सुदूर देशों तक केसरिया फहराने वाले बप्पा रावल

-डॉ ० पवन कुमार पाण्डे

ब्रह्माण्ड जैसे अनंत है वैसे ही भारत भूमि की महानता भी अनंत है । इसकी महानता बहुआयामी है , किसी भी क्षेत्र में यह कम नहीं । हर युग कुछ ऐसे महापुरुषों को यह धरती जन्म देती रही , जिन पर हमने ही नहीं संपूर्ण विश्व ने गर्व किया । कई ऐसे महापुरुष भी हुए जिनके कारण युग ने नई करवट ली , नई ऊँचाइयों को छुआ लेकिन उनके विषय में हमारा इतिहास मौन रहा । इतिहासकारों की उपेक्षा अथवा किसी तथाकथित दृष्टिकोण के चलते उन्हें वह स्थान नहीं मिल पाया जिनके वे अधिकारी थे ।
‘ गुहिल वंश ‘ की आठवीं पीढ़ी में जन्मे ‘ कालभोज ‘ अथवा ‘ कालभोजादित्य ‘ , जिन्हें सभी ‘ बप्पा रावल ‘ के नाम से जानते हैं । ‘ गुहिलादित्य ‘ अथवा ‘ गुहिल ‘ से आरंभ हुए ‘ गुहिल राजपंश ‘ ( सन् 566 ई ० ) का वास्तविक संस्थापक होने का श्रेय ‘ बप्पा रावल ‘ को ही दिया जाता है ।
सन् 713-14 ई ० में ‘ ईडर ‘ में राजकुमार कालभोज का जन्म हुआ । उनके पिता ‘ ईडर ‘ के शासक ‘ नागादित्य ‘ थे । गुहिल राजवंश के सूर्य बप्पा रावल का बाल्यकाल अत्यंत अंधकारमय एवं कष्टों से भरा था । उनके पिता नागादित्य के दुर्व्यवहार से भील सरदार क्रुद्ध हो गए , परिणामस्वरूप युद्ध हुआ और सन् 717 ई ० में उनकी मृत्यु हो गई । कालभोज की माता अपने पुत्र को विश्वसनीय ब्राह्मण महिला तारा को सौंपकर पति की चिता के साथ सती हो गई । तारा तीन वर्षीय कालभोज को अपने साथ नागदा ले आई , जहाँ बालक कालभोज अन्य भील बालकों के साथ गायें चराने लगा । किंवदंती है कि बालक कालभोज जिन गायों को चराता था , उनमें से एक गाय बहुत दूध देती थी , किन्तु संध्या को जब वह लौटती थी तो उसके थन में दूध नहीं रहता । कालभोज इस रहस्य को जानने के लिए जंगल में प्रजा संरक्षण उसके पीछे चल दिए । उसने देखा कि वह गाय निर्जन कंदरा में पहुँची और हारित ऋषि के निर्देश पर वह शिवलिंग का अभिषेक करने हेतु दुग्ध धार बहाने लगी । इस घटना के पश्चात् वह बालक हारित ऋषि से जुड़ गया । ऋषि का आशीर्वाद फलित हुआ और वह बालक सन् 733 ई ० में मेवाड़ का अधिपति बना । इसी राजवंश में आगे जाकर सिसोदिया वंश की उत्पत्ति मानी जाती है I

बप्पा रावल में ‘ बप्पा ‘ या ‘ बापा ‘ शब्द वास्तव में व्यक्तिवादी शब्द न होकर आदरसूचक है जिसका अभिप्राय है पिता अथवा बाप । बप्पा है रावल के प्रजासंरक्षण , राष्ट्र रक्षक रूप एवं गुणों को देखकर ही आम जनता उन्हें ‘ बापा ‘ अथवा ‘ बप्पा ‘ कहकर संबोधित किया । राजकुमार कालभोज को बप्पा की उपाधि जहाँ आम जनता ने दी वहीं रावल की उपाधि भील सरदारों ने दी । यही रावल सम्बोधन आगे जाकर राणा में परिवर्तित हो गया । बप्पा रावल का बाल्यकाल भील जनजाति के बीच बीता । इसी भील समुदाय ने अरबों के विरूद्ध युद्ध में बप्पा रावल का साथ दिया । यही भील और राजपूत एकता हमें महाराणा प्रताप के समय भी दिखाई देती है । कहा जाता है कि जब भी कोई राजा गद्दी पर बैठता था तो उसका राजतिलक भील प्रमुख द्वारा ही किया जाता ।
मेवाड़ के राजचिह्न में एक ओर महाराणा प्रताप और दूसरी ओर राणा पूँजा यानि राजपूत और भील का प्रतीक चिह्न अपनाया गया । हल्दीघाटी के युद्ध में राण पूँजा की भील सेना का योगदान अविस्मरणीय है । महाराणा प्रताप को भील प्रेम से कीका कहकर संबोधित करते थे ।
बप्पा रावल ने सन् 734 ई ० में चित्तौड़ के राजा मानमोरी , जो अरब के इस्लामी आक्रांताओं का सामना करने में कमजोर साबित हुआ , को अपने भील साथियों के सहयोग से अपदस्थ कर दिया । साथ ही अपनी राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित की । इसी वर्ष बप्पा ने ‘ एकलिंग जी के मन्दिर ‘ ( सन् 734 ई ० ) का निण उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में करवाया । इसी के निकट हरित ऋषि का आश्रम भी स्थित है । एकलिंग जी के मंदिर के पीछे ही आदिवराह मन्दिर ( सन् 735 ई ० ) भी बप्पा ने बनवाया ।

