काली का पोस्टर देख मन आहत हो रहा है तो बर्दाश्त कर लीजिए,

अभिनय आकाश 

भारत का संविधान किसी भी धर्म से ऊपर है। लेकिन हमारे देश में एक खास वर्ग के लोग लगातार ये बताने की कोशिश कर रहे है कि वो इस संविधान को नहीं मानते। वो अभिव्यक्ति की आजादी का तभी तक सम्मान करेंगे जब तक बात उनके पक्ष के लिए होगी।

भारत का संविधान जिसमें 1 लाख 46 हजार 385 शब्द अंकित हैं और इसके अनुच्छेद 15 में जो बाते लिखी हैं वो आज मैं आपको बताना चाहता हूं। ”The state shall not discriminate against any citizen on the ground religion, race, caste, sex, place of birth or any of them” हिंदी में इसका अर्थ है राज्य यानी केंद्र सरकार किसी नागरिक के विरूद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। भारत का संविधान देश के 140 करोड़ भारतीयों को बराबर मानता है। लेकिन फिर ऐसा क्यों है कि जब नुपुर शर्मा एक टीवी डिबेट पर पैगंबर मोहम्मद साहब का कथाकथित अपमान करती है तो तमाम मुस्लिम देश इसके विरोध में भारत के प्रति अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं। उदयपुर और अमरावती ने नुपुर शर्मा के समर्थन करने मात्र से ही लोगों की गला काट कर हत्या कर दी जाती है। देश का एक खास वर्ग और सुप्रीम कोर्ट भी इस पर अपनी नाराजगी जताता है। लेकिन जब एक ही वक्त में पैगंबर को लेकर दिए बयान में समर्थन भर करने की वजह से किसी गैर मुस्लिम का सिर काटा जा रहा है तो दूसरी तरफ हिंदू देवी देवताओं का अपमान किया जाता है तो इस पर पूरे देश में सन्नाटा छा जाता है। कहा जाता है कि ये तो अभिव्यक्ति की आजादी है। 

इन दिनों हिंदू देवी ‘काली’ को अपनी फिल्म में सिगरेट पीते हुए दिखाने वाले पोस्टर लगातार वायरल हैं। काली के पोस्टर में हिंदुओं की आराध्य देवी “काली” के लुक में नजर आ रही एक महिला को सिगरेट का कश खींचते फीचर किया गया है। इतना ही नहीं काली के एक हाथ में LGBTQ समुदाय का झंडा भी है, जिसका एक मतलब LGBTQ को लेकर उनका सपोर्ट भी है। इस्लाम से जुड़े किसी सम्माननीय के संदर्भ में ऐसे सिम्बोलिक चित्र की कल्पना करना भी मुश्किल है। क्योंकि उसके पास 56 मुल्क हैं, तेल है, बाहुबल है जो बुद्धिबल से बड़ा होता है, क्योंकि उसके पास सोशल मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता है और उसके पक्ष में इंफ्लूएंसर्स और भू-राजनीतिक समीकरण हैं, क्योंकि मनुष्य-सभ्यता संख्याबल की बंधक हो चुकी है और जिसकी कोई संख्या नहीं उसकी कोई आवाज़ नहीं मानी जा सकती, और क्योंकि जिसकी लाठी जितना शोर करेगी, वही बहस में जीतेगा? 
वहीं इसी साल अब तक नबी निंदा के नाम पर तीन हत्याएं हो चुकी हैं। पहली जनवरी में किशन भरवाड़ की गुजरात में, दूसरी, उमेश कोल्हे की महाराष्ट्र में और तीसरी कन्हैयालाल की राजस्थान में। इससे पहले 2019 में लखनऊ में कमलेश तिवारी की हत्या भी कथित तौर पर नबी निंदा के नाम पर ही की गयी थी। गुस्ताख ए रसूल की एक ही सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा। गुस्ताख का मतलब होता है अपमान और रसूल का मतलब है पैगंबर मोहम्मद साहब यानी पैगंबर मोहम्मद साहब का जो भी अपमान करेगा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। 

