वैदिक सम्पत्ति : इतिहास, पशुहिंसा और अश्लीलता

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गतांक से आगे …..

(3) वेदों में स्पष्ट उल्लेख है कि मांस जलानेवाली अग्नि यज्ञों में न प्रयुक्त होने पायें मांस जलानेवाली अग्नि बहुत करके चिताग्नि ही होती है । जब वेदों में चिता की अग्नि तक को यज्ञों में लाने का निषेध है, तब मनुष्यमास अथवा पशुमांस से यज्ञ करने की कैसे आज्ञा हो सकती है ? वेद में स्पष्ट लिखा हुआ है कि-

क्रव्यादग्नि प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः ।

इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन् ॥ (ऋ॰ 10/16/9)

यो अग्निः क्रव्यात् प्रविवेश नो गृहमिमं पश्यन्नितरं जातवेदसम् ।

तं हरामि पितृयज्ञाय दूरं स धर्ममिन्वात् परमे सधस्थे ।। (अथर्व० 12/2/7) अर्थात् मैं मांस खानेवाली अग्नि को दूर करता हूँ। वह पाप ढोनेवाली है, इसलिए वह यमराज के घर जावे । यहाँ दूसरी ही अग्नि जो सब की जानी हुई और देवों के लिए हवि ढोनेवाली है, उसे रखता है। जो मांसभक्षक अग्नि तुम लोगों के घरों में प्रवेश करती है, उसको पितृयज्ञ के लिए दूर करता हूँ। तुम्हारे घरों में दूसरी ही अग्नि को देखना चाहता हूँ, वही उत्तम स्थानों में धर्म को प्राप्त हो। इस प्रकार से इन दोनों मंत्रों में बतलाया गया कि. मांस जलाने वाली अग्नि न तो देवयज्ञों में रह सकती है और न पितृयज्ञों में। क्योंकि दोनों घर में ही होते हैं। यहाँ मांस जलानेवाली अग्नि को घर से दूर हटाने का उपदेश है। अतः मालूम हुआ कि मृतकसंस्कार के लिए ही उसे घर से दूर यमराज्य में भेज रहे हैं । मूल संहिताओं के इन मौलिक प्रमाणों से पाया जाता है कि वेदों के अनुसार यज्ञों मैं हिंसा और गोवधादि नहीं हो सकता । यहाँ तक कि मांस जलानेवाली अग्नि भी यज्ञों में नहीं लाई जा सकती । जब वैदिक यज्ञ मांस और हिंसा से इतना परहेज करते है और इन बातों से इतना दूर भागते हैं, तब यही सिद्ध होता है। कि आदिम काल में— संहिताकाल में मांसयज्ञ नहीं होते थे ।

(4) संहिताकाल में मांसयज्ञ न होने का सबसे बड़ा कारण आयों का हिंसा से डरना है। यजुर्वेद में इस प्रकार के वचनांश मिलते हैं, जिनसे सूचित होता है कि वे पशुओं को पालते थे, न कि उनकी हिंसा करते थे।

पशून पाहि, गां मा हिंसी:, अर्जा मा हिंसीः अवि मा हिंसीः,
इमं मा हिसीद्विपादं पशु, मा हिसीरेकशकं पशु, मा हिस्यात् सर्वाभूतानि ।।

अर्थात् पशुओं की रक्षा करो, गाय को मत मारो, बकरी को मत मारो, भेड़ को मत मारो, इस मनुष्य और द्विपद पक्षियों को मत मारो, एक खुरवाले घोड़े, गधे को मत मारो और किसी भी प्राणी को मत मारो । यहाँ पर किसी भी पशुपक्षी के मारने की आज्ञा नहीं है। इतना ही नहीं प्रत्युत स्पष्ट लिखा है कि-

एतद् वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा ममं वा तदेव नाभीयात् ॥( अथर्व०9/6/9)

अर्थात् गाय का यह क्षीर, दधि और घृत ही खानेयोग्य है, मांस नहीं। ऋग्वेद में लिखा है कि-

यः पौरुषेयेण कविया समङ क्ते यो अश्व्येन पशुना दातुचानः ।
यो अध्न्याया भरति क्षोरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृक्ष ।। ( ऋ०10/87/16)

अर्थात् जो राक्षस मनुष्य का, घोड़े का और गाय का मांस खाता हो तथा दूध की चोरी करता हो, उसके शिर कुचल देना चाहिये । अथर्ववेद में लिखा है कि –

यथा मांस यथा सुरा यथाक्षा परिदेवने । यथा पुंसो वृषण्यते स्त्रियं नि हन्यते मनः ॥

अर्थात् मांसाहारी, शराब पीनेवाला और व्यभिचारी एक समान ही मार डालने योग्य है। इन प्रमाणों से सूचित होता है कि वेदों में पशुओं के मारने और उनका मांस खाने की सख्त मनाई है। वैदिक आर्य लोग न तो मांस ही खाते थे और न पशुओं को ही मारते थे। वैदिक काल में मनुष्य मांस नहीं खाता था और न वैदिक काल अर्थात् मनुष्योत्पत्तिकाल में मनुष्य की प्रवृत्ति ही मांस की ओर थी। क्योंकि मांस में न तो कोई स्वाद ही है और न उसको देखकर मनुष्य की रुचि ही हो सकती है। इसलिए मनुष्य आदिम काल में वैदिक काल में मांसाहारी न था। मांसाहारी प्राणियों के साथ मनुष्य की समता ही नहीं है। यह बात निम्नलिखित कारणों से स्पष्ट होती है-

(1) जितने प्राणी मांसाहारी हैं सब जीभ से पानी पीते हैं । (2) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सब अन्धेरे में देखते हैं। (3) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सबके शरीर में पसीना नहीं आता । (4) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सब मैथुन के समय जुड़ जाते हैं। (5) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सबके बच्चों की आँखे पैदा होने के समय बन्द रहती हैं । (6) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सबके दाँत नुकीले और चुभनेवाले होते हैं। (7) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सब की आंतें शरीर के परिमाण से बड़ी होती हैं। (8) जितने प्राणी मांसाहारी हैं सब का मेदा बड़ा होता है। (9) जितने प्रारणी मांसाहारी हैं, सब डरते हैं और (10) जितने प्राणी मांसाहारी हैं, सब भयानक बना- वट के होते हैं । किंतु घास और फलफूल खानेवालों में ये एक भी लक्षण नहीं पाये जाते । मनुष्य में भी ये लक्षण नहीं पाये जाते । इससे ज्ञात होता है कि मनुष्य स्वभाव से मांस खानेवाला नहीं है । उसका मांस का खाना अस्वाभाविक है और बाद का है । किन्तु वेद आदिम कालीन हैं, इसलिए वेदों में पशुवध और मांसाहार की विधि नहीं हो सकती और न संहिताकाल में मांसयज्ञों का ही विधान हो सकता है। आदिम काल में मांसयज्ञों के न होने के कई एक ऐतिहासिक प्रमाण भी उपस्थित हैं। यहाँ हम उनका भी वर्णन कर देना उचित समझते हैं ।
क्रमशः

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