आलोचना और निंदा का भेद

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आलोचना और निंदा का भेद जरा बारीक है और समझ में न आये तो भूल हो सकती है। आलोचना तो बुद्ध ने भी की, महावीर ने भी की। आलोचना तो क्राइस्ट ने भी की, मुहम्मद ने भी की। ऐसा कोई सदगुरु नहीं हुआ पृथ्वी पर जिसने आलोचना न की हो।

भेद क्या है? आलोचना और निंदा का भेद सूक्ष्म है। कभी-कभी निंदा आलोचना जैसी मालूम हो सकती है और कभी-कभी आलोचना निंदा जैसी मालूम हो सकती है। बहुत करीब नाता-रिश्ता है। उनका रूप-रंग एक जैसा है, मगर उनकी आत्मा बड़ी भिन्न है। आलोचना होती है करुणा से, निंदा होती है घृणा से। आलोचना होती है जगाने के लिए, निंदा होती है मिटाने के लिए। आलोचना का लक्ष्य होता है सत्य का आविष्कार, निंदा का लक्ष्य होता है दूसरे के अहंकार को गिराना, धूल-धूसरित करना, पैरों में दबा देना। निंदा का लक्ष्य होता है दूसरे की आत्मा को कैसे चोट पहुंचाना, कैसे घाव करना? आलोचना का लक्ष्य होता है, सत्य को कैसे खोजें? धूल में पड़ा हीरा है, इसे कैसे धो लें, शुद्ध कर लें?

आलोचना अत्यंत मैत्रीपूर्ण है, चाहे कितनी ही कठोर क्यों न हो, फिर भी उसमें मैत्री है और निंदा चाहे कितनी ही मधुर क्यों न हो, मीठी क्यों न हो, उसमें जहर है। शायद जहर ही शक्कर में लपेटकर दिया जा रहा है।
निंदा उठती है अहंकार-भाव से–मैं तुम से बड़ा, तुम्हें छोटा करके दिखाऊंगा। आलोचना का संबंध अहंकार से नहीं है। आलोचना का संबंध मैं-तू से नहीं है।

आलोचना इस बात का अन्वेषण है कि सत्य क्या है, सत्य कैसा है? आलोचना बहुत कठोर हो सकती है, क्योंकि कभी-कभी असत्य को काटने के लिए कृपाण का उपयोग करना होता है। असत्य की चट्टानें हैं तो सत्य के हथौड़े और छैनियां बनानी पड़ती हैं।

आखिर गोरख हथौड़ी और छैनी की चोट कर रहे हैं। फिर गोरख के पीछे आनेवाले कबीर और भी धार रखते हैं, तलवार पर और धार आ जाती है! कबीर की चोट ऐसी है कि टुकड़े-टुकड़े कर जाये; लेकिन तुम्हें नहीं टुकड़े-टुकड़े कर जाये, तुम्हारे असत्य को। जब तुम चोर पर हमला कर दो तो निंदा है और जब तुम चोरी पर हमला करो तो आलोचना। जब तुम पापी को घृणा करने लगो तो निंदा और जब तुम पाप को घृणा करो तो आलोचना।

निंदा तो योगी नहीं कर सकता। निंदा का तो रस ही अत्यंत मूर्च्छित व्यक्ति में होता है। निंदा का मनोविज्ञान क्या है? दुनिया के अधिकतम लोग निंदा में पड़े होते हैं; मनोविज्ञान क्या है? मनोविज्ञान बहुत सीधा-साफ है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि मेरे अहंकार की प्रतिष्ठा हो, कि मैं सबसे बड़ा! इसको सिद्ध करना बहुत कठिन है। मैं सबसे बड़ा, यह बात सिद्ध करनी बहुत कठिन है, क्योंकि और भी सभी लोग इसी को सिद्ध करने में लगे हैं। और वे लोग एक ही बात को सिद्ध करना चाहते हैं कि मैं सबसे बड़ा। कितने लोग बड़े हो सकते हैं? इतना घमासान चलेगा, इसमें जीत करीब-करीब असंभव है, कौन जीत सकेगा? एक-एक आदमी अरबों आदमियों के खिलाफ लड़ेगा, हार निश्चित है। यहां सभी हार जायेंगे। यहां कोई ऊपर चढ़ नहीं सकता। तो फिर एक सुगम उपाय खोजता है मन। मन कहता हैः मैं सबसे बड़ा हूं, यह तो सिद्ध करना कठिन है; लेकिन कोई मुझसे बड़ा नहीं है, यह सिद्ध करना आसान है।

ख्याल रखना, किसी चीज की विधायकता को सिद्ध करना सदा कठिन होता है, नकारात्मक वक्तव्य सदा आसान होता है। जैसे अगर सिद्ध करना चाहो कि ईश्वर है तो बहुत कठिन बात है। जीवन को तपश्चर्या में अग्नि से गुजारना होगा, तब भी कब हो पायेगी यह सिद्धि, कुछ पता नहीं–इस जन्म में, जन्मों-जन्मों में। लेकिन ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करना हो तो अभी हो सकता है। इसमें कुछ अड़चन नहीं है; जरा-सी तर्क-कुशलता चाहिए, बस। नास्तिक होना कोई बड़ी कुशलता की, बुद्धिमानी की बात नहीं है; बुद्धू से बुद्धू आदमी नास्तिक हो सकता है।

