अब से पहले भी हुई है शिवसेना में बगावत

अभिनय आकाश

शिवसेना में बगावत का इतिहास पुराना रहा है। बाला साहेब ठाकरे के दौर में भी शिवसेना में बगावत का दौर देखने को मिला, जिस तरह के हालात का उद्धव ठाकरे सामना कर रहे हैं।

भारत में सरकार सिर्फ चुनाव से ही नहीं बनती, मैनेजमेंट से भी बनती है। उसके लिए जरूरत पड़ती है एक अदद होटल यी रिसॉर्ट की। सरकार, रिसॉर्ट और संकट ये तीन चीजें जब एक साथ एक पंक्ति में आ जाएं तो हर कोई बूझ लेगा कि कहानी क्या होने वाली है। बस सूबे का नाम, पार्टियों के नाम और नेताओं के नाम बदलते रहते हैं। कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश से परे ताजा मामला महाराष्ट्र से जुड़ा है। महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट चल रहा है। आज से पहले ये लाइन इतनी बार कही या लिखी जा चुकी है कि घिसने लगी थी। महाविकास अघाड़ी सरकार ने जब शपथ भी नहीं लिया था तभी उसके गिरने की खबर आई। कभी अचानक अजित पवार के समर्थन के साथ देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ले ली थी। इसके बाद भी किसी हवाई अड्डे के नाम पर तो कभी पंचायत चुनाव में जीत के बाद खबर आती रही कि मुंबई में सरकार गिरने वाली है। लेकिन बात आई-गई ही रह गई। पर इस बार महाराष्ट्र का सियासी संकट वाकई असली है। एकनाथ शिंदे और 40 विधायकों की बगावत की वजह से उद्धव ठाकरे की कुर्सी इस वक्त खतरे में है। एकनाथ शिंदे और मीडिया के दावों को सही माने तो  उद्धव के हाथों से सरकार ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी भी निकलती नजर आ रही। वही, उद्धव ठाकरे के इस्तीफे की भी बात कही जा रही है। अगर ऐसा होता है तो 40 साल में फिर से एक बार फडणवीस के अलावा कोई सीएम अपना 5 साल पूरा नहीं कर पाया है।

अंतराष्ट्रीय योग दिवस के दिन एकनाथ शिंदे का नाम पूरे दिन सुर्खियों में छाया रहा। शिंदे के कदम ने शिवसेना के नेतृत्व वाले महाराष्ट्र के महाविकास अघाड़ी सत्तारूढ़ गठबंधन के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। एकनाथ शिंदे के बागी होने से शिवसेना के सामने साख बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है। वैसे शिवसेना में बगावत का इतिहास पुराना रहा है। बाला साहेब ठाकरे के दौर में भी शिवसेना में बगावत का दौर देखने को मिला, जिस तरह के हालात का उद्धव ठाकरे सामना कर रहे हैं। वर्ष 1966 में मराठी अस्मिता के नाम पर गठित शिवसेना में अब तक 5 से 6 बार बड़े नेताओं ने बगावत की है। इसमें छगन भुजबल, नारायण राणे, संजय निरुपम से लेकर राज ठाकरे तक का नाम शामिल है।
 छगन भुजबल
1960 के दशक में मुंबई की भायखला मंडी में सब्जी बेचने वाले छगन भुजबल ने जब बाल ठाकरे का एक भाषण सुना तो इतने प्रभावित हुए कि ठान लिया कि वे भी शिव सैनिक बनेंगे। ये शिवसेना के शुरुआती दिन थे। भुजबल ने शिव सेना के एक समर्पित कार्यकर्ता के तौर पर अपने राजनीतिक करियर की शुरूवात की और कुछ सालों में ही पार्टी के एक ताकतवर नेता बनकर उभरे। लेकिन साल 1985 में कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से दोनों के बीच नफरत के बीज पनपने लगे। उस साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना सबसे बड़ा विरोधी दल बनकर उभरी। जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने की बारी आई तो भुजबल को लगा कि जाहिर तौर पर बाल ठाकरे उन्हें ही ये जिम्मेदारी देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भुजबल को ये जानकर सदमा लगा कि नेता प्रतिपक्ष का पद ठाकरे ने मनोहर जोशी को दे दिया। भुजबल के नेतृत्व में 9 शिवसेना के विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को खत सौंपा कि वे शिवसेना-बी नाम का अलग से गुट बना रहे हैं और मूल शिवसेना से खुद को अलग कर रहे हैं। बाद में भुजबल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। यह शिवसेना में पहली बड़ी बगावत थी।

