भारत के संविधान से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ हटाने की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय करेगा सुनवाई

लेखक – अभिनय आकाश

प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ हटाने की मांग पर SC करेगा सुनवाई, जानें क्या है संविधान की ‘आत्मा’ से छेड़छाड़ की पूरी कहानी
हम सब भारत के संविधान की कसमें तो खूब खाते हैं या लोगों को खाते हुए सुनते हैं। पर क्या आपने संविधान देखा है? अगर कोई फोटो वगैरह में देखा भी हो तो एक चीज तो आपको पता ही होगी की अपना संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। सोने पर सुहागा ये कि पूरा संविधान हिंदी और अंग्रेजी में लिखा गया। हाथों से कैरीग्राफ किया गया न कोई प्रिटिंग हुआ और न कोई टाइपिंग। इस संविधान के पहले पन्ने पर संविधान की आत्मा है। यानी संविधान की प्रस्तावना। वहीं प्रस्तावना जो हम भारत के लोग से शुरू होती है। इस पन्ने की खासियत ये है कि संविधान में तो संशोधन हुआ करते हैं। लेकिन इस पन्ने पर लिखी बातें को नहीं बदला जा सकता। पर हुआ तो ऐसा भी है। इस पन्ने में भी 1976 में कुछ जोड़ा गया। तब 42वें संविधाव संशोधन के जरिये प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र की अखंडता जैसे शब्द जोड़ दिए गए थे।

आज हम क्यों इसकी चर्चा कर रहे हैं?

पूर्व सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना से “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्दों को हटाने की मांग करते हुए याचिका दायर की गई है। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने डॉ स्वामी की याचिका को इसी तरह की याचिका के साथ पोस्ट किया जो 23 सितंबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। इस मामले में दूसरे याचिकाकर्ता एडवोकेट सत्य सभरवाल हैं। याचिका में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” शब्दों को जोड़ने की वैधता को चुनौती दी गई थी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार इसमें ये तर्क दिया गया कि इस तरह शब्दों को जोड़ना अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन शक्ति से परे है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविधान के किसानों का इरादा कभी भी लोकतांत्रिक शासन में समाजवादी या धर्मनिरपेक्ष अवधारणाओं को पेश करने का नहीं था। कहा गया है कि डॉ बी आर अम्बेडकर ने इन शब्दों को शामिल करने से इनकार कर दिया था क्योंकि संविधान नागरिकों के चयन के अधिकार को छीनकर कुछ राजनीतिक विचारधाराओं पर जोर नहीं दे सकता है।

प्रस्तावना का उद्देश्य क्या है?

हमारे संविधान के प्रस्तावना के साथ 448 अनुच्छेद हैं। 12 अनुसूचियां और पांच परिशिष्ट हैं। प्रस्तावना का मूल विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया है। जिसे दुनिया का सबसे पुराना लिखित संविधान माना जाता है। संविधान के प्रस्तावना को इसकी आत्मा कहा जाता है। इसमें क्या लिखा है-

”हम भारत के लोग, भारत को एक संप्रभुत्व, संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति कि गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 को संविधान को अधिनियमित और आत्मर्पित करते हैं।”

इस प्रस्तावना में संविधान में समाहित जितने भी मूल और आदर्श हैं उनको शामिल किया गया है। लेकिन यहां इस्तेमाल किए गए शब्दों के अर्थ भी आपको समझा देते हैं। हम भारत के लोग का मतलब संविधान जिनसे बना है, जो इस संविधान के स्रोत हैं। संप्रभु यानी ऐसा देश जो दूसरे की प्रभुता से मुक्त हो और अपने सभी निर्णय लेने के लिए पूर्णत: स्वतंत्र हो। समाजवादी शब्द 1976 में 42वें संशोधन के जरिये जोड़ा गया। समाजवाद एक तरह की विचारधारा है जो ये मानती है कि समाज में सभी तरह के लोगों तक संपन्नता का हिस्सा पहुंचना चाहिए। धन संपत्ति भी समाज से ही उपजती है तो उसका बंटवारा भी शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण तरीकों से होना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ ये बताता है कि जैसे पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहं पर सरकार और धार्मिक समूहों के बीच कोई भी संबंध यहां के संविधान और कानून के हिसाब से तय होता है। देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने, उसे अपनाने और उसका प्रचार करने का हक है। किसी के साथ भी उसके धर्म के आधार पर भेदभाव करना गैर कानूनी है। लोकतांत्रिका का धेय है भारत देश की जनता अपने प्रतिनिधि वोट के माध्यम से खुद चुनती है। गणराज्य का मतलब जनता के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष व्यक्ति ही प्रमुख होगा। ये पद वंशानुगत नहीं होगा।

