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निर्भीक राष्ट्रवादी इतिहासकार व उपन्यासकार : वैद्य गुरुदत्त

विज्ञान के विद्यार्थी और पेशे से वैद्य होने के बावजूद गुरुदत्त (8 दिसम्बर 1894 – 8 अप्रैल 1989) बीसवीं शती के एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक थे, जिन्होने लगभग दो सौ उपन्यास, संस्मरण, जीवनचरित, आदि का सृजन किया और भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, विज्ञानं, राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में भी अनेक उल्लेखनीय शोध-कृतियाँ दीं। इतना विपुल साहित्य रचने के बाद भी वैद्य गुरुदत्त को न तो कोई साहित्यिक व राजनीतिक अलंकरण मिला, न ही उनके साहित्य को विचार-मंथन करने योग्य समझा गया। काँग्रेस, नेहरू और महात्मा गाँधी के कटु आलोचक होने के कारण शासन-सत्ता ने वैद्य गुरुदत्त की निरंतर घोर उपेक्षा की। छद्म धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने उनको इतिहासकार ही नहीं माना। फलस्वरूप आज की तारीख में वैद्य गुरुदत्त को जानने और पढ़नेवाले नगण्य ही हैं।

वैद्य गुरुदत्त स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनन्य भक्त थे और आर्य समाज के पालने में पले-बढ़े लेखक-साहित्यकार थे। पिछली शताब्दी में आर्य समाज ने भारतवर्ष को एक से बढ़कर एक, निर्भीक राष्ट्रवादी विद्वान् और प्रखर लेखक दिए हैं, जिनमें स्वामी श्रद्धानन्द (1856-1926), पं. लेखराम आर्य (1858-1897), पं. गुरुदत्त विद्यार्थी (1864-1890), आचार्य रामदेव (1881-1939), पं. भगवद्दत्त (1893-1968), वैद्य गुरुदत्त (1894-1989), आचार्य उदयवीर शास्त्री (1894-1991), बुद्धदेव विद्यालंकार (1895-1969), जयचंद्र विद्यालंकार (1898-19..), पं. धर्मदेव विद्यावाचस्पति (1901-1978), डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार (1903-1964), पं. युधिष्ठिर मीमांसक (1909-1994), राजेन्द्र सिंह (1944-2016), आदि प्रमुख हैं। ये वे साहित्यकार-इतिहासकार हैं जिन्होंने अपने लेखन के लिए यूरोपीय ग्रंथों को आधार न बनाकर विशुद्ध भारतीय स्रोतों, वैदिक और लौकिक संस्कृत-साहित्य को उपजीव्य बनाया और भारतीय इतिहासलेखन को एक नयी दिशा दी। ये वे साहित्यकार-इतिहासकार हैं जो भली-भाँति अंग्रेजी जानते थे, किन्तु जिन्होंने अंग्रेजी का प्रयोग न करने का अथवा स्वल्प प्रयोग करने का संकल्प किया था और जिन्होंने हिंदी की अमूल्य सेवा की। कहने की आवश्यकता नहीं कि शासन-पोषित समकालीन ब्रिटिश और मार्क्सवादी विद्वानों के खेमे में इन इतिहासकारों की न केवल घोर उपेक्षा हुई बल्कि इनकी किताबों को भी सरकारी खरीद से दूर रखा गया।

अपने देश में लेखन के क्षेत्र में प्रायः ऐसा देखने में आता है कि ऐतिहासिक उपन्यासकारों और साहित्यकारों को ‘इतिहासकार’ की कोटि में नहीं रखा जाता। वैद्य गुरुदत्त भी इनमें अपवाद नहीं थे। उन्होंने जिस विपुल परिमाण में उपन्यास लिखे, उससे उनका पेशेवर इतिहासकार वाला व्यक्तित्त्व नहीं उभर सका और वह केवल उपन्यासकार और साहित्यकार होकर रह गए। एक ताजा उदाहरण बिहार के जाने-माने ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद का है, जिन्होंने एक दर्जन से अधिक ऐतिहासिक उपन्यास लिखे हैं, वह स्वयं इतिहास के बहुत अच्छे जानकार और प्रवक्ता हैं, लेकिन वह ‘लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार’ के रूप में जाने जाते हैं, कोई उनको ‘इतिहासकार’ मानने को तैयार नहीं। इसके अतिरिक्त हिंदी-साहित्य की अमूल्य सेवा करने के बाद भी, शासन के विमुख जाने के कारण वैद्य गुरुदत्त को ‘साहित्यकार’ की श्रेणी में भी रखने से परहेज किया गया।

