मूक प्राणियों का वध किया जाना अनैतिकता और अधर्म को प्रोत्साहित करना है : सरकार को समझना चाहिए अपना राजधर्म

ईद के अवसर पर दी जा रही निरीह प्राणियों की बलि के अवसर पर विशेष

आज मेरा हृदय बहुत ही व्यथित है, क्योंकि आज बहुत सारे निरीह, निरपराध,मूक प्राणियों यथा ऊंट, बकरा, मेंढें, गाय आदि का वध ‘अल्लाह’ के नाम पर किया जाएगा।
सचमुच कैसी विडंबना है अल्लाह के नाम पर मूक प्राणियों का वध ? जो सब प्राणियों का निर्माता है, सृजनहार है , उसी के नाम पर उसी के बनाए हुए प्राणियों का संहार करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
कितना आश्चर्यजनक लगता है कि जब मीडिया में कोई बोलता है कि आज ईद के अवसर पर मुस्लिम भाइयों ने अमन व भाईचारे की नमाज अदा की एक तरफ हिंसा और दूसरी तरफ अमन परस्पर विरोधाभासी है यह कितना बड़ा झूठ प्रचारित किया जाता है।
जनपद गाजियाबाद के दिल्ली सीमा पर स्थित
लोनी क्षेत्र के विधायक श्री नंदकिशोर गुर्जर को टीवी डिबेट में पशु हिंसा निषेध एवं पशु क्रूरता निवारण के विषय पर सुना, जिनकी आलोचना हुई , तो भी उन्होंने अपनी आलोचना की कोई परवाह नहीं की । क्योंकि उनके द्वारा कही हुई बात कुरान पाक के अनुसार है । जिस देश में सच को कहना विवादास्पद माना जाता हो , उस देश में सत्य के महिमामंडन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सत्य वहीं महिमामंडित और सुशोभित होता है , जहां सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने की उत्कट और प्रबल इच्छा होती है। यहां शासन और शासन में बैठे लोगों में सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने की इच्छा शक्ति नहीं है। इसलिए लोनी विधायक माननीय श्री गुर्जर जैसे लोगों को अपने शब्द संशोधन करने के लिए ही मजबूर किया जाता है। यह बात अलग है कि वह किसी दबाव के आगे झुके नहीं।
परंतु आज देश में श्री गुर्जर जैसे राजनीतिज्ञ और सामाजिक लोग कम ही हैं। अधिकतर राजनीतिज्ञ राष्ट्र की चिंता नहीं कर के वोटों की चिंता वसत्ता प्राप्त करने की युक्ति में अथवा तुष्टीकरण में लगे रहते हैं। यह देश की विडंबना है।

यदि लोगों को में सच को स्वीकार करने की सामर्थ्य एवं हिम्मत होती तो कई लोग श्री गुर्जर के समर्थन में सामने आते और वह कहते कि उन्होंने जो कुछ कहा है वह कुरान पाक के विपरीत नहीं है। इसलिए विवादास्पद बयान श्री गुर्जर का न होकर वह व्यवस्था ही विवादास्पद है जो निरीह प्राणियों के वध करने की आज्ञा देती है।
कुरान शरीफ को व इंजील को खुदा की किताब माना गया। सर्वप्रथम हम देखें कि इंजील में क्या लिखा है :-

“शराब व मांस खाने का निषेध (इंजील से) भला तो यह है कि तू माँस न खाए और न तू दाख रस पीए न और कुछ ऐसा करें जिससे तेरा भाई ठोकर खाए।”
21 रोमियो 14 ।
मांस खाने की आज्ञा (कुरान से)
“और हमने तुम्हारे लिए कुर्बानी के ऊंटों को उन चीजों में कर दिया जो खुदा के साथ नामजद की जाती हैं। उनमें तुम्हारे लिए फायदे हैं तो उनको खड़ा रखकर उन पर खुदा का नाम लो, (तब उसकी छाती में भाला मारो )फिर जब वह किसी पहलू पर गिर पड़े तो उसमें से खाओ और सब्र वालों और फकीरों को खिलाओ। हमने तुम्हारे बस में उन जानवरों को कर दिया है ताकि तुम शुक्र करो। 36 ।”
(कु,पा,17, सू, हज्ज रू,5)