प्रस्तावना पर बहस की शुरुआत

2020 में भाजपा सांसद राकेश सिन्हा ने राज्यसभा में प्रस्तावना से समाजवादी शब्द को हटाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें कहा गया था, “आप एक पीढ़ी को एक विशेष तरीके से सोचने के लिए नहीं बांध सकते। इसके अलावा सात दशकों तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी होने से कल्याण के लिए नव-उदारवाद की दिशा बदल दी । हालांकि, भारत ने 1991 के दौर में नेहरू और इन्दिरा के समाजवाद की बड़ियों में जकड़ी अर्थव्यवस्था को छोड़ पूंजीवादी बाजार की तरफ रुख किया लेकिन संविधान में आज भी समाजवाद व्याप्त है। इससे पहले 2015 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्दों के बिना भारतीय संविधान की प्रस्तावना की एक छवि का इस्तेमाल किया, लेकिन इसको लेकर विवाद भी खूब हुआ। तब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘क्या नेहरू को धर्मनिरपेक्षता की समझ नहीं थी? ये शब्द आपातकाल के दौरान जोड़े गए थे। अब इस पर बहस होने में क्या हर्ज है? हमने राष्ट्र के सामने मूल प्रस्तावना रखी है।” 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘समाजवादी’ शब्द को हटाने की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। इस दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि “आप समाजवाद को कम्युनिस्टों द्वारा परिभाषित संकीर्ण अर्थ में क्यों लेते हैं? भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि व्यापक अर्थ में इसका मतलब नागरिकों के लिए कल्याणकारी उपाय है। यह लोकतंत्र का एक पहलू है। इसका कोई निश्चित अर्थ नहीं है। अलग-अलग समय में इसका अलग-अलग अर्थ होता है।”

प्रस्तावना में किन परिस्थितियों में संशोधन किया गया?

इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” जैसे नारों के साथ एक समाजवादी और गरीब-समर्थक छवि के आधार पर जनता के बीच अपनी स्वीकृति को मजबूत करने का प्रयास किया था। लेकिन गौर करने वाली बात है कि संविधान में 42वां संशोधन, 1976 में पारित हुआ जब आपातकाल लागू था। इस दौरान “संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य” शब्दों को “संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य” से बदल दिया गया। इस दौरान “राष्ट्र की एकता” शब्द को “राष्ट्र की एकता और अखंडता” में भी बदल दिया। अनुच्छेद 368(2) के तहत, संसद “प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत से और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक विधेयक पारित करके संविधान में संशोधन कर सकती है। उसके बाद, विधेयक “राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाएगा जो अपनी सहमति देंगे … और उसके बाद संविधान में संशोधन किया जाएगा”। 42वें संशोधन में कई अन्य प्रावधान थे, जिसके द्वारा इंदिरा सरकार ने सत्ता को और केंद्रीकृत करने की कोशिश की थी। हालांकि इनमें से कुछ को आपातकाल के बाद सत्ता में आई जनता सरकार ने पलट दिया था।

क्या प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है?

जवाब है- हां, साल 1973 में केशवानंद भारती केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रस्तावना भी संविधान का ही एक हिस्सा है और संसद के पास प्रस्तावना में संशोधन करने का पूरा अधिकार है। प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार ही संशोधन किया गया है। 1976 में इंदिरा सरकार ने 42वें संशोधन के जरिये इसमें समाजनाद, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र की अखंडता जैसे शब्द जोड़ दिए थे।

क्या आजादी से पहले ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ पर बहस हुई थी?

संविधान सभा में बहस के दौरान के टी शाह और ब्रजेश्वर प्रसाद जैसे सदस्यों ने इन शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ने की मांग उठाई थी। हालाँकि, डॉ बीआर अम्बेडकर ने तर्क दिया: “राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज को उसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, यह ऐसे मामले हैं जिन्हें लोगों को समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं तय करना होगा। इसे संविधान में ही निर्धारित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह पूरी तरह से लोकतंत्र को नष्ट कर देगा। अपनी याचिका में, डॉ स्वामी ने अंबेडकर के वक्तव्यों का उल्लेख किया है। अम्बेडकर ने यह भी कहा, “मेरा तर्क यह है कि इस संशोधन में जो सुझाव दिया गया है वह पहले से ही प्रस्तावना के मसौदे में निहित है”। दरअसल, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की पुष्टि करने वाले कई सिद्धांत मूल रूप से संविधान में निहित थे, जैसे कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में जो सरकार को उसके कार्यों में मार्गदर्शन करने के लिए है।

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