300 साल पुराना ये आइडिया बनाएगा भारत को 5 ट्रिलियन इकोनॉमी वाला देश

क्या है स्मिथ की फ्री मार्केट और इनविजिबल हैंड वाली थ्योरी

अभिनय आकाश

5 ट्रिलियन डॉलर (350 लाख करोड़ रुपये) इकॉनमी देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक लक्ष्य है, जिसे मोदी सरकार ने साकार करने का सपना संजोया हुआ है। अब कहा जा रहा है कि 5 ट्रिलियन की इकॉनमी को के लक्ष्य को 300 साल पुराने आइडिया के जरिये पूरा किया जा सकता है। जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक तौर पर कर चुके हैं।

आज के दौर में भारत एक से बढ़कर एक अविष्कार कर रहा है। भारत अब मॉर्डन भारत बन रहा है। तो आज हम एडम स्मिथ की करेंगे। एडम ने अर्थशास्त्र के उस महीन सूत्र को पकड़ा जिससे आज भी दुनिया की इकोनॉमी संचालित हो रही है। ये सूत्र था मुक्त अर्थव्यवस्था का सिद्धांत। पूंजी के स्वतंत्र प्रवाह का सिद्धांत यानी की सरकारी नियंत्रण से मुक्त निजी कंपनियों को अपने दम पर फलने-फूलने देने थ्योरी। आज नए-नए आइडियाज लाए जा रहे हैं। जिससे की देश और तरक्की करे और मजबूत हो। भारत को किस तरह से 5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाया जा सके। भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार से अभिभूत होकर ग्लोबल रिसर्च एजेंसी मॉर्गन स्टेनली लगातार अपने अनुमानों में तब्दिली करता नजर आया। नवंबर के महीने में मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2027 तक जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। दरअसल, 5 ट्रिलियन डॉलर (350 लाख करोड़ रुपये) इकॉनमी देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक लक्ष्य है, जिसे मोदी सरकार ने साकार करने का सपना संजोया हुआ है। अब कहा जा रहा है कि 5 ट्रिलियन की इकॉनमी को के लक्ष्य को 300 साल पुराने आइडिया के जरिये पूरा किया जा सकता है। जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक तौर पर कर चुके हैं।

ये आइडिया आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक कहे जाने वाले अर्थशास्त्री एडम स्मिथ से जुड़ा है। एडम ने अर्थशास्त्र से जुड़े उस महीन सूत्र को पकड़ा जिससे आज भी दुनिया की इकोनॉमी चल रही है। एडम स्मिथ को फॉदर ऑफ इकनॉमिक्स बोला जाता है। एक ऐसे इंसान जिन्होंने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इकोनॉमिक पहले कोई अलग विषय नहीं हुआ करता था। इकोनॉमिक पहले फिलॉसिफी के अंदर ही पढ़ाया जाता था और इसका खास कोई महत्व नहीं था। लेकिन एडम स्मिथ ने इसके महत्व को दुनिया को बताया। इन्होंने 2 किताबें लिखी हैं जो आज भी मील का पत्थर हैं। 1759 में लिखी थ्योरी ऑफ मॉरल सेंटीमेंट, दूसरी एन इन्क्वायरी इन टू द नेचर एंड कॉसेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशन। स्मिथ की लिखी इन किताबों में मनुष्य के आर्थिक और नैतिक व्यवहार, समाज के साथ उसके अंत: संबंध, तत्कालीन समाज के राजनीतिक दर्शन पर विस्तार से वर्णन मिल जाएगा। लेबर थ्योरी भी इन्होंने दी। लेबर्स को कैसे यूज किया जाए। कैसे प्रोडक्टिव बनाया जाए। एक देश जो कम लागत के साथ किसी विशेष वस्तु का उत्पादन करता है, उसे देश को निर्यात करना चाहिए जहां उसी वस्तु के उत्पादन की लागत अधिक होती है। दूसरा देश अन्य उत्पादों के साथ एहसान वापस करेगा जिसे वो कम लागत पर उत्पादित कर सकता है। इसे निरपेक्ष लाभ का सिद्धांत कहा जाता है।

