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इतिहास के पन्नों से

चीन के आक्रमण के समय क्या बोले थे नेहरू ?

चीनी आक्रमण पर क्या कहा था नेहरू ने?

अखिलेश झा

आज से लगभग 25 साल पहले पुरानी दिल्ली की कबाड़ी की एक दुकान से ऑल इंडिया रेडियो के ग्रामोफोन रेकॉर्ड्स का एक बड़ा संग्रह मैंने खरीदा था। उसमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण रेकॉर्डिंग थी। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आवाज़ में। दो रेकॉर्ड के सेट के लेबल पर रेडियो ब्रॉडकास्ट की तारीख लिखी थी, 22 अक्टूबर, 1962। समझने में देर न लगी कि उस रेकॉर्ड पर नेहरूजी का संदेश भारत पर चीन के आक्रमण से जुड़ा होगा।

जब पहले रेकॉर्ड के पहले हिस्से को ग्रामोफोन पर मैंने बजाया, तो नेहरू का देश को रेडियो से किया गया संबोधन इन शब्दों में शुरू हुआ, ‘भाइयों और बहनों, साथियों और हमवतनों! मैं बहुत दिन बाद आपसे रेडियो पर बोल रहा हूं, लेकिन इस वक़्त मैंने बोलना ज़रूरी समझा, क्योंकि एक अहम हालात हैं और हमारी सीमा पर जबरदस्त हमले चीनी फौजी ने किए हैं और करते जाते हैं। ऐसी हालत उठी है… जिसका हमें अपनी पूरी ताकत से मुकाबला करना है।’

हम सब जानते हैं कि आज से साठ साल पहले 20 अक्टूबर, 1962 को चीनी सेना ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। 21 अक्टूबर को नेहरू ने बीबीसी को चीनी आक्रमण पर अपना इंटरव्यू दिया था। उसके अगले दिन उन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से देश की जनता को चीन आक्रमण के संदर्भ में संबोधित किया।

नेहरू का संबोधन उस रेकॉर्ड पर जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, उनकी आवाज़ में हताशा और निराशा साफ़ झलक रही थी। उनके पहले रेकॉर्डेड भाषण से लेकर लगभग सभी महत्वपूर्ण भाषण मेरे व्यक्तिगत आर्काइव में हैं। मैंने कभी उनको अपनी बात रखने के लिए शब्दों को टटोलते नहीं पाया। वह एक कुशल वक्ता थे और शब्दों का सटीक प्रयोग करते थे। लेकिन, उस भाषण में न तो उनके विचारों में तारतम्यता दिखाई दे रही थी और न उनकी अभिव्यक्ति में आत्मविश्वास प्रकट हो रहा था।

पूरा उद्बोधन सुनने से यह भी साफ़ हो रहा था कि वह कोई लिखित भाषण नहीं पढ़ रहे थे। चूंकि राजनय और कूटनीति पर उनके विचारों को चीनी आक्रमण ने बुरी तरह आहत कर दिया था, वह गहरे सदमे में थे। प्रधानमंत्री के तौर पर देशवासियों को आश्वस्त करने की पूरी कोशिश कर रहे थे अपने उद्बोधन में, लेकिन शब्द उनका साथ नहीं दे रहे थे। वह बार-बार शब्द ढूंढते दिखाई पड़ते हैं। वाक्य संरचना बदलते सुनाई पड़ते हैं और इस तरह की भाषा का प्रयोग करते सुनाई पड़ते हैं, जो उनकी कभी रही नहीं।

वह चीन को बेशर्म दुश्मन कहते हैं। सीमा पर भारतीय सेना के पीछे हटने की बात करते हैं और चीन द्वारा भारतीय ज़मीन पर क़ब्ज़े की बात भी करते हैं। यहां यह तय करना मुश्किल होता है कि उनके ईमानदार वक्तव्य के लिए नेहरूजी की तारीफ की जाए या फिर देश का मनोबल बनाए रखने के लिए ज़रूरी एक ओजस्वी उद्बोधन न दे पाने के लिए आलोचना!