एक तरफ हमारे देश में हिंदू देवी देवताओं के अपमान पर सन्नाटा छाया हुआ है तो देश में पैगंबर मोहम्मद साहब का अपमान करने के मुद्दे पर दो लोगों की हत्या हो चुकी है। पहले उदयपुर में कन्हैया लाल का सिर धड़ से अलग करके उनकी हत्या कर दी गई। उसके बाद ये पता चला कि महाराष्ट्र के अमरावती में 21 जून को उमेश कोल्हे को भी इसलिए मारा गया था क्योंकि उन्होंने नुपुर शर्मा के समर्थन में व्हाट्सएप स्टेटस लगाया था। अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या से पहले भी अमरावती में कई लोगों को फोन पर धमकी दी गई थी । उन लोगों को धमकी सिर्फ इसलिए मिली थी..क्योंकि उन्होंने नुपुर शर्मा के समर्थन में स्टेट्स लगाया था। धमकी के बाद वो लोग इतना डर गए थे कि उन्होंने वीडियो जारी कर माफी भी मांगी थी और अपना स्टेट्स भी हटा लिया था। इनमें से एक डॉक्टर गोपाल राठी भी है। राठी ने वीडियो में कहा था, “मैंने नूपुर शर्मा के सम्बन्ध में स्टेटस लगाया था। इसके पीछे किसी धर्म या जाति या किसी भी व्यक्ति का दिल दुखाने का मेरा कोई मकसद नहीं था। लेकिन, फिर भी किसी का दिल दुखा हो तो मैं अपने दिल से उनसे माफ़ी मांगता हूँ। साथ ही वादा करता हूँ कि आगे ऐसी कोई गलती नहीं होगी।”
इस्लामिक कट्टरता अब अपने क्लाइमेक्स के चरण में प्रवेश कर गई
पहले  ईश निंदा पर मुसलमानों द्वारा कभी कभार इक्का दूक्का टारगेटेड हमलों में काफी अंतराल हुआ करता था लेकिन भारत में  इस्लामिक कट्टरता अब अपने क्लाइमेक्स के चरण में प्रवेश कर गई है। यानी अब टारगेट केवल इस निंदा का आरोपी नहीं होगा  बल्कि ईश निंदा के आरोपी का समर्थन करने वाला होने लगा है यानी टारगेट एक नही अब टारगेट  मास ( समूह/समुदाय) बन गया है। जानकारों का मानना है कि इसका मकसद असल में गैर मुसलमानों और हिंदुओं में खौफ पैदा करना , और मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर एक जुट कर  सरकारी तंत्र और सरकार को मजबूर और कमजोर करना।

इस्लाम का राजनैतिक मकसद
जानकारों ने इस्लाम के विस्तार की रणनीति के अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि पूरी दुनिया मे मुसलमान जहां भी है वह इसी प्रक्रिया के तीन चरणों के तहत काम कर रहे है ।
दारुल अमन ( छुपा जिहाद – जब मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक हो और गैर मुस्लिम आबादी यानी काफ़िर एक जुट हों  तब ये मित्र बन कर रहते है जैसे ऑस्ट्रेलिया में )
दारुल हरब (रक्षात्मक जिहाद)-जहाँ मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक हो लेकिन गैर मुस्लिम बहुसंख्यक एक जुट ना हों वहां इस्लाम के खिलाफ हर चीज का विरोध शुरू करना और विरोध जारी रखना, जैसे भारत , फ्रांस ,ब्रिटेन, अमेरिका और अधिकांस यूरोप के देश।
दारुल इस्लाम (आक्रामक जिहाद – जब मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो ,) इराक में यज़ीद , भारत मे कश्मीर (1990 से शुरू हुआ ) -कश्मीर फाइल्स सच्ची घटनाओं और बनी फिल्म है ,म्याम्मार का  रोहंगिया प्रान्त)
मुसलमानों के लिए धर्म पहले, देश बाद में 
पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 299 के अनुसार मुसलमानों के लिए धर्म पहले, देश बाद में आता है। ये अखिल इस्लामवाद यानी मुस्लिम ब्रदरहुड का आधार है कि जिसकी वजह से भारत का हर मुसलमान ये कहता है कि वो मुसलमान पहले है और भारतीय बाद में… इसी भावना की वजह से भारतीय मुसलमानों ने भारत की तरक्की में बहुत छोटी भूमिका निभाई… एक मुसलमान की सोच में मुस्लिम देशों का स्थान पहला है और भारत का स्थान दूसरा है। बाबा साहब की किताब पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन के पेज नं 234 के अनुसार मुसलमानों के ये सिखाया जाता है कि इस्लाम के अलावा कहीं सुरक्षा नहीं है और इस्लामी कानून से सच्चा कोई कानून नहीं है… इसी वजह से मुसलमान खुद के अलावा कुछ और सोच पाने के काबिल नहीं बचे हैं… उन्हें इस्लामी विचार के अलावा कोई और विचार पसंद ही नहीं आता है… मुसलमानों के जेहन में ये गहराई से बैठा हुआ है कि सिर्फ वो ही सच्चे हैं और सिर्फ.. वो ही विद्वान हैं…
भारत का संविधान किसी भी धर्म से ऊपर है। लेकिन हमारे देश में एक खास वर्ग के लोग लगातार ये बताने की कोशिश कर रहे है कि वो इस संविधान को नहीं मानते। वो अभिव्यक्ति की आजादी का तभी तक सम्मान करेंगे जब तक बात उनके पक्ष के लिए होगी। ऐसे में बड़ा सवाल कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी को धर्म के नाम पर बांटा जा सकता है। इसके नाम पर कन्हैया लाल, उमेश कोल्हे जैसे लोगों की हत्या की जा सकती है। लेकिन देश की अदालतों की तरफ से भी बयान देने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है। यहां तक की उदयपुर की घटना के लिए जिम्मेदार भी बताया जाता है। इसका सीधा सा अर्थ ये निकाला जा सकता है कि कि जो जितना शोर करेगा और तोड़फोड़ मचाएगा, जो जितना आहत होगा या आहत होने का ढोंग करेगा, जो जितना ख़ून बहाएगा और गले काटेगा, उसकी उतनी ही सुनी जाएगी क्या? 

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