“दरियाई शिकार और खाने की दरियाई चीज तुम्हारे लिए हलाल की जाती हैं ताकि तुमको और मुसाफिरों को लाभ पहुंचे। 36 ।”
( कु,पा,7 माईदा रू 13 )
“वही जिसने नदी को अधीन कर दिया ताकि तुम उसमें से मछलियां निकाल कर उनका ताजा मास खाओ—-(14 कु ,पा,14 सु, नहल रू,2)
“वह चीज मुर्दार हो या बहता हुआ खून या सूअर का मांस यह नापाक है, या हुकुम उदुली का सबब हो या खुदा के सिवाय किसी दूसरे के नाम पर जिबह हो उस पर भी जो शख्स लाचार हो तो सभी कुछ खा लेंगे ।तेरा परवरदिगार माफ करने वाला मेहरबान है” (145 कुरान पाक 8 सु अन याम रू, 18 ।)
वक्तव्य – इंजील का कुरान से मांसाहार पर विरोध स्पष्ट है, जबकि कुरान को इंजील की हर बात का समर्थन करना उचित ही नहीं आवश्यक है।
“खुदा मांस, खून ,चर्बी खाता है।
मेरे सेवा टहल करने को मेरे समीप आया करें और मुझे चर्बी और लोहू चढ़ाने को मेरे सम्मुख खड़ा हुआ करें परमेश्वर यहोवा की यही वाणी है।” (45 । 15 ।।)
यहोवा (जो महान से भी महान होता है उसको कहते हैं)अर्थात खुदा कहता है तुम्हारे मेल बली मेरे किस काम के हैं मैं तो मेंढे के होम बलियों से पाले हुए पशुओं की चर्बी से अघा गया हूं याशा याह 1 । 11″
खुदा तक गोश्त में खून नहीं पहुंचते हैं।
“खुदा तक न तो गोश्त ही पहुंचते हैं और न इनके खून”
(कुरान पाक 17 सु हज़्ज रू 5 , 37)
हमारा वक्तव्य – कुरान ने बाइबल की बात का खंडन किया है यह स्पष्ट है। दोनों की व्यवस्थाएं परस्पर विरोधी हैं जबकि दोनों किताबें कुरान में खुदाई मानी है।
“ऊंट का मांस खाने का निषेध, (तौरात से)
1 – फिर यहोवा या खुदा ने मूसा और हारून से कहा
2 – इजराइली से कहो कि जितने पशु पृथ्वी पर हैं उन सबों में से तुम जीवधारियों का मांस खा सकते हो।
3 – पशुओं में जितने चिरे व फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं उन्हें खा सकते हैं।
4 – परंतु पागुर करने वाले व फटे खुरों वालों में से इन पशुओं को न खाना अर्थात ऊंट जो पगुर करता है , परंतु चिरे खुर का नहीं होता इसलिए यह तुम्हारे लिए अशुद्ध ठहरा है। (तौरात ले , व्यवस्था)

