धर्म में युद्ध और युद्ध में धर्म की अनोखी परंपरा रही है भारत की :—- डॉ राकेश कुमार आर्य “हमारा स्वर्णिम अतीत : विश्व गुरु के रूप में भारत” हुई वेबीनार संपन्न

महरौनी (ललितपुर) । महर्षि दयानंद सरस्वती योग संस्थान आर्यसमाज महरौनी जिला ललितपुर के तत्वावधान में आर्यरत्न शिक्षक लखन लाल आर्य के संयोजकत्व में आयोजित वैदिक धर्म के मर्म को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के शिवसंकल्प से संकल्पित होकर लगभग दो वर्षों से अनवरत चल रहे आर्यों के महाकुंभ कार्यक्रम में दिनांक 10 सितम्बर 2022 को मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य ने “हमारा स्वर्णिम : अतीत विश्व गुरु के रूप में भारत” विषय पर अपने ओजस्वी विचार व्यक्त किए।
डॉक्टर आर्य ने कहा कि भारत आभा में रत अर्थात ज्ञान की दीप्ति में रत देश का नाम है । भारत एक ऐसी संस्कृति का नाम है जो अपनी आभा से, ज्ञान की दीप्ति से, अपने ज्ञान विज्ञान से और अपने तेज से संसार को दीर्घकाल तक आलोकित करती रही। डॉ आर्य ने कहा कि भारत शब्द भारतवर्ष को महाभारत के शकुंतला के पुत्र भरत से नहीं मिला बल्कि वायु पुराण की साक्षी के आधार पर यह सिद्ध होता है कि यह नाम भारत को अब से लगभग 22 लाख वर्ष पहले त्रेता काल में महर्षि मनु के पौत्र प्रियव्रत के वंशज ऋषभ के पुत्र भरत के नाम से मिला था।
उन्होंने कहा कि जंबूद्वीप संपूर्ण यूरोप और एशिया को मिलाकर कहा जाता था । इसी के राजा ऋषभ थे। जम्बू के बारे में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह जामुन के पेड़ का प्रतीक है। यूरेशिया की आकृति जामुन के वृक्ष जैसी होती है। इसलिए जंबू द्वीप हमारे ऋषियों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर रखा गया नाम है।
डॉक्टर आर्य ने कहा कि भारत युद्ध में धर्म और धर्म में युद्ध की अनोखी परंपरा को निभाने वाला देश है। धर्म में युद्ध के बारे में उन्होंने अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि शांति काल में देश विरोधी, समाज विरोधी, संस्कृति विरोधी शक्तियों के दमन की योजना पर काम करने का नाम धर्म में युद्ध है । जब युद्ध हो रहा हो तो उस समय युद्ध के नियमों के अंतर्गत नैतिकता को अपनाकर युद्ध करने का नाम युद्ध में धर्म की भावना के निर्वाह का नाम है। भारत ने अपने राष्ट्रीय संस्कारों के प्रचार प्रसार के लिए और उन्हें सुरक्षित और संरक्षित बनाए रखने के लिए इन्हीं 2 मूल्यों को आधार बनाकर काम किया। इस्लाम और ईसाइयत दोनों ने इन सर्वोत्कृष्ट मूल्यों का उपहास किया और इन्हें मानने से इनकार कर दिया। उसी का परिणाम है कि जबसे ये दो मजहब संसार में आए तब से लेकर आज तक का संसार का इतिहास खूनी इतिहास है और आज भी संसार में सर्वत्र अशांति व्याप्त है।
डॉक्टर आर्य ने कहा कि वैलेंटाइन के नाम पर जिस प्रकार भारतवर्ष में कई स्थानों पर विरोध होता है वह उचित नहीं है। क्योंकि वैलेंटाइन नाम का यूरोप का युवा भारतीय संस्कारों के अनुसार वहां की पारिवारिक व्यवस्था को बना देना चाहता था। जिसने यूरोप में चल रही पशु संस्कृति को मिटाने का भरसक प्रयास करते हुए अपना एक ईमानदार जीवन साथी चुनने की भारत की पवित्र भावना को यूरोप में स्थापित करने का कार्य किया था। आज उसके नाम पर भारत में भी अश्लीलता होती है या परोसी जाती है तो यह दुर्भाग्य का विषय है।
उन्होंने कहा कि इसी प्रकार चंगेज खान भारत के वैदिक धर्म से निकले बौद्ध धर्म का अनुयाई था । जिसने भारत पर कभी आक्रमण नहीं किया। उसने उन लोगों के विरुद्ध उस समय एक क्रांति की जो इस्लाम के नाम पर दुनिया को तबाह कर रहे थे। इसी प्रकार हमें हिटलर के बारे में भी अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए। जिसने हमारे नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उस समय सब प्रकार की सहायता प्रदान करके भारत की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। डॉक्टर आर्य ने कहा कि हमारे लिए दुर्भाग्य का विषय है कि हमने अपने ही शुभचिंतकों को भी विदेशी लेखकों के दृष्टिकोण से देखने की सोच को छोड़ा नहीं है। उन्होंने कहा कि इस सोच को भारत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रमुखता से स्थापित किया था। डॉ आर्य ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि आज देश के कर्तव्य पथ पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्थापित हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए प्रसन्नता का विषय है कि जिन लोगों ने देश के इतिहास, पुरुषार्थ, परिश्रम और पौरुष पर अपना एकाधिकार स्थापित करके उसमें अहिंसा की जंग लगाकर देश के मनोबल को तोड़ने का कार्य किया था वह आज कर्तव्य पथ से विदा हो रहे हैं।
कार्यक्रम में वेद प्रकाश शर्मा आईपीएस, पंडित पुरुषोत्तम मुनि दुबे , डॉ व्यास नंदन शास्त्री बिहार, श्रीमती दया आर्या, सत्यपाल वत्स, श्रीमती संतोष सचान, श्रीमती राजेश बहल, वेद प्रकाश शर्मा बरेली, अनिल नरूला,सुमन लता सेन आर्य शिक्षिका,आराधना सिंह शिक्षिका,अदिति सेन आर्या सहित अनेक विद्वान सहभागीजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम के संयोजक और संचालक आर्यरत्न शिक्षक लखन लाल आर्य ने भारत के गौरव पूर्ण इतिहास की श्रंखला को क्रमबद्ध ढंग से देश के आमजन के समक्ष लाने हेतु सरकार से मंच की ओर से मांग की।

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