शिवभक्त बप्पा रावल एक न्यायप्रिय शासक थे । इनके राज्य में योग्यता का महत्व था । जातिवाद या छुआछूत के घोर विरोधी भी थे । वे राज्य को अपना नहीं मानते थे , बल्कि शवजी के एक रूप ‘ एकलिंग जी ‘ को ही उसका वास्तविक शासक मानते थे और स्वयं उनके प्रतिनिधि अथवा दिवान के रूप में शासन चलाते थे । उनकी मृत्यु सन् 810 ई ० में 97 वर्ष की अवस्था में नागदा में हुई , जहाँ उनकी समाधि स्थित है । ‘ आबू के शिलालेख ‘ , ‘ कीर्ति स्तम्भ शिलालेख ‘ , ‘ रणकपुर प्रशस्ति ‘ , ‘ चचनामा ‘ एवं ‘ हिंगलाज भावानी मंदिर ‘ , पाकिस्तान में भी बप्पा रावल का वर्णन मिलता है ।
प्रमुख इतिहासकार ‘ कर्नल जेम्स टॉड ‘ को 8 वीं सदी का शिलालेख मिला , जिसमें मानमोरी ( जिसे बप्पा रावल ने पराजित किया ) का वर्णन मिलता है । कर्नल जेम्स टॉड ने इस शिलालेख को समुद्र में फेंक दिया । कविराज श्यामलदास के शिष्य गौरीशंकर हीराशंकर ओझा के अनुसार अजमेर से जो स्वर्ण निर्मित सिक्का प्राप्त हुआ वह बप्पा रावल से संबंधित था । इसका भार 114 ग्रेड ( 65 रती ) है । इस सिक्के में आगे की ओर ऊपर के भाग में माला के नीचे ‘ श्री बोप्प ‘ लिखा है । बायीं ओर त्रिशूल है एवं उसकी दाहिनी ओर वेदी पर शिवलिंग बना है इसके दाहिनी ओर नन्दी शिवलिंग की ओर मुख किए बैठा है । शिवलिंग और नन्दी के नीचे दंडवत् प्रणाम करते हुए एक पुरुष की आकृति है । सिक्के में पीछे के भाग में सूर्य और छत्र के चिह्न हैं । इन सब के नीचे दाहिनी ओर मुख किए एक गौ खड़ी है और उसी के पास दूध पीता हुआ बछड़ा है ( शायद इसी कारण इन्हें ‘ कालभोज ग्वाल ‘ कहा गया है ) । ये सब चिह्न बप्पा रावल की शिवभक्ति और उनके जीवन की कुछ घटनाओं से संबद्ध है।
बप्पा रावल की राष्ट्रभक्ति ही थी कि वह हमेशा इस्लामी अरब आक्रांताओं के विरूद्ध रहे । इस्लाम की स्थापना के तत्काल बाद ही अरबी मुस्लिमों ने फारस ( ईरान ) पर अधिकार करने के साथ ही भारत पर आक्रमण आरंभ कर दिया । अल हज्जात का भतीजा एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम , खलीफा की मदद से ब्राह्मण वंशीय राजा दाहिरसेन को कई बार प्रयास करने के पश्चात छल से पराजित करने में सफल हो गया । उसके पश्चात अरबों ने और भी आगे बढ़ते हुए चावड़ों , मोरी , सैंधवों , कच्छेलों आदि को भी पराजित कर दिया । सन् 725 ई ० तक राजस्थान और गुजरात से होते हुए जैसलमेर , मारवाह , मेवाड़ , मालवा , मांडलगढ़ , भरूच , गुजरात आदि पर अरबी म्लेच्छों की सेनाएँ अपना परचम फहराने में सफल हो चुकी थी ।नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से मार भगाया तो बप्पा रावल ने मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेशों से इन म्लेच्छों को खदेड़ा ।

बप्पा रावल ने चित्तौड़ को अपना केन्द्र बनाकर गजनी तथा अन्य खाड़ी राज्यों को भी जीतकर एक सुदृढ़ साम्राज्य की स्थापना की । इनके द्वारा निर्मित संयुक्त सेना में लगभग 12,72,000 सैनिक थे । उन्होंने अरब की हमलावर सेनाओं को कई बार ऐसी करारी हार दी कि अगले तीन सौ वर्षों तक किसी भी विदेशी शासक की हिम्मत भारत की ओर आँख उठाकर देखने की नहीं हुई । बहुत बाद में महमूद गजनवी ने लूटने ने उद्देश्य से भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत की पर उसे भी कई बार मुँह की खानी पड़ी और कई बार पराजित भी होना पड़ा । लगातार सोलह वर्ष तक इन अरब लूटेरों से युद्ध कर बप्पा रावल ने इस भूमि को निरापद कर दिया ।
अपने शौर्य की पताका भारत ही नहीं भारत के बाहर भी फैलाने वाले , शत्रु को उसी की शैली में उत्तर देने वाले , अमानुष म्लेच्छों को घुटने टेकने पर विवश करने वाले बप्पा रावल के बारे में राजस्थानी लोकगीतों में कहा जाता है कि-
” सीमा के बाहर जाकर जिसने केसरिया फहराया ,
भरत भूमि की पावन रज का जिसने मान बढ़ाया ,
ईरान और अफगान सभी को जाकर जिसने जीता ,
टूट पड़ा था यवनों पर वो बप्पा रावल चीता । ”

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