हमारा वक्तव्य – तौरात में ऊंट मार कर खाना वर्जित किया जा चुका था, किंतु कुरान में उसे खाना जायज लिखा गया ।स्पष्ट है कि कुरान में तौरात की खुदाई व्यवस्था का खंडन है । फिर दोनों किताबों को खुदाई कैसे माना जा सकता है ? जबकि उनमें परस्पर विरोधी बातों की भरमार मौजूद है।
(कुरान की छानबीन पुस्तक ,लेखक श्रीराम आर्य से साभार)
“फिर वह घटना याद करो जब मूसा ने अपनी जाति वालों से कहा कि अल्लाह तुम्हें एक गाय जिबह करने का हुक्म देता है। कहने लगे क्या तुम हमसे मजाक करते हो ? मूसा ने कहा मैं इससे अल्लाह की पनाह मांगता हूं कि अज्ञानी जैसी बातें करूं। बोले – अच्छा अपने प्रभु से प्रार्थना करो कि वह हमें उस गाय के बारे में कुछ विस्तार से बताएं ।मूसा ने कहा अल्लाह कहता है कि वह गाय ऐसी होनी चाहिए जो न तो बूढ़ी हो, न बछिया बल्कि मध्य आयु की हो। अतः जो हुक्म दिया जाता है उसका पालन करो। फिर कहने लगे , अपने प्रभु से यह और पूछ लो कि उसका रंग कैसा हो ? मूसा ने कहा वह कहता है पीले रंग की गाय होनी चाहिए, जिसका रंग ऐसा चटकीला हो कि देखने वालों का मन प्रसन्न हो जाए। फिर बोले – अपने प्रभु से स्पष्ट रूप से पूछ कर बताओ , कैसी गाय चाहिए ? हमें उसके निर्धारण में घपला हो रहा है ।अल्लाह ने चाहा तो हम उसका पता पा लेंगे ।मूसा ने उत्तर दिया – अल्लाह कहता है कि वह ऐसी गाय है जिससे सेवा कार्य नहीं लिया जाता, न भूमि जोतती है, न पानी खींचती है, भली चंगी और बेदाग है। इस पर वे पुकार उठे , हां ! अब तुमने ठीक पता बताया ।फिर उन्होंने उसे जिबह किया अन्यथा वे ऐसा करते मालूम न होते थे।”
(पारा एक, सूरा दो, अल बकरा)
इसका स्पष्टीकरण दिया है जो निम्न प्रकार है :-
“क्योंकि इजराइल के वंशजों को मिश्र निवासियों और अपनी पड़ोसी जातियों से गाय की महानता, पवित्रता और गौ पूजा के रोग की छूत लग गई थी और इसी कारण उन्होंने मिस्र से निकलते ही बछड़े को देवता बना लिया था। इसलिए उन्हें आदेश दिया गया कि गाय जिबह करें। उन्होंने टालने की कोशिश की और विवरण पूछने लगे मगर जितना – जितना विस्तार में जाते गए ,इतने घिरते चले गए । यहां तक कि अंत में उसी विशेष प्रकार की सुनहरी गाय पर जिसे उस समय पूजा के लिए खास किया जाता था, मानो उंगली रख कर बता दिया , इसे जिबह करो।”

उपकारी पशुओं की हिंसा का निषेध