यह भी उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश काल में जो लेखक किसी विश्वविद्यालय में सेवारत रहे, और जिन्होंने अंग्रेजी में लेखन-कार्य किया, प्रायः उन्हीं को ‘इतिहासकार’ की कोटि में रखा गया; जिन्होंने ‘स्वान्तःसुखाय’ लेखन किया, उनको सिवाय उपेक्षा के कुछ नहीं मिला। डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, सर यदुनाथ सरकार, डॉ. पांडुरंग वामन काणे, भगवतशरण उपाध्याय, डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार, राखालदास बनर्जी, ताराचंद, रमेश चन्द्र दत्त, वी.आर. रामचन्द्र दीक्षितार, रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, दिनेश चन्द्र सरकार, डॉ. रामशरण शर्मा, इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर, हरवंश मुखिया, सुमित सरकार, नीहाररंजन राय— इन सभी ने किसी-न-किसी विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य किया था और इतिहास पर ही पुस्तकें लिखी थीं। फलस्वरूप ये ‘इतिहासकार’ माने गए। इसके विपरीत जो किसी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर नहीं रहे, किन्तु जिन्होंने इतिहास की अमूल्य सेवा की, उनको इतिहासकार ही नहीं माना गया अथवा उनके इतिहासकार होने में संदेह खड़ा किया गया, जैसे – पुरुषोत्तम नागेश ओक, आचार्य रघुवीर, राहुल सांकृत्यायन, डॉ. देवसहाय त्रिवेद, धरमपाल, काशीप्रसाद जायसवाल, पं. कोटावेंकटचलम, राजेंद्र सिंह, आदि। मेरे विचार से वैद्य गुरुदत्त की उपेक्षा का यह भी प्रमुख कारण रहा।

वैद्य गुरुदत्त ने इतना अधिक लिखा है जितना लोग एक जीवनकाल में पढ़ भी नहीं पाते। ‘स्वाधीनता के पथ पर’ से आरम्भ हुआ उनका उपन्यास-जगत् का सफर लगभग दो सौ उपन्यासों के बाद तीन खण्डों में ‘अस्ताचल की ओर’ पर समाप्त होने से पूर्व सिद्ध कर दिया गया कि वैद्य गुरुदत्त उपन्यास-जगत् के बेताज बादशाह थे।

वैद्य गुरुदत्त ने न केवल उपन्यास लिखा, बल्कि तात्कालिक सभी समस्याओं पर खूब लिखा। इतिहास, विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीति, धर्म, दर्शन, आदि अनेक विषयों पर उन्होंने अनेक मौलिक कृतियाँ देकर हिंदी का ग्रन्थ-भण्डार भरा। ‘धर्म, संस्कृति और राज्य’ से लेकर ‘वेदमंत्रों के देवता’ लिखकर उन्होंने भारतीय संस्कृति का सरल एवं बोधगम्य भाषा में विवेचन किया। यहाँ तक कि उन्होंने भगवद्गीता, उपनिषदों और दर्शन-ग्रंथों पर भाष्य भी लिख डाला। ‘भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास’ और ‘इतिहास में भारतीय परम्पराएं’ नामक पुस्तकों ने उनको प्रखर इतिहासकार सिद्ध किया। इस पुस्तक में वैद्य गुरुदत्त ने भारत में इतिहासलेखन की विसंगतियों पर जमकर प्रहार किया है। ‘विज्ञान और विज्ञान’ तथा ‘सृष्टि-रचना’-जैसी पुस्तकें लिखकर अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय दिया। समाजशास्त्र पर उन्होंने ‘धर्म तथा समाजवाद’, ‘स्व अस्तित्व की रक्षा’, ‘मैं हिंदू हूँ’, आदि अनेक पुस्तकें लिखकर समाजवाद की जैसे पोल खोलकर रख दी। ‘धर्मवीर हकीकत राय’, ‘विक्रमादित्य साहसांक’, ‘लुढ़कते पत्थर’, ‘पत्रलता’, ‘पुष्यमित्र’, आदि इनके ऐतिहासिक उपन्यास हैं तो ‘वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान हिन्दू राष्ट्र’, ‘डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अन्तिम यात्रा’, ‘हिन्दुत्व की यात्रा’, ‘भारत में राष्ट्र’, ‘बुद्धि बनाम बहुमत’, इनकी विचार-प्रधान कृतियाँ हैं।

