‘साहूकार का बेटा’ और नूपुर शर्मा

देश में मुस्लिम सांप्रदायिकता आजादी से भी बहुत पहले की बीमारी है। जिस दिन इस्लाम ने इस पवित्र धरती पर अपना पहला कदम रखा था उसी दिन यह इस्लाम के साथ चली आई थी। तब से लेकर आज तक हमारे देश की आत्मा को कितना सताया और रुलाया है ? – यह अब इतिहास का एक विषय हो चुका है। यह ठीक है कि अतीत की कड़वाहट को अधिक नहीं कुरेदना चाहिए। क्योंकि अतीत की कड़वाहट वर्तमान को भी विषैला बना देती है, पर जब कड़वाहट को घोलने वाले निरंतर अपने काम को कर रहे हों तो अधिक उदार बने रहकर अपनी मौत को अपने आप बुलाना भी मूर्खता ही होती है। इसके उपरांत भी देश के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में आचरण करना हमारा सबसे पहला धर्म है। आग लगाने वालों के साथ मिलकर आग लगाने की योजना पर ही काम करना चमन को नष्ट करने के बराबर होता है। यद्यपि आग लगाने वालों का उपचार करना भी बहुत आवश्यक है, इसका अभिप्राय है नहीं कि आग लगाने वालों के साथ आप भी मिलकर आग लगाने लगे। भारत को जो लोग अपनी पितृ भूमि और पुण्य भूमि मानते हैं उनके लिए आवश्यक नहीं है कि वह आग लगाने पर उतर आएं। चमन को आग वही लगाता है जो चमन को अपना नहीं मानता। कहने का अभिप्राय है कि जो लोग इस समय नूपुर शर्मा के प्रकरण को लेकर सड़कों पर उतर कर आग लगा रहे हैं उनका प्रतिकार करते हुए आग लगाने की नीति पर उतरना अपने देश को बर्बाद करने के बराबर होगा। इसी संविधान के अंतर्गत ऐसी शासन व्यवस्था के द्वारा देशद्रोही और अशांति पैदा करने वाले लोगों के विरुद्ध लड़ाई से निपटा जा सकता है। कानून इस देश में बहुत मजबूत हैं । उन्हें सही ढंग से पालन कराने की आवश्यकता है। सरकार और न्यायपालिका को इसी बात पर ध्यान देना चाहिए। देश के नागरिकों को भी सरकार पर इसी बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि वह बिना किसी लाग लपेट और तुष्टीकरण के देश विरोधी तत्वों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही करे।
यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि आजादी से पहले भी कुछ लोग इस देश में ऐसे थे जो मुस्लिम सांप्रदायिकता को सांप्रदायिकता मानने को ही तैयार नहीं थे। उस समय वीर सावरकर जैसे जिन लोगों की आंखें खुली हुई थीं वह लोग चाहे जितना चिल्ला रहे थे पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के समर्थक लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि वर्कर जी और उनके साथी जो कुछ कह रहे थे, वह सही था।