“जिसमें उपकारक प्राणियों की हिंसा अर्थात जैसे एक गाय के शरीर से दूध ,घी बैल, गाय उत्पन्न होने से एक पीढ़ी में 4,75,600 मनुष्यों को सुख पहुंचता है। वैसे पशुओं को न मारे ,न मारने दें ।जैसे किसी गाय से 20 सेर और किसी से दो सेर दूध प्रति दिन हो गए उसका मध्य भाग 11 सेर प्रत्येक गाय से दूध होता है। कोई गाय 18 और कोई 6 महीने तक दूध देती है। उसका मध्य भाग 12 महीने हुआ ।अब प्रत्येक गाय के जन्म भर के दूध से 24,9 60 मनुष्य एक बार में तृप्त हो सकते हैं ।उसके 6 बछिया ,6 बछड़े होते हैं। उनमें से दो मर जाए तो भी 10 रहे । उनमें से पांच बछड़ी के जन्म भर के दूध को मिलाकर 1,24,800 मनुष्य तृप्त हो सकते हैं। अब रहे 5 बैल वे जन्म भर में 5000 मन अन्न कम से कम उत्पन्न कर सकते हैं ।उसमें से प्रत्येक मनुष्य 3 पाव खावे तो ढाई लाख मनुष्यों की तरह की तृप्ति होती है। दूध और अन्न मिला करके 3,74,800 मनुष्य तृप्त होते हैं ।दोनों संख्या मिलाकर एक गाय की एक पीढ़ी में 4,75,600 मनुष्य 1 बार तृप्त होते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाकर लिखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है ।इससे भिन्न बैलगाड़ी, सवारी, भार उठाने आदि कर्मों से मनुष्यों के बड़े उपकारक होते हैं। तथा गाय दूध में अधिक उपकारक होती है और जैसे बैल उपकारक होते हैं , वैसे भेंसे भी हैं ।परंतु गाय के दूध से जितने बुद्धि वृद्धि से लाभ होते हैं, उतने भैंस के दूध से नहीं। इससे मुख्य उपकारक आर्यों ने गाय को गिना है और जो कोई अन्य विद्वान होगा वह भी इसी प्रकार समझेगा ।बकरी के दूध से 25,920 आदमियों का पालन होता है। वैसे हाथी ,घोड़े ,ऊंट, भेड़ ,गधे आदि से बड़े उपकार होते हैं। इन पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा। देखो जब आर्यों का राज्य था ,तब यह महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे ।तभी आर्यवर्त व अन्य भूगोल देशों में बड़े आनंद में मनुष्य आदि प्राणी वर्तते थे ।क्योंकि दूध, घी, बैल, आदि पशुओं की अधिकता होने से अन्न , रस, पुष्कल, प्राप्त होते थे जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकर गो आदि पशुओं के मारने वाले, मद्यपानी ,राजा ,अधिकारी हुए हैं ।तब से क्रमश:आर्यों के दुख की बढ़ती होती जाती है। जब वृक्ष का मूल ही काट दिया जाए तो फल फूल कहां से हो अर्थात जब पशु ही नहीं रहेंगे तो उनके बच्चे कहां से होंगे ?
(महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, दशम समुल्लास से साभार)