वैद्य गुरुदत्त सन् 1921 के असहयोग आन्दोलन से लेकर सन् 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या तक की परिस्थितियों के प्रत्यक्षद्रष्टा रहे। उन्होंने उन घटनाओं का गहन अध्ययन किया। उस काल के सभी प्रकार के संघर्षों को न केवल उन्होंने अपनी आखों से देखा, अपितु अंग्रेजों के दमनचक्र, अत्याचारों और अनीतिपूर्ण आचरण को स्वयं गर्मदल के सदस्य के रूप में अनुभव भी किया। युवावस्था से ही राजनीतिज्ञों से सम्पर्क, क्रान्तिकारियों से समीप का संबंध तथा इतिहास का गहन अध्ययन— इन सब की पृष्ठभूमि पर वैद्य गुरुदत्त ने ‘सदा वत्सले मातृभूमे’ शृंखला में चार राजनीतिक अत्यन्त रोमांचकारी एवं लोमहर्षक उपन्यास हिंदी-जगत् को दिए — 1. ‘विश्वासघात’, 2. ‘देश की हत्या’, 3. ‘दासता के नये रूप’ और 4. ‘सदा वत्सले मातृभूमे!’ समाचार-पत्र, लेख, नेताओं के वक्तव्यों के आधार पर उपन्यासों की रचना की गई है। उपन्यासों के पात्र राजनीतिक नेता तथा घटनाएं वास्तविक हैं। ‘पुष्यमित्र’ नामक उपन्यास की भूमिका में उन्होंने लिखा है: ‘महात्मा गाँधी ने अहिंसात्मक आन्दोलन से एक वर्ष में स्वराज्य ले देने का वचन देकर ऐसी भ्रान्ति उत्पन्न की कि सी.आर. दास और पण्डित मोतीलाल नेहरू-जैसे बुद्धिमान वक़ीलों से लेकर गाँव के भंगी, चमार तक महात्मा गाँधी के पीछे लग गये।’ इस तरह वैद्य गुरुदत्त के उपन्यासों को पढ़कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि राजनीति के क्षेत्र में वह राष्ट्रीय विचारधारा के लेखक और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों के शब्दों में ‘साम्प्रदायिक’ लेखक थे।

वैद्य गुरुदत्त ने सच्चे राष्ट्रवादी की भाँति सदैव देश के कल्याण की इच्छा की और इस मार्ग पर चलते हुए कभी भी यश की कामना नहीं की। भारत-विभाजन की सर्वाधिक निर्भीक समीक्षा यदि किसी इतिहासकार ने की तो वह वैद्य गुरुदत्त ने। भारत-विभाजन पर उनकी पुस्तक ‘भारत: गाँधी-नेहरू की छाया में’ उनके प्रखर चिंतन से निःसृत, राजनीति की कलुष कथा है। लेखक का मत है कि हिंदूविरोधी राजनीति के दुष्परिणाम को मिटाने के लिए घोर प्रयत्न करना पड़ेगा। तभी हम वत्सलमयी मातृभूमि (भारतमाता) के ऋण से उऋण हो सकेंगे।

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी वैद्य गुरुदत्त ने अपना सम्पूर्ण साहित्य हिंदी में लिखकर हिंदी की जो महती सेवा की है, उसके लिए हिंदी-हिन्दू-संसार उनको सदैव स्मरण करेगा।

#भारतीय_धरोहर

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