नारायण राणे ने 10 विधायकों के साथ छोड़ी पार्टी
2003 में महाबलेश्वर में जब बाल ठाकरे ने कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर उद्धव ठाकरे का नाम लिया गया तो इसका विरोध नारायण राणे ने किया। यहीं से नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के बीच राजनीतिक दुश्मनी शुरू हो गई। फिर 2005 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए बाल ठाकरे ने नारायण राणे को शिवसेना से निकाल दिया। कहा जाता है कि राणे के भीतर यह बैठ गया कि उन्हें बाहर निकालने के पीछे उद्धव का हाथ है। राणे अपने 10 समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे। राणे के जाने से कोंकण में शिवसेना को जोरदार झटका लगा था। मराठी और अंग्रेजी में प्रकाशित अपनी आत्मकथा झंझावत में राणे ने जिक्र किया था कि वो उद्धव ठाकरे की वजह से ही 2005 में शिवसेना छोड़ने पर मजबूर हुए थे। शिवसेना में राणे का कद दूसरे नंबर का था। 
राज का वो ऐलान- पार्टी क्लर्क चला रहे हैं, मैं नहीं रह सकता
शिवसैनिक और आम लोग राज ठाकरे में बाल ठाकरे का अक्स, उनकी भाषण शैली और तेवर देखते थे और उन्हें ही बाल ठाकरे का स्वाभाविक दावेदार मानते थे, जबकि उद्धव ठाकरे राजनीति में बहुत दिलचस्पी नहीं लेते थे। राज ठाकरे अपने चाचा बाल ठाकरे की तरह अपनी बेबाक बयानबाजी को लेकर हमेशा चर्चाओं में रहे। स्वभाव से दबंग, फायर ब्रांड नेता राज ठाकरे की शिवसैनिकों के बीच लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी। बाल ठाकरे को बेटे और भतीजे में से किसी एक को चुनना था। बालासाहब ठाकरे के दबाव के चलते उद्धव ठाकरे 2002 में बीएमसी चुनावों के जरिए राजनीति से जुड़े और इसमें बेहतरीन प्रदर्शन के बाद पार्टी में बाला साहब ठाकरे के बाद दूसरे नंबर पर प्रभावी होते चले गए। पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करते हुए जब कमान उद्धव ठाकरे को सौंपने के संकेत मिले तो पार्टी से संजय निरूपम जैसे वरिष्ठ नेता ने किनारा कर लिया और कांग्रेस में चले गए। बाला साहब ठाकरे के असली उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके भतीजे राज ठाकरे के बढ़ते कद के चलते उद्धव का संघर्ष भी खासा चर्चित रहा। यह संघर्ष 2004 में तब चरम पर पहुंच गया, जब उद्धव को शिवसेना की कमान सौंप दी गई। जिसके बाद शिवसेना को सबसे बड़ा झटका लगा जब उनके भतीजे राज ठाकरे ने भी पार्टी छोड़कर अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली। राज ठाकरे उसी चाल पर चलना चाहते थे जिस धार पर चलकर बाल ठाकरे ने अपनी उम्र गुजार दी। 27 नवम्बर 2005 को राज ठाकरे ने अपने घर के बाहर अपने समर्थकों के सामने घोषणा की। मैं आज से शिवसेना के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे रहा हूं। पार्टी क्लर्क चला रहे हैं, मैं नहीं रह सकता। हालांकि राज ठाकरे का पार्टी छोड़कर जाने का दुख बाल ठाकरे को हमेशा से रहा। उस दौरान शिवसेना के कई दिग्गज नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता राज ठाकरे की नवगठित महाराष्ट्र नव निर्माण सेना में शामिल हो गए थे। 
एकनाथ शिंदे
एकनाथ शिंदे और 40 विधायकों की बगावत की वजह से उद्धव ठाकरे की कुर्सी इस वक्त खतरे में है।गुवाहाटी पहुंचकर शिंदे ने कहा है कि शिवसेना के 40 विधायक मेरे साथ हैं। हम लोग बालासाहेब के हिंदुत्व को आगे लेकर जाएंगे। बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना के कुल 55 विधायक हैं। ऐसे में अगर शिंदे ने 40 विधायकों को अपनी तरफ कर लिया है तो यह ठाकरे को करारा झटका है।  

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