अब थोड़ा हिंदुओ की अज्ञानता पर भी विचार करते हैं। तथाकथित
हिंदुओं की मूर्खता यह रही कि उन्होंने अर्थ का अनर्थ किया और यज्ञ में पशुओं की बलि देनी प्रारंभ की ।जैसे बंगाल में आज भी होता है काली के उपासक पशुओं की बलि देते हैं ।यहां तक कि बंगाल में नरबलि भी दी जाती है।
“अजय मेघ यज्ञ अथ वा अजा मेघ यज्ञ ।
अजय मेघ यज्ञ किसको कहते हैं ? अजय शब्द के अनेक अर्थ जैसे माता, पृथ्वी, यज्ञ, राष्ट्र और प्रजा अर्थ होते हैं । मेघ शब्द के यज्ञ और राजा अर्थ होते हैं । अजा शब्द के बकरी तथा वेदी अर्थ होते हैं।
इसके अलावा गो मेघयज्ञ भी होता है। गो नाम के अर्थ पृथ्वी और इंद्रिया दोनों को किया जाता है ।इंद्रियों के द्वारा विषयों का, तथा पदार्थों के गुणों का ज्ञान होता है। पृथ्वी का मुख्य गुण गंध है तो आज गंध को जानना है। गंध कहां से आती है ? किस स्थान से प्रकट होती है ? कौन-कौन से तत्वों से मिलकर बनती है? इसका जानना ही गौ मेघ यज्ञ कहलाता है।
प्रसंग के अनुसार जिस शब्द के जिस अर्थ की आवश्यकता हो उसी का ग्रहण आवश्यक है ।उसी का प्रयोग अनिवार्य है ।अन्य अर्थ का नहीं ।उसी से मानव का विकास होता है। उसी से मानव का आत्मा उच्च बनता है। अन्यथा नहीं क्योंकि अज्ञान अंधकार में मनुष्य चला जाएगा।
(जैसा कि हिंदू अंधकार में गया भी है )
यहां पर अजा जो बकरी का भी अर्थ है और वेदिका भी अर्थ है , अज्ञानी लोगों ने बकरी अथवा बकरा को यज्ञ वेदी में बलि चढ़ाना अनर्थ करके प्रारंभ किया था। जिससे मानव का पतन हुआ।
इसी को आधार बनाते हुए वैदिक सभ्यता वैदिक धर्म वैदिक संस्कृति वैदिक परंपरा वैदिक शिक्षा को तिलांजलि देते हुए वेदों में मांस भक्षण का निराधार आरोप लगाकर हम उपहास का कारण बने हैं।
मेघ नाम आत्मा का भी है।अजा नाम इसकी प्रजा का है। आत्मा की प्रजा चित् , बुद्धि और अहंकार होते हैं। यह ज्ञानेंद्रियां व कर्मेंद्रियां भी आत्मा के ही परिवार हैं। इस महान परिवार को कौन चलाने वाला है ? जब हम आत्मा को , उसके परिवार को भली प्रकार से जान जाते हैं , तब हम आत्मतत्व के जानकार बन जाते हैं। इसी प्रकार जो राजा अजय मेघ यज्ञ करने वाले होते हैं , वह प्रजा के भावों को जान लेते हैं। साथ में राष्ट्र के ब्राह्मणों की परीक्षा हो जाती है कि मेरे राज्य में कैसे-कैसे बुद्धिमान लोग हैं ?
अश्वमेध यज्ञ व इंद्र की उपाधि क्या है?
अजामेघ यज्ञ के अतिरिक्त अश्वमेध यज्ञ का भी विधान है। यह क्या होता है ?
हमारे आर्यावर्त में इंद्र की उपाधि हुआ करती थी और इंद्र की उपाधि का अभिप्राय यह है कि जो 101 अश्वमेध यज्ञ करा लेता है ,उसको इंद्र की उपाधि मिलती थी।
अश्वमेध का अभिप्राय यह है कि जो संसार को विजय करके अपनी भावनाओं से, अपनी विद्या से, अपने बल से जो यज्ञ कर देता है उस 101 यज्ञ करने वाले को हमारे यहां इंद्र की उपाधि प्रदान की जाती थी ।
क्योंकि इंद्र किसे कहा जाता है ?
जितना भी राष्ट्रमंडल होता है ,(अर्थात जितने भी राष्ट्र होते हैं भूमंडल पर)उस राष्ट्रमंडल का नेतृत्व करने वाला एक होता है। एक ही नियमावली बनाने वाला होता है ।और सर्व राष्ट्रों को अपने नियंत्रण में लाने वाला हो । ऐसे राजा को इंद्र कहा जाता है ।संसार में जिसका कोई विरोध न कर सके, जिसका कोई विरोधी नहीं हो, परंतु यदि विरोधी भी हो तो अपनी विद्या से, अपने बल से उसको विजय करने वाला हो । उस राजा को हमारे यहां इंद्र कहा जाता था।
लेकिन हमने अश्वमेध यज्ञ का अर्थ सही संदर्भ में न लेते हुए तथा अनर्थ करते हुए यज्ञ वेदी में घोड़े की बलि देना जिस दिन प्रारंभ कर दिया उस दिन से मानव का पतन प्रारंभ हुआ।
जिस दिन से हमने सही अर्थ को नहीं समझा, सही संदर्भ में उसको ग्रहण नहीं किया ,जब से हम अज्ञानी हो गए ,जब से हमने वेदो, शास्त्रों ,आर्ष साहित्य, सत साहित्य का अध्ययन करना छोड़ दिया तब से अज्ञान अंधकार में वृद्धि हुई।
जिस दिन आर्यावर्त का निवासी अश्वमेध यज्ञ करने से अलग हुआ उसी दिन से संसार में भिन्न भिन्न प्रकार के मत मतान्तर उत्पन्न हुए और सर्व राष्ट्रों को जो हम कभी नियंत्रण में लिया करते थे उनसे हमारा नियंत्रण समाप्त हुआ । जब नियंत्रण समाप्त हुआ तो अपनी विद्या और अपने बल से एक उपवाक रीति को राजा बनाता था , वह नहीं रही। विद्वान और ब्राह्मण भी नहीं रहे जो सही संदर्भ को मानव को समझाते और बताते थे।
इसलिए पशुओं की हिंसा जैसी कुप्रथा प्रारंभ हुई।

मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है। मेध शब्द के 3 अर्थ हैं- 1. मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, 2. लोगों में एकता अथवा परस्पर प्रेम को बढ़ाना, 3. हिंसा। इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है।

मेध शब्द का अर्थ

विद्वानों की मान्यता है कि जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसारहित’ कहा गया है तो उसके संदर्भ में ‘मेध’ का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाए? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी’ कहे जाते हैं और इसी तरह लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते हैं ? या बुद्धिमान होने के कारण?
अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व की बलि देना नहीं है अपितु शतपथ 13.1.6.3 और 13.2.2.3 के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किए जाने वाले सभी कार्य ‘अश्वमेध’ है ।
गौमेध का अर्थ यज्ञ में गौ की बलि देना नहीं है अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों (गौ)को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, धरती को पवित्र या साफ रखना ‘गोमेध’ यज्ञ है। गौ शब्द का अर्थ इंद्रिय भी होता है ।‘गौ शब्द का एक और अर्थ है पृथ्वी। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना ‘गोमेध’ कहलाता है।
नरमेध का अर्थ है मनुष्य की बलि देना नहीं है अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह-संस्कार करना नरमेध यज्ञ है। मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है।
अजमेध का अर्थ बकरी आदि की यज्ञ में बलि देना नहीं है अपितु अज कहते हैं बीज, अनाज या धान आदि कृषि की पैदावार बढ़ाना है। अजमेध का सीमित अर्थ अग्निहोत्र में धान आदि की आहुति देना है।

राज धर्म और प्रजाहित चिंतन

हमारे देश में प्राचीन काल से ही राज धर्म में प्रजा हित चिंतन को सर्वोपरि स्थान दिया गया है । प्रजा हित चिंतन का अभिप्राय है कि राजा प्रत्येक प्राणी के जीवन की रक्षा का संकल्प ले। वह राजा राजा नहीं होता जो निरीह प्राणियों के वध करने की आज्ञा देता हो।कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजधर्म की चर्चा की गई है। वहां प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित माना गया है । स्पष्ट है कि प्रजा के हितचिंतन में लगा हुआ राजा उसके सुख में ही अपना सुख अनुभव करने वाला हो । ऐसे में राजा के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह चौबीसों घंटे प्रजाहितचिंतन के कार्यों में लगा रहे ।महामनीषी कौटिल्य इस विषय में चर्चा करते हुए कहते हैं कि —
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)
भावार्थ -प्रजा के सुख में राजा को अपना सुख अनुभव करना चाहिए । यदि प्रजा सुखी है तो ही उसे स्वयं को भी सुखी अनुभव करना चाहिए और यदि प्रजा दुखी है तो उसके दुखों के निवारण में अपने आपको , अपनी राजशक्ति को और अपने कर्मचारियों को झोंक देना चाहिए । उसे यह अनुभव करना चाहिए कि प्रजा के हित में ही उसका हित है। क्योंकि राजा का अपना प्रिय अर्थात स्वार्थ कुछ भी नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।
स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति॥
(अर्थशास्त्र 1/3)

भावार्थ – राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने धर्म का पालन करने में सदा तत्पर रहे । साथ ही अपनी प्रजा को भी धर्म पालन करने के लिए प्रेरित करता रहे । कभी भी और किसी भी परिस्थिति में अपने प्रजाजनों को अधर्म की ओर प्रेरित करने वाला न हो । यदि अधर्म , अनीति और अन्याय के लिए राजा अपने परिजनों को प्रोत्साहित करेगा तो उसके राज्य में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी । जिसे वह कभी समाप्त नहीं कर पाएगा । राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। अतः कहा गया है कि राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है। एक राजा का धर्म युद्धभूमि में अपने शत्रुओं को मारना ही नहीं होता , अपितु अपनी प्रजा को बचाना भी होता है ।

राजा वही उत्तम होता है जो व्यक्ति के आत्मिक और जागतिक कल्याण में लगा रहे ।प्राणियों का वध करवा करवा कर जो राजा उनका वंश नाश करता है वह प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण पाप का भागी होता है। यदि आज की व्यवस्था कुछ प्राणियों का विनाश करने की अनुमति देती है और उस राज आज्ञा के वशीभूत होकर कुछ लोग आज करोड़ों प्राणियों का नाश कर रहे हैं तो यह व्यवस्था सचमुच में वैदिक एवं धार्मिक व्यवस्था नहीं है।
बल्कि वैदिक धर्म तो प्रकृति एवं पशु आदि की उचित देखभाल करने और संरक्षित करने की भी बात करता है। जो परिपाटी आज भी ग्रामीण भारत में दीपावली के अवसर पर अपने पशुओं को सांप शुद्ध करके तेल आदि की मालिश करते हुए सुखी रखने का प्रयास किया जाता है।

