EWS आरक्षण: सरकार का पक्ष, विरोध में दी गई दलील, जजों की राय

लेखक- अभिनय आकाश

शुरुआत से लेकर फैसला आने तक की पूरी टाइमलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को सुनवाई करते हुए दाखिलों और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन की वैधता को दो के मुकाबले तीन मतों के बहुमत से बरकरार रखा।

देश में गरीब सर्वर्णों को 10 फीसदी आरक्षण मिलता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण के संशोधन को सही माना है। पांच में से तीन जजों का कोटे के पक्ष में फैसला आया है। ये अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है। इस फैसले के बाद देश में गरीब सर्वर्णों को आरक्षण मिलता रहेगा, उसमें कोई भी बदलाव नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को सुनवाई करते हुए दाखिलों और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन की वैधता को दो के मुकाबले तीन मतों के बहुमत से बरकरार रखा। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, बेला एम त्रिवेदी और जेबी पारदीवाला ने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित और न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट ने असहमति जताई। ऐसे में ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जो रुख सामने आया है उसके मायने क्या हैं, ये जानने हैं और इसके साथ ही आपको बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या कहा, विरोध में क्या तर्क दिए गए और जजों की क्या टिप्पणी रही। कुल मिलाकर कहें तो ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर सुप्रीम मुहर की पूरी टाइमलाइन।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या कहा?

सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने 103वें संविधान संशोधन का बचाव करते हुए कहा था कि इसके जरिए दिया गया आरक्षण अलग है। उन्होंने साफ किया कि ये सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत कोटा से छेड़छाड़ किए बिना दिया गया है। इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि संशोधित प्रावधान संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है। इसके तहत किसी दूसरी श्रेमी के आरक्षण को कम नहीं किया गया है।

विपक्ष में क्या दलील दी गई?

ईडब्ल्यूएस कोटा संशोधन का विरोध करते हुए पिछले दरवाजे से आरक्षण की मूल अवधारणा को खत्म करने का प्रयास बताते हुए इसे संविधान का उल्लंघन बताया गया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने ईडब्ल्यूएस कोटा का विरोध करते हुए कहा कि आर्थिक मानदंड वर्गीकरण का आधार कैसे हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट को इंदिरा साहनी (मंडल) फैसले पर फिर से विचार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी

न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने अपने फैसले में कहा कि आरक्षण असमानताओं का मुकाबला करते हुए एक समतावादी समाज के लक्ष्य की ओर एक समावेशी मार्च सुनिश्चित करने के लिए राज्य द्वारा सकारात्मक कार्रवाई का एक साधन है। “यह न केवल सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने का एक साधन है, बल्कि किसी भी वर्ग या वर्ग को शामिल करने के लिए भी है जो कमजोर वर्ग की परिभाषा का जवाब देने के लिए है। इस पृष्ठभूमि में केवल आर्थिक पृष्ठभूमि पर आरक्षण संविधान की किसी भी अनिवार्य विशेषता का उल्लंघन नहीं करता है और संविधान के मूल ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि ईडब्ल्यूएस कोटे से आरक्षण किसी भी तरह से संविधान के मूल ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचाता है।

न्यायमूर्ति माहेश्वरी के बयान से सहमति जताते हुए न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के अलावा अन्य ईडब्ल्यूएस के लिए विशेष प्रावधान करने के लिए राज्य को सक्षम करने वाले संशोधन को संसद की ओर से एक सकारात्मक कार्रवाई के रूप में माना जाना चाहिए। ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लाभ और बेहतरी के लिए। उन्होंने कहा कि नागरिकों के ईडब्ल्यूएस वर्ग को एक अलग वर्ग के रूप में मानना ​​एक उचित वर्गीकरण होगा, उन्होंने कहा कि इसे अनुचित, या अनुचित वर्गीकरण नहीं कहा जा सकता है।

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने यह भी कहा कि हालांकि यह परिकल्पना की गई थी कि आरक्षण की एक समयावधि होनी चाहिए, यह आजादी के 75 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि परिवर्तनकारी संवैधानिकता की दिशा में एक कदम के रूप में, समग्र रूप से समाज के व्यापक हित में नीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है।