हम सभी जानते हैं कि परिवार तो हिजड़ों का भी चलता रहता है। अतः विचारधाराएं भी चाहे कितनी ही दूषित प्रदूषित क्यों न हों, वह भी चलती रहती हैं। यही कारण है कि जो लोग आजादी से पहले मुस्लिम सांप्रदायिकता को सांप्रदायिकता मानने को ही तैयार नहीं थे, उनके उत्तराधिकारी आज भी वही भाषा बोल रहे हैं , फिर चाहे उनकी इस प्रकार की दोगली और देश विरोधी भाषा से देश को कितना ही हानि क्यों ना हो रही हो ? अपनी इसी प्रकार की दोगली मानसिकता व सोच के कारण नूपुर शर्मा के समर्थन में हाथ उठाने पर इनकी बोलती बंद हो गई है। कुछ समय पहले यही लोग थे जिन्होंने अखलाक की मौत पर सारा आसमान सिर पर उठा लिया था। तब इन्हें देश की धर्मनिरपेक्ष छवि की चिंता थी। आज इन्हें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा में खड़े होना भी अच्छा नहीं लग रहा, जबकि इससे पहले भारत माता को डायन कहने वालों और श्री कृष्ण जी या रामचंद्र जी और सीता जी या अन्य हिंदू देवी देवताओं के उल्टे सीधे चित्र बनाने या उन पर अश्लील टिप्पणियां करने वालों के समर्थन में ये यह कहकर उठ खड़े हुए थे कि यह तो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।
देश के संविधान के भीतर समान नागरिक संहिता की व्यवस्था की गई है, पर एक वर्ग विशेष को प्रसन्न करके उनके वोट पाने के लालच में छद्म धर्मनिरपेक्ष दोगले राजनेताओं ने कभी भी यह कहने का साहस नहीं किया कि देश में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। राजनीति में भी कुछ लोग तो सनातन वैदिक सोच के होते हैं जो मूल्यों की राजनीति करते हैं तो कुछ सनातन के नाम पर पौराणिक होते हैं। जो बीच में आई बुराइयों को पकड़कर उसी के लिए सिर पटकते रहते हैं और कहते रहते हैं कि यही सनातन परंपरा है अर्थात राजनीति में इसी प्रकार का स्वार्थ पूर्ण आचरण किया जाता है।
राजनीति में रहकर राष्ट्र नीति के विरुद्ध आचरण करने वाले ये देश विरोधी मानसिकता के लोग देश के सबसे बड़े शत्रु होते हैं। उनकी स्थिति के बारे में यहां पर एक दृष्टांत दिया जा सकता है। एक साहूकार कब लड़का खेलते खेलते कुए में जा पड़ा। साहूकार लड़के की कुएं में गिरने की सूचना पाकर अपने घर से एक रस्सा लेकर दौड़ा हुआ उस कुएं के पास पहुंचा और उसने कुएं में रस्सा लटकाकर अपने बेटे से कहा कि बेटा ! इस रस्से को अपनी कमरे में मजबूती से बांध लो। साहूकार के बेटे ने रस्सा अपनी कमर में बांध लिया और साहूकार ने उसे कुएं से बाहर खींच लिया।
संयोग की बात है कि कुछ दिन पश्चात एक मनुष्य एक वृक्ष पर चढ़ तो गया पर उसे उतरना नहीं आ रहा था। नीचे धरती को देख कर उसके हाथ पांव फूल गए। उसे लगा कि तू बहुत ऊंचाई पर आ गया है और अब नीचे जाना तेरे लिए संभव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में उसने शोर मचाना आरंभ कर दिया और कहने लगा कि भाइयों में इस पेड़ पर चढ़ गया हूं ,पर उतर नहीं पा रहा हूं। आप लोग किसी न किसी युक्ति से मुझे इस पेड़ से उतार लें अन्यथा मेरे प्राण चले जाएंगे। लोगों ने अपनी – अपनी सोच और अपनी – अपनी युक्तियां लगानी आरंभ की। परंतु उनकी युक्तियां कारगर नहीं हो पा रही थीं। तभी साहूकार का वह लड़का भी वहां आ पहुंचा जिसके पिता ने उसे रस्सा बांधकर कुएं से बाहर निकाला था।