एडम स्मिथ की फ्री मार्केट थ्योरी

1776 में प्रकाशित हुई एडम स्मिथ की किताब एन इन्क्वायरी इन टू द नेचर एंड कॉसेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशन जिसे वेल्थ ऑफ नेशंस भी कहा जाता है में फ्री मार्केट थ्योरी या मुक्त बाजार का विस्तृत उल्लेख मिलता है। स्मिथ ने मुक्त अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हुए दर्शाया है कि ऐसे दौर में अपने हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है, किस तरह तकनीक का अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है, किस प्रकार एक कल्याणकारी राज्य को धर्मिकता की कसौटी पर कसा जा सकता है और कैसे व्यावसायिक स्पर्धा से समाज को विकास के रास्ते पर ले जाया जा सकाता है। अधिकांश कार्य मानवीय नैतिकता को प्रोत्साहित करने वाला तथा जनकल्याण पर केंद्रित है।

मीट, शराब और ब्रेड जरिए बाजार की क्रिया को समझें

स्मिथ ने अपनी किताब ‘वेल्थ ऑफ नेशन’ में परोपकार और कल्याण की व्याख्या बड़े ही वस्तुनिष्ट ढंग से समझाया है। स्मिथ के अनुसार प्रैक्टिस की कमी के कारण हमारा मानस एकाएक ऐसी मान्यताओं को स्वीकारने को तैयार नहीं होता, हालांकि हमारा आचरण निरंतर उसी ओर इंगित करता रहता है। हमारे अंतर्मन में मौजूद द्वंद्व हमें निरंतर मथते रहते हैं। एक स्थान पर वह लिखते हैं कि केवल धर्म अथवा परोपकार के बल पर आवश्यकताओं की पूर्ति असंभव है। उसके लिए व्यक्तिगत हितों की उपस्थिति भी अनिवार्य है। उन्होंने उदाहरण के लिए बताया कि ‘हमारा भोजन किसी कसाई, शराब परोसने वाले या ब्रेड बेचने वाले की दयालुता की सौगात नहीं है। यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है। दरअसल, ब्रिटेन को भोजन प्राप्त करवाने वाले इन तीनों किरदारों के जरिए स्मिथ ने लोगों को समझाया कि ये उनकी मेहरबानी नहीं बल्कि आर्थिक क्रिया में तीने के ही अपने हित भी छिपे हैं। उनका कहना था कि ब्रेड बेचने वाला हमारी भूख मिटाने के लिए इसे नहीं बेच रहा बल्कि इसके पीछे उसका खुद का स्वार्थ यानी पैसा कमाना है। यानी वो एक आर्थिक क्रिया कर रहा है। यही क्रिया मीट बेचने और शराब बेचने वाले पर भी लागू है।

इनविशिबल हैंड क्या है?

अदृश्य हाथ मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली अनदेखी ताकतों के लिए एक रूपक है। व्यक्तिगत स्वार्थ और उत्पादन और उपभोग की स्वतंत्रता के माध्यम से समग्र रूप से समाज का सर्वोत्तम हित पूरा होता है। बाजार की आपूर्ति और मांग पर अलग-अलग दबावों की निरंतर परस्पर क्रिया कीमतों की प्राकृतिक गति और व्यापार के प्रवाह का कारण बनती है। “अदृश्य हाथ” शब्द पहली बार एडम स्मिथ के प्रसिद्ध काम, द वेल्थ ऑफ नेशंस में सामने आया। स्मिथ इसमें कहते हैं कि बाजार में एक अदृश्य शक्ति काम करती है। ये शक्ति ही बाजार में मांग और पूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखती है और निवेशक को पूंजी का बेस्ट रिटर्न देती रहती है। इस थ्योरी का मानना है कि बाजार ऑटो करेक्ट करता है। स्मिथ मानते हैं कि बाजार में उत्पादक, उपभोक्ता और कामगार के अपने हित हैं। इन तीनों हितों के आपसी टकराव और सामंजस्य से बाजार चलता रहता है।

अदृश्य हाथ एक रूपक है कैसे, एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में स्व-इच्छुक व्यक्ति परस्पर अन्योन्याश्रित प्रणाली के माध्यम से काम करते हैं।