तुर्गनेव की प्रसिद्ध कथा हैः महामूर्ख। एक गांव में एक महामूर्ख था। वह बहुत परेशान था, क्योंकि वह कुछ भी कहता लोग हंस देते; लोग उसको महामूर्ख मान ही लिये थे। वह कभी ठीक भी बात कहता तो भी लोग हंस देते। वह सिकुड़ा-सिकुड़ा जीता था, बोलता तक नहीं था। न बोले तो लोग हंसते थे, बोले तो लोग हंसते थे। कुछ करे तो लोग हंसते थे, न करे तो लोग हंसते थे। उस गांव में एक फकीर आया। उस महामूर्ख ने रात उस फकीर के चरण पकड़े और कहा कि मुझे कुछ आशीर्वाद दो, मेरी जिंदगी क्या ऐसे ही बीत जायेगी सिकुड़े-सिकुड़े? क्या मैं महामूर्ख की तरह ही मरूंगा, कोई उपाय नहीं है कि थोड़ी बुद्धि मुझमें आ जाये?

उस फकीर ने कहाः उपाय है, यह ले सूत्र, तू निंदा शुरू कर दे। उसने कहाः निंदा से क्या होगा? फकीर ने कहाः सात दिन तू कर और फिर मेरे पास आना। उस महामूर्ख ने पूछाः करना क्या है निंदा में? उस फकीर ने कहाः कोई कुछ भी कहे, तू नकारात्मक वक्तव्य देना। जैसे कोई कहे कि देखो, कितना सुंदर सूरज निकल रहा है! तू कहना इसमें क्या सुंदर है? सिद्ध करो, सुंदर कहां है, क्या सुंदर है? रोज निकलता है, अरबों-खरबों सालों से निकल रहा है। आग का गोला है, सुंदर क्या है? कोई कहे कि देखो, जीसस के वचन कितने प्यारे हैं! तू तत्क्षण टूट पड़ना कि क्या है इसमें प्यारा, कौन-सी बात खूबी की है, कौन-सी बात नयी है? सदा से तो यही कहा गया है, सब पिटा-पिटाया है, सब बासा है, सब उधार है। तू नकार ही करना। कोई सुंदर स्त्री को देखकर कहे कितनी सुंदर स्त्री है! तू कहना इसमें है क्या? जरा नाक लंबी हो गयी तो हो क्या गया, कि रंग जरा सफेद हुआ तो हो क्या गया? सफेद तो कोढ़ी भी होते हैं। सुंदर कहां है, सिद्ध करो। तू हर-एक से प्रमाण मांगना और ख्याल रखना यह कि हमेशा नकार में रहना; उनको विधेय में डाल देना, तू नकार में रहना। सात दिन बाद आ जाना।

सात दिन बाद तो जब आया महामूर्ख तो अकेला नहीं आया, उसके कई शिष्य हो गये थे। वह आगे-आगे आ रहा था। फूल-मालाएं उसके गले में डली थीं। बैंड-बाजे बज रहे थे। उसने फकीर से कहा कि तरकीब काम कर गयी! गांव में एकदम सन्नाटा खिंच गया है, जहां निकल जाता हूं लोग सिर नीचा कर लेते हैं। लोगों में खबर पहुंच गयी है कि मैं महामेधावी हूं। मेरे सामने कोई जीत नहीं सकता। अब आगे क्या करना है?

उसने कहाः अब आगे तो कुछ करना ही मत, बस तू इसी पर रुके रहना। अगर तेरे को मेधा बचानी है, कभी विधेय में मत पड़ना। ईश्वर की कोई कहे तो तत्क्षण, तत्क्षण नास्तिकता प्रकट करना। जो भी कहा जाये, तू हमेशा नकारात्मक वक्तव्य देना, तुझे कोई न हरा सकेगा; क्योंकि नकारात्मक वक्तव्य को असिद्ध करना बहुत कठिन है। विधायक वक्तव्य को सिद्ध करना बहुत कठिन है।

ईश्वर को स्वीकार करने के लिए बड़ी बुद्धिमत्ता चाहिए, बड़ी सूक्ष्म संवेदना चाहिए। हृदय का अत्यंत जागरूक रूप चाहिए। चैतन्य की निखरी हुई दशा चाहिए। भीतर थोड़ी रोशनी चाहिए। लेकिन ईश्वर को इनकार करने के लिए कुछ भी नहीं चाहिए। कोई अनिवार्यता नहीं है ईश्वर को इनकार करने के लिए। इसलिए लोग दुनिया में निंदा करते हैं।

निंदा का मनोविज्ञान सस्ता मनोविज्ञान है, सुगम उपाय है। इससे तुम्हारी प्रतिभा सिद्ध होगी। और उसमें कुछ खर्च पड़ता ही नहीं। हल्दी लगे न फिटकरी रंग चोखा हो जाये। इसमें कुछ खर्च होता ही नहीं। इसे सीखने कहीं जाने की जरूरत नहीं। इसके लिए कोई सत्संग करना आवश्यक नहीं। इसलिए हर आदमी निंदा में कुशल है।

जय श्री नाथ जी की

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