लड़का को अपने साथ बीती हुई घटना पूर्णतया याद थी। उसने अपनी घटना का स्मरण करते हुए पेड़ पर चढ़े हुए मनुष्य पर वही सूत्र अपनाना चाहा जो उसके पिता ने उसे कुएं से निकालने में अपनाया था। यही कारण था कि उसने एक रस्सा लेकर पेड़ पर चढ़े मनुष्य की ओर फेंक दिया और कहा कि इसे मजबूती से अपनी कमर में बांध लो।
वृक्ष पर चढ़े हुए मनुष्य ने रस्से को कमर में बांध लिया। इस पर साहूकार के बेटे ने दोनों हाथों से पेड़ पर चढ़े हुए उस व्यक्ति को नीचे खींचना आरंभ किया। वृक्ष पर चढ़े मनुष्य को यह भली प्रकार ज्ञात था कि यदि उसे रस्सी से खींचने का प्रयास किया गया तो उसके साथ क्या हो सकता है ? अपनी आने वाली दुर्दशा को भांपकर उस पेड़ पर चढ़े व्यक्ति ने कहा कि यह क्या करते हो ? यदि तुम मुझे इस प्रकार खींचोगे तो मैं गिर जाऊंगा और मर जाऊंगा। वृक्ष पर चढ़े पुरुष ने दोनों हाथों से वृक्ष की डाली पकड़ी हुई थीं। वह नहीं चाहता था कि उसे रस्सी से खींच कर नीचे गिरा दिया जाए। परंतु मूर्ख साहूकार के बेटे ने कहा आप निश्चिंत रहिए, आप गिर नहीं सकते । रस्सी में बांधकर खींचना तो हमारे बाप दादा से चला आता है। जिसका मुझे पूरा अनुभव है। ऐसा कहकर उसने वृक्ष पर चढ़े मनुष्य को खींच लिया और वह पुरुष नीचे गिरते ही मृत्यु को प्राप्त हो गया।
लोगों ने कहा तुम तो कहते थे कि इस प्रकार खींचकर मनुष्य की जान बचाना हमारे बाप दादा से चली आ रही एक परंपरा है। पर तुमने यह क्या कर दिया, यह तो मर गया? तब उस मूर्ख ने कहा कि आपको नहीं पता इस समय कलियुग भी चल रहा है, इसलिए मर गया। उस मूर्ख के मुंह से ऐसी बात को सुनकर लोगों ने अपना माथा पीट लिया और अपने अपने घर चल पड़े।
कहने का अभिप्राय है कि मूर्ख से कभी ज्ञान की बात की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वह बाप दादा की बातों को शास्त्रों की बातों से भी अधिक उत्तम मानता है। कई नामदारों को यह भ्रम हो जाता है कि उन्हें प्रत्येक समस्या से निपटने का अच्छा अनुभव है और वे नामदार अर्थात साहूकार के बेटे के जैसा व्यवहार देश के साथ भी करते रहते हैं। सचमुच, ऐसे नामदारों या साहूकार के बेटों से बचने की आवश्यकता है।
बात भारत के राजनीतिक लोगों की करें तो यह तो साहूकार के बेटे से भी कुछ आगे करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन्होंने एक अल्पसंख्यक नाम के व्यक्ति को अपने आप पेड़ पर अर्थात अपने सिर पर चढ़ा लिया है। देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ पेड़ पर अर्थात सिर पर चढ़े इस अल्पसंख्यक के प्राण भी ले सकते हैं। क्योंकि इन धर्मनिरपेक्ष नेताओं में से कई नामदारों के पास ऐसे अनुभव है। इन नामदारों के बाप दादों ने उन्हें सिर पर चढ़ाकर पहले भी देश का बंटवारा करवाया था। अपने बाप दादों के उस अनुभव को यह देश पर अब लागू कर सकते हैं। देश को सावधान रहना चाहिए कि ‘साहूकार का बेटा’ फिर कोई बड़ी मूर्खता ना कर बैठे ?
