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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 61 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)


ज्ञान, दर्शन और प्रवेश

श्री कृष्ण बोले – मैं अर्जुन, लोकों को कर सकता हूँ क्षय।
मैं वही काल हूँ – जिस पर ना पा सकता कोई विजय ।।

जितने योद्धागण यहाँ खड़े हुए ये कभी नहीं बच सकते।
ये सारे मिलकर कभी नहीं सामना मेरा कर सकते ।।

जिसको शक्ति है सुख देने की, दु:ख भी वही दे सकता।
जिसने किया विकास जगत में विनाश वही कर सकता।।

जिसने उत्थान का पाठ पढ़ाया गिरा वही सकता हमको।
जिसने किया है सृजन – दे सकता विध्वंस वही हमको।।

अकारण विध्वंस कभी नहीं होता कारण उसका भी होता।
कारण के बिना कार्य का , नियम कभी नहीं हो सकता।।

विध्वंस तभी तांडव करता जब पाप जगत में बढ़ जाता।
सामग्री विनाश की जुटती है जब धर्म धरा पर घट जाता।।

वेदों के पढ़ने से भी तू नहीं देख सकता था मेरा यह रूप।
न तप से न दान से न यज्ञ से तुझे मिलता मेरा ऐसा रूप।।

हैं तीन क्रम मुझ तक आने के – ज्ञान, दर्शन और प्रवेश।
ऐसी जिसके पास साधना हो,वही आ सकता है मेरे देश।।

ज्ञान कहता हर मानव से – जीवन लक्ष्य निश्चय कर अपना।
बिना लक्ष्य के पग नहीं उठता , अधूरा रहता हर सपना ।।

लक्ष्य निश्चय हो जाता है तो लगती लगन उसके दर्शन में।
सत्य का दर्शन होता जाता नहीं फंसता मन आकर्षण में।।

धीरे-धीरे मिथ्या वाद को , मन से दूरी मिलने लगती।
यथार्थ सत्ता के मिलने की , आशा भारी जगने लगती।।

मिथ्यावाद हटकर मानव के हृदय से अज्ञान निकल जाता।
प्रवेश सफल होता मानव का, अंधकार हृदय का जाता।।

यह गीत मेरी पुस्तक “गीता मेरे गीतों में” से लिया गया है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए मुक्त प्रकाशन से संपर्क किया जा सकता है। संपर्क सूत्र है – 98 1000 8004

डॉ राकेश कुमार आर्य

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