यह अन्योन्याश्रितता उत्पादकों को सामाजिक रूप से आवश्यक बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है, भले ही वे केवल अपनी भलाई के बारे में परवाह करते हों।

एडम स्मिथ ने अपनी 1759 की पुस्तक द थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स और बाद में अपनी 1776 की पुस्तक एन इंक्वायरी इनटू द नेचर एंड कॉजेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस में इस अवधारणा को पेश किया।

प्रत्येक मुक्त विनिमय संकेत देता है कि कौन सी वस्तुएं और सेवाएं मूल्यवान हैं और उन्हें बाजार में लाना कितना कठिन है।

आलोचकों का तर्क है कि अदृश्य हाथ हमेशा सामाजिक रूप से लाभकारी परिणाम नहीं देता है, और लालच, नकारात्मक बाहरीता, असमानता और अन्य हानियों को प्रोत्साहित कर सकता है।

पीएम मोदी ने किया था जिक्र

एडम स्मिथ की थ्योरी की चर्चा दुनिया भर में होती आई है। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मुक्त बाजार की थ्योरी के ईर्द-गिर्द ही चलती है। 1990 के बाद विदेशी कंपनियों के लिए अपने बाजार के दरवाजे खोलने वाला भारत सफेद हाथी बन चुकी सरकारी कंपनियों के विनिवेश की पहल करने की राह पर चलता दिखाई दे रहा है। पिछले साल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोहराया कि सरकार का कारोबार में बने रहने का कोई काम नहीं है।समाचार एजेंसी एएनआई को दिए एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने कहा कि लोग कह रहे हैं कि भाजपा समाजवादी पार्टी में बदल रही है, इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी देश के लोगों पर भरोसा करती है और मानती है कि सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो लोगों को बढ़ने में मदद करें। पीएम मोदी ने कहा कि गर्वमेंट हैश नो बिजनेस टू बी इन बिजनेस। सरकार का काम है गरीबों के लिए भोजन के बारे में सोचना, उनके लिए घर और शौचालय बनाना, उन्हें पीने का साफ पानी दिलाना, उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, सड़कें बनाना, छोटे किसानों के बारे में सोचना मेरी मेरी प्राथमिकता है। एडम स्मिथ भी जब देशों में लिमिटेड गवर्नमेंट की बात करते हैं तो वे जनता के लिए इसी बेसिक फ्रेमवर्क को मुहैया कराने पर जोर देते हैं।

5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने के लिए भारत को भी अदृश्य हाथ पर भरोसा

अदृश्य शक्ति का सिद्धांत कितना अहम है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि भारत की सरकार ने 2025 में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने में इस अदृश्य हाथ को अहम कारक माना गया। रत सरकार की 2019-20 की आर्थिक समीक्षा कहती है कि 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्वकांक्षा बाजार के के अदृश्य हाथ एवं विश्वास, दोनों को सुदृढ़ करने पर निर्भर है। बाजार के अदृश्य हाथ (कारोबारियों) को (01) नए व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करके, निष्पक्ष प्रतियोगिता करके एवं व्यवसाय को सुगम बनाकर (02) अनावश्यक नीतियों को समाप्त करना जो सरकारी हस्तक्षेपों के माध्यम से बाजार की शक्तियों को कम आकती हैं (03) रोजगार सृजन के व्यापार को सक्षम बनाकर (04) भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप बैंकिंग क्षेत्र में वृद्धि करके, बाजार अनुकूल नीतियों का प्रचार करके सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। वैश्विक अर्थव्यस्था में भारत के ऐतिहासिक प्रभुत्व के साथ ही बाजार में खुलापन लाने के महत्व पर भारत का जोर है। ताकि धन सृजन हो और बढ़े हुए निवेश के माध्यम से आर्थिक गतिविधि को प्रोत्साहन मिले। बाजार के अदृश्य हाथ और अदृश्य विश्वास के कारण अतीत में भारत का दबदबा रहा है। इन तथ्यों ने उदारीकरण के बाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को ऊंचाई की ओर लौटने में मदद की।

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