मेरे पिता के नाम पर देश के सेकुलर नेता देश के शांति प्रिय लोगों के लिए भी बहुत बड़ी आपदा लाने में सहायक हो सकते हैं। पेड़ पर अर्थात धर्मनिरपेक्ष नेताओं के सिर पर चढ़ा हुआ वह व्यक्ति कह रहा है कि मुझे नीचे उतरने का रास्ता दीजिए। पर हमारे राजनीतिज्ञ हैं कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी गर्दन को और भी ऊंचा करते जा रहे हैं । कहते हैं कि नहीं बच्चे, तुझे हम सिर से नीचे नहीं उतारेंगे, क्योंकि इसमें तुम्हारा नहीं बल्कि हमारा अपमान है। सिर पर चढ़ा व्यक्ति मन ही मन प्रसन्न है क्योंकि वह मूर्ख नेताओं की आंखों में धूल झोंक कर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेना चाहता है।
जब राजनीति स्वार्थी हो जाती है तो देशवासियों के मध्य अधिकारों की लड़ाई बढ़ जाती है। जब राजनीति पथभ्रष्ट हो जाती है तो देश के लोग धर्म भ्रष्ट हो जाते हैं। जब देश की राजनीति आंख मूंदकर चलती है और न्याय नहीं कर पाती है तो सामाजिक विसंगतियां पैर फैला जाती हैं और देश उन विसंगतियों में उलझ कर अपनी शक्ति का अपव्यय करता है।
जब राजनीति बोलने के सही अवसर पर शांत रहती है तो महाभारत का कारण बन जाती है। जब राजनीति एक दूसरे की टांगों को खींचने का काम करने लगती है तो वह अधिकारों की खुली लड़ाई को निमंत्रित कर देश को गर्त में डुबाने की तैयारी कर लेती है। इसी प्रकार जब राजनीति गूंगी बहरी हो जाती है तो देश के राजनीतिक लोगों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है और लोग अपने आप न्याय करने पर उतर आते हैं । इससे देश में मत्स्य न्याय स्थापित होता है अर्थात बड़ी मछली छोटी मछली को खाने लगती है। आज राजनीति में पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट लोगों का वर्चस्व होने के कारण देश की स्थिति यही हो चुकी है।
नूपुर शर्मा के द्वारा कहे गए शब्दों को जो लोग आज वोटों के दृष्टिकोण से देख रहे हैं वे देश के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे हैं। राजनीति मैं बैठे लोगों को नूपुर शर्मा के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए ,उन्होंने जो कुछ कहा है वह उन्होंने अपनी ओर से नहीं कहा है बल्कि जो पहले से ही जाकिर नाइक जैसे अनेक मुस्लिम विद्वानों के द्वारा भी यह पूर्व में कहा जा चुका है, उसे नूपुर शर्मा ने तो दोहराया मात्र है। आतंकवादियों के लिए रात में न्यायालयों के दरवाजे खुलवा देने वाले राजनीतिक लोग नूपुर शर्मा के बारे में यदि शांत बैठे हैं तो समझिए वे न्याय के समर्थक नहीं हैं। इनके जुबान पर ताले पड़ चुके हैं। इनमें इतना साहस नहीं है कि ये कह सकें कि नूपुर शर्मा ने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा है बल्कि उन्होंने वही दोहराया है जो पहले भी कहा जा चुका है।
किसी वर्ग या संप्रदाय को फिर उन्ही उपायों को अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिनके कारण देश को एक बार नहीं कई बार विभाजित होने की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। देश के नेतृत्व को कठोरता का प्रदर्शन करना ही चाहिए। क्योंकि देश विरोधी शक्तियों के सामने झुकना अपने अस्तित्व को समाप्त करने जैसा होगा। पर इस प्रकार की कठोरता में ध्यान रखना चाहिए कि जो देश की मुख्यधारा में रहकर देश के साथ खड़े हैं उन्हें किसी प्रकार के सांप्रदायिक भेदभाव का शिकार न बनना पड़े। यह बहुत आवश्यक है कि नूपुर शर्मा के साथ न्याय हो और देश के साथ भी न्याय हो। सारा देश नूपुर शर्मा के तार्किक बौद्धिक बल के साथ खड़ा है।
सिर पर चढ़े या पेड़ पर चढ़े किसी मनुष्य को तुष्टीकरण की रस्सी फेंककर नीचे उतारने की अर्थात उन्हें मनचाहा एक और देश देने का समर्थन करने से देश की हत्या हो सकती है। ध्यान रहे जो लोग आज पेड़ पर चढ़े हुए हैं, ये उन्हीं की संतानें हैं जिन्होंने पाकिस्तान लेने के लिए भी इसी प्रकार के उपाय अपनाए थे। समय आ गया है जब राजनीति को राष्ट्रनीति बनना ही पड़ेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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