राजा के दिव्य 8 गुण

भारत के राजाओं की यह एक विशेषता रही है कि वह अपनी प्रजाओं की सुख – सुविधाओं और ऐश्वर्यों की वृद्धि के लिए सदा सचेष्ट रहते थे । महर्षि मनु ने ही राजा के बारे में व्यवस्था दी है कि यह सभेश अर्थात राजा जो कि परम विद्वान और न्यायकारी है , इन्द्रअर्थात विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकर्त्ता , वायु के समान सबको प्राणवत प्रिय और हृदय की बात जानने हारा , यम अर्थात पक्षपात रहित न्यायाधीश के समान वर्तने वाला , सूर्य के समान न्याय , धर्म , विद्या का प्रकाशक , अंधकार अर्थात अविद्या अन्याय का निरोधक , अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने वाला , वरुण अर्थात बांधने वाले के समान दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला , चन्द्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरुषों को आनन्ददाता , धनाध्यक्ष के समान कोषों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे । ( सत्यार्थ प्रकाश , पृष्ठ 140 )

जो राजा प्रजा की सुख सुविधा
का ध्यान हमेशा रखता है ।
प्रजा के ऐश्वर्यों की वृद्धि को
सदा धर्म अपना समझता है ।।
शीघ्र न्यायकारी ऐश्वर्यकर्त्ता ,
वह राजा इंद्र कहाता है ।
वायु के सम्मान सबको प्रिय ,
वह हृदय – रहस्य समझता है ।।
न्यायाधीश समान वर्त्ते सबसे
इसलिए उसे हैं यम कहते ।
सूर्य के समान विद्या प्रकाशक
अंधकार विनाशक उसको कहते ।।
अग्नि के समान दुष्टों को बांधे
चंद्र तुल्य आनंद करता ।
कोषों को पूर्ण करने वाला
कहलाता जन -जन का भर्त्ता ।।

महर्षि मनु के द्वारा इस श्लोक में चार बार न्याय शब्द प्रयोग हुआ है । लगभग हर पंक्ति में उनके द्वारा न्याय पर विशेष बल दिया गया है । महर्षि मनु के द्वारा अपने आदि संविधान मनुस्मृति में इस प्रकार की व्यवस्था करने का उद्देश्य केवल यही है कि राजा हर स्थिति परिस्थिति में अपनी प्रजा के मध्य न्याय करने के लिए कटिबद्ध हो । किसी भी प्रकार के अन्याय का प्रतिकार करना राजा का परम दायित्व है । केवल कर वसूल करना और जनता का खून चूसकर जनसंहार आदि के लिए अपनी सेनाओं का दुरुपयोग करना — यह हमारे देश में राजा की राजनीति में कभी भी सम्मिलित नहीं रहा है। भारत इसी प्रकार की राज्य व्यवस्था का उपासक राष्ट्र रहा है । जिन लोगों ने दूसरों की स्वाधीनता को अर्थात जीवन जीने के अधिकार को हड़पकर दूसरी संस्कृतियों को मिटाने के लिए अपनी सेनाएं सजाईं , भारत ने उनका प्रतिकार किया । अन्यथा पर्यावरण संतुलन बिगड़कर हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। शासन का उद्देश्य केवल एक ही है कि मनुष्य का आत्मिक और जागतिक कल्याण किया जाए और यह आत्मिक व जागतिक कल्याण तब तक नहीं हो सकता जब तक संसार में हिंसा का बोलबाला रहेगा और कुछ निरीह प्राणियों का वध किसी पर्व या धार्मिक आस्था के नाम पर किया जाता रहेगा।

देवेंद्र सिंह आर्य
लेखक उगता भारत समाचार पत्र के चेयरमैन हैं।

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