22 अक्टूबर, 1962 को नेहरूजी के रेडियो-उद्बोधन के कुछ अंश यहां शब्दशः दिए जा रहे हैं,
जहां कि बहुत ताकतवर और बेशर्म दुश्मन जिसको ज़रा फिक्र न शांति की थी, न ही शांति के तरीकों की… उसने हमें धमकी दी और उस धमकी पर अमल भी किया।
मुझे अफसोस है कि हमारी फ़ौज को जो कई जगह धक्के लगे और कई जगह से हटाए गए। उनके ऊपर इतने ज़्यादा फ़ौज के लोग उनके मुखालिफ हुए और जिनके पास बड़ी-बड़ी तोपें थीं, पहाड़ी बंदूकें थीं और मोटरे थीं कि हमारे लोगों के सामने बहुत मुश्किल हो गई।
मैं… मैं अपने अफ़सर और लोग हमारे, जिन्होंने बड़ी फ़ौज का सामना किया, बड़ी हिम्मत दिखाई, उनकी तारीफ करता हूं। …फिर भी हो सकता है हमें और धक्के लगें सरहद पर, हम… और हमारी फ़ौज हटाई जाएं…।

शायद ही आपको इतिहास में ऐसी मिसाल कोई मिले जैसे कि एक मुल्क यानी हिन्दुस्तान ने ख़ास तौर से कोशिश करके दोस्ती उसने की और सहयोग किया चीनी हुक़ूमत से और वहां के लोगों से। और, उसकी तरफ से वक़ालत की… दुनिया की अदालत में। और, वही …उसी चीनी गवर्नमेंट ने इस भलाई का जवाब बुराई से और उस पर क़ब्ज़ा… क़ब्ज़ा किया। कोई भी ख़ुद्दार मुल्क इसको बर्दाश्त नहीं कर सकता, न ही इसको सहन करेगा।

नेहरू ने भारत-चीन सीमा के हालात का ब्योरा देने के साथ देश के अंदरूनी मसलों का भी ज़िक्र किया, जो बहुत अनुकूल नहीं थे। उनके शब्द थे,

हमें अपनी फ़ौजी ताकत बढ़ानी है, लेकिन फ़ौजी ताकत काफी नहीं है, इसके पीछे मुल्क का सारा काम है। इंडस्ट्री है, खेती है… सभी से दरख़्वास्त करूंगा, जो हमारे काम करने वाले भाई-बहन हैं कि इस मौके पर जबकि हमारा पहला काम है हम अपनी पैदावार बढ़ाएं। कोई हड़ताल, स्ट्राइक न करें, गांवों में, खेतों में और कारखानों में, दोनों जगहों पर अपनी पैदावार को बढ़ाना है। इस मौके पर कोई क़ौम के ख़िलाफ़, मुल्क के ख़िलाफ़ या ख़ुदगर्जी की काररवाई बर्दाश्त नहीं हो सकती।

मैं आशा करता हूं कि सब हमारे मुल्क के जो दल हैं, जो पार्टी हैं, गिरोह हैं, वो सब मिल जाएंगे और अपने आप उसके झगड़ों को बंद करेंगे। बोझ बहुत हमारे ऊपर होने वाला है। हमें अपने पैसे बचाने हैं और उसको सेविंग में, पोस्ट ऑफिस में या बॉन्ड में देने हैं ताकि हमारे पास रुपया आए। अपनी रक्षा के लिए और हमें चीज़ें बनानी हैं उनके कारखानों के लिए।

लगभग पंद्रह मिनट के अपने रेडियो उद्बोधन में जवाहरलाल नेहरू ने तमाम निराशाओं के बीच देशवासियों को इन शब्दों में आश्वस्त भी किया, ‘एक बात मेरी राय में तय है और वो ये कि आखिरी नतीज़ा इस मुकाबले का हमारे हक़ में में होगा और कोई हो नहीं सकता। …हमारे भरोसे से और अपनी तैयारियों से हम आखिर में जीतेंगे और कोई नतीजा हो नहीं सकता।’

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