एक अलग फैसले में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति त्रिवेदी के विचारों से सहमत थे। उन्होंने कहा कि आरक्षण अंत नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय को सुरक्षित करने का एक साधन है और इसे निहित स्वार्थ नहीं बनने देना चाहिए।

तीन न्यायाधीशों के बहुमत के दृष्टिकोण से असहमत, न्यायमूर्ति भट ने अपनी राय को मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित का समर्थन भी मिला। उन्होंने कहा कि इस तरह के संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे की संरचना को कमजोर करता है।

फैसले का मतलब क्या?

आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले पर देश की सबसे बड़ी अदालत की मुहर लग गई है।

ईडब्ल्यूएस आरक्षण अब जारी रहेगा।

गरीब सर्वणों को 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता रहेगा।

राज्य को ईडब्ल्यूएस कोटा तय करने का अधिकार मिलेगा।

सरकार के फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी रजामंदी दे दी है।

ईडब्ल्यूएस आरक्षण की टाइमलाइन क्या है

8 जनवरी 2019 को लोकसभा से बिल पास हुआ था। बिल के पक्ष में 323 वोट जबकि विपक्ष में 3 वोट पड़े थे।

10 जनवरी 2019 को ईडब्ल्यूएस आरक्षण बिल राज्यसभा से पास हो गया। बिल के पक्ष में 165 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में 7 वोट पड़े।

31 जनवरी 2019 को सरकार ने इस आरक्षण को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया।

फरवरी 2020 में मध्य प्रदेश की हाईकोर्ट में ईडब्ल्यूएस कोटा के खिलाफ पहली याचिका दायर की गई।

6 फरवरी को न्यायालय ने संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सरकार को नोटिस जारी किया।

8 फरवरी: न्यायालय ने 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस कोटे पर रोक लगाने से इनकार किया।

8 सितंबर, 2022 को प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की पीठ ने अपील सुनने के लिए पीठ का गठन किया।

27 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

7 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से दाखिलों, सरकारी नौकरियों में ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण प्रदान करने वाले 103वें संविधान संशोधन की वैधता को बरकरार रखा।

किसको कितना आरक्षण

ईडब्ल्यूएस- 10

ओबीसी- 27

एससी 15

एसटी- 7.5

संविधान का उल्‍लंघन नहीं EWS आरक्षण

ईडब्ल्यूएस कोटे की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष हुई। पीठ के सामने ये सवाल था कि क्या ईडब्ल्यूएस आरक्षण ने संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन किया है? क्या मोदी सरकार ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देकर जो अन्य लोगों के साथ आगे बढ़ने का मौका दिया है, वो गलत है? ? क्‍या मोदी सरकार ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देकर जो अन्‍य लोगों के साथ आगे बढ़ने का मौका दिया है, वो गलत है? संविधान के अंदर अभी तक के जितने भी प्रावधान थे उसके तहत एससी/एसटी और ओबीसी को ही आरक्षण देने का प्रावधान था। लेकिन सामान्य वर्ग, गरीब लोगों को आरक्षण नहीं मिला था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार की नीति को अप्रूव करते हुए अब उन्हें भी 10 प्रतिशत का आरक्षण मिलेगा। इसमें गौर करने वाली बात ये है कि किसी का भी कोई अधिकार नहीं लिया गया है। एससी का भी कोटा उतना ही है और ओबीसी का भी। एडिशनल जनरल कैटेगरी के गरीब लोगों के लिए इसमें 10 प्रतिशत जोड़ा गया है। आरक्षण का अर्थ भी सही मायने में यही था कि सभी को इस योग्य बनाया जाए कि वो एक समान चले।

आगे क्या

राज्य सरकारों को अब ईडब्ल्यूएस का जो 10 फीसदी के आरक्षण पर फैसला करना है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकारों के लिए भी एक चुनौती होगी। किसी राज्य में अगर किसी परिवार की आमदनी 5 लाख रुपये है तो वो ईडब्ल्यूएस में आएगा।

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