इसमें कहा जाता है कि पंजाब को बंटवारे से पहले जो 7.20 एमएएफ पानी मिल रहा था उसमें से 3.5 एमएएफ पानी हरियाणा को दिया जाए। पंजाब की राजनीति में इस दौरान एक परिवर्तन का दौर देखने को मिल रहा था। अकाली दल कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर चुकी थी। 1978 में पंजाब की मांगों पर अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया। इसके मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य सब विषयों पर राज्यों के पास पूर्ण अधिकार हों। इन मांगो के अलावा एक मांग ये भी थी कि पंजाब का पानी पंजाब के हित में ही इस्तेमाल हो।

1981 में एक बार फिर से समझौता हुआ और तय हुआ कि 214 किलोमीटर लंबी एक नहर बनेगी। ये पंजाब में बहने वाली सतलुज और हरियाणा में बहने वाली यमुना को जोड़ने का काम करेगी। इसका 122 किलोमीटर हिस्सा पंजाब में और 92 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में पड़ेगा। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल 1982 को सतलुज यमुना लिंक का उद्घाटन किया। नहर का विरोध होता रहा। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के संत हरचंद सिंह लोंगोवास के बीच समझौता हुआ था। इस समझौता के अनुसार, चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपना तय हुआ। यह समझौता हुआ कि चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी रहेगी और हरियाणा की अलग राजधानी बनाई जाएगी। इसके मुताबिक अगस्त 1986 तक नहर निर्माण का कार्य पूरा किया जाएगा और शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व वाला प्राधिकरण शेष पानी पर पंजाब और हरियाणा की हिस्सेदारी तय करेगा। ट्रिब्यूनल ने पंजाब के पानी के कोटे को बढ़ाने का सुझाव दिया।

पंजाब ने रोका काम

एसएस बरनाला के नेतृत्व वाली अकाली दल सरकार ने 700 करोड़ की लागत से नहर का 90 फीसदी काम पूरा भी किया लेकिन 1990 में सिख उग्रवादियों ने जब दो वरिष्ठ इंजीनियरों और नहर पर काम कर रहे 35 मजदूरों को मार डाला तो इसका निर्माण कार्य बंद कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

साल 1996 में हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की कि पंजाब नहर का निर्माण कार्य पूरा करे। अदालत ने जनवरी 2002 और जून 2004 में नहर के शेष भाग को पूरा करने का आदेश दिया। केंद्र ने साल 2004 में अपनी एक एजेंसी से नहर के निर्माण कार्य को अपने हाथों में लेने को कहा लेकिन एक ही महीने बाद पंजाब विधानसभा ने एक कानून लाकर जल बंटवारे से जुड़े सभी समझौतों को खत्म कर दिया। 2020 में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को केंद्र सरकार की मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया।

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