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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति : मंडल, अध्याय और सूक्त आदि

मंडल, अध्याय और सूक्त आदि

गतांक से आगे ….

वेदों के छंद बड़े विचित्र हैं । प्रायः ऋग्वेद के मन्त्र जब पदपाठ अर्थात् सन्धिविच्छेद से पढ़े जाते हैं, तो शुद्ध प्रतीत होते हैं, पर जब ज्यों के त्यों संधि सहित पढ़े जाते हैं, तो घट बढ़ जाते हैं। इसी तरह यजुर्वेद अध्याय 40 के पर्यगाच्छुक्र० वाले मन्त्र का अन्तिम चरण बढ़ा हुआ दिखता है, पर वह जिस छन्द का है, उस छन्द के हिसाब से ठीक है । यजुर्वेद के छन्द छोटे बड़े हर प्रकार के हैं। सबसे छोटा छंद 22 अक्षर का है, जिसको विराट्गायत्री कहते हैं धौर सबसे बड़ा छंद स्वराकृतिः है जो 106 अक्षर का है । मध्यम दर्जे के अनेकों छंद हैं, जो क्रम से चार – चार अक्षर बढ़ाते हुए 22 से 106 तक पहुँचते हैं। सर्वानुक्रमणीकार ने प्रारम्भ में ही कहा है कि ‘यजुषामनियताक्षरत्वादेतेषां छम्बों न विद्यते’ अर्थात् यजुर्मंत्रों के अक्षर नियत न होने से उनमें छन्दत्व नहीं है, परन्तु जब हम चार – चार अक्षरों की वृद्धि का क्रम देखते हैं, तब यही प्रतीत होता है कि दीर्घ वृत्तों की बनावट भी मर्यादित ही है। यह बात अलग है कि फारसी की बहतवीलों की तरह हम दीर्घ वृत्तों को गाने में प्रयुक्त न कर सकें, पर उनको अमर्यादित नहीं कह सकते। कहने का मतलब यह कि वेदों के छन्दों की रचना के अनेकों विशेष नियम हैं। उन नियमों में एक यह नियम बड़ा प्रसिद्ध है कि वेद के छंद मात्रिक नहीं हैं। उनकी गिनती अक्षरों से ही की जाती है। इसलिए वे एक नियम लाइन के अगल बगल चलते हैं । छंद की छाया दिखती हैं, रूप नहीं । पाठ से छाया और गीत से रूप दिखता है। इस प्रकार से वैदिक छन्द स्वयं एक उत्कृष्ट काव्य की तरह रचे गये हैं । यही छन्दों का थोड़ा सा विवरण है।

छन्दों के आगे स्वर हैं । स्वरों का वर्णन यज्ञ के प्रकरण में हो चुका है। वहां अच्छी तरह दिखला दिया गया है कि स्वर अपने कौशल से किस प्रकार अर्थ को पुष्ट करते हैं । यहाँ फिर भी प्रकरणवश उसी को दोहराये देते हैं । याज्ञवल्क्य शिक्षा में लिखा है कि-

उच्च निषाद गांधारी नोचैर्ऋषभधैवतो। शेषास्तु स्वरिता ज्ञेयाः षड्जमध्यमपञ्चमाः ।

अर्थात् गांधार और निषाद को उदात्त, ऋषभ और धैवत को अनुदात्त और षड्ज, मध्यम और पंचम को स्वरित कहते हैं। इन स्वरों के विषय में लिखा है कि-

मन्त्रो हीतः स्वरतो वतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥

अर्थात् जो मन्त्र यज्ञ में स्वर और वर्णहीन मिथ्या उच्चरित होते हैं, उनका अर्थ ज्ञात नहीं होता और अशुद्ध उच्चारण अनर्थ होकर यजमान के नाश का कारण होता है, जैसे स्वर की भूल से इन्द्रशत्रुः का भाव इन्द्रस्य शत्रुः हो जाता है। इस विषय को इस प्रकार समझना चाहिए कि एक ही समय में एक शख्स के पास एक भिखारी और एक महाजन आया। दोनों को उस आदमी से माँगना है। एक को भीख मांगना है और दूसरे को तकाजे के तौर पर कर्ज वसूल करना है । दोनों ही एक ही शब्द द्वारा मांगते हैं। वह शब्द है दीजिये । भिखारी इस शब्द को प्रार्थना के स्वरों में लपेटकर बोल रहा है और महाजन उसी शब्द को दर्प के स्वरों में लपेटकर बोल रहा है। कानों में एक शब्द से करुणा प्रकट हो रही है, दूसरे से दर्प और क्रोध का संचार हो रहा है। यद्यपि दोनों के बोलने में तीन ही अक्षर (दीजिए) उच्चरित हो रहे हैं, पर स्वरों का फेर अर्थ को इतना बदले हुए है कि जमीन आसमान का अन्तर हुआ जाता है । दोनों के स्वरों में कैसे फर्क हुआ ? यदि यह जानना हो तो सरङ्गी में भिखारी की याचना के स्वर और महाजन के तकाजेवाले स्वरों को निकालिए, तुरन्त मालूम हो जायेगा कि दोनों का सरिगम अलग अलग है । इस नमूने से स्वरों की खूबी समझ में आ जाती है । यह खूबी सिवा वेदों के और दुनिया की किसी लिपि में नहीं है । कोई नाटककार जब किसी राजा से द्वारपाल के लिए हुकूमत के शब्दों में हुक्म दिलवाता है, तो लिखता है कि राजा ने द्वारपाल से कहा द्वारपाल ! (जरा कड़ी आवाज से) । यहाँ नाटककार को कोष्ठक में ‘जरा कड़ी आवाजसे’ इतना बढ़ाकर लिखाना पड़ता है पर यदि वह स्वर लिपि के साथ ही साथ लिखता, तो कोष्ठक की इबारत लिखने की आवश्यकता न होती । आजकल सङ्गीतलिपि जिसको अँगरेजी में नोटेशन कहते हैं, प्रचलित हो रही है । जिन्होंने उस पर ध्यान दिया है, सहज ही स्वरलिपि और स्वर अर्थ का रहस्य समझ सकते हैं । वेदों के स्वर इसी तरह अपने शब्द का अर्थ निश्चित रखते हैं ।
इस प्रकार हमने यहाँ तक ऋषि, देवता, छन्द और स्वरों का थोड़ा सा वर्णन करके दिखलाया, जिससे स्पष्ट हो रहा है कि उक्त चार चीजों में ऋषि, देवता और स्वर अस्थिर हैं और छन्द स्थिर हैं । अर्थात् ऋषि, देवता और स्वर आवश्यकता पड़ने पर बदले जा सकते हैं—अनेकों बार बदले जा चुके हैं और छन्द ज्यों के त्यों बने हैं । इसलिए इन चारों चीजों में केवल छन्द ही स्थिर हैं । शेष ऋषि, देवता और स्वर अर्थानुसार प्रायः बदलते रहते हैं, इसलिए वे अस्थिर हैं । परन्तु स्मरण रखना चाहिये कि वेदों का स्वाध्याय करनेवालों के लिए ऋषि देवता, छन्द और स्वरों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है ।
क्रमशः

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