दिल्ली के लोग कब कब हुए हैं एक दूसरे के प्रति संवेदना शून्य

 अभिनय आकाश

खरगौन आनंद, हुबली, लोहरदगा, करौली, हुबली, वडोदरा, आंध्र प्रदेश कुरनूल और अब दिल्ली। यानी बस जगह बदल जाती है लेकिन दंगे का स्वरूप नहीं बदलता है। वही पत्थरबाजी, वही तलवारबाजी, वही हिन्दू-मुसलमान।

“हर एक कूचा है साकित हर इक सड़क वीराँ 

हमारे शहर में तक़रीर कर गया ये कौन”
शमीम शहज़ाद का ये नज्म हालिया हालात पर बहुत मौजूं है। कितनी मामूली हसरतें होती है एक साधारण आदमी की। मेहनत के पसीने से बरक्कत की दो रोटियां, गुजारे लायक छत, बच्चों को तालीम मिल जाए और सोते हुए खिड़कियों के कांच का टूट जाने का अंदेशा ना हो। डर न लगे घर से बाहर निकलते हुए। लेकिन अचानक इन दिनों हालात क्यों बगल गए। 2 अप्रैल त्योहार नवोत्सव राजस्थान के करौली में जुलुस और हिंसा। 10 अप्रैल त्योहार रामनवमी, मध्य प्रदेश के खरगौन, गुजरात के साबरकाठा, आनंद, बंगाल के हावड़ा, झारखंड के लोहरदगा समेत कई जगहों पर जुलुस के दौरान दंगे हुए। 16 अप्रैल त्योहार हनुमान जयंती राजधानी दिल्ली के जहांगीर पुरी में जुलुस और दो समुदायों का टकराव। खरगौन आनंद, हुबली, लोहरदगा, करौली, हुबली, वडोदरा, आंध्र प्रदेश कुरनूल और अब दिल्ली। यानी बस जगह बदल जाती है लेकिन दंगे का स्वरूप नहीं बदलता है। वही पत्थरबाजी, वही तलवारबाजी, वही हिन्दू-मुसलमान। आप सबने पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के बारे में खूब सुना होगा। इससे संबंधित खबरें भी पढ़ी होंगी। अब तक त्योहार उत्सव और उमंग के लिए मनाए जाते रहे हैं और आगे भी मनाए जाते रहेंगे। लेकिन अचानक ही ये सब क्यों होने लगा। लगातार आप खबरों में देख रहे होंगे, गोली चलने का वीडियो, पत्थर बरसाने का वीडियो। अगर दिल्ली के दंगों पर नजर डालें तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि यहां दंगे हुए हैं। पिछले चार दशकों से दिल्ली दंगों की आग में लगातार झुलसता रहा है। ऐसे में आज हम आपको वो तथ्य बताएंगे, जिससे आप ये समझ पाएंगे कि कब-कब दिल वालों की दिल्ली का दिल एक दूसरे की सलामती के लिए धड़कना बंद हो गया और हालात ने दंगों का रूप ले लिया। 

द प्रिंट द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष वार्ष्णेय और स्टीवन विल्किंसन ने बताया कि दिल्ली ने 1950 और 1995 के बीच हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों में 93 लोगों की जान गंवाई थी। इन नंबरों में 1984 की सिख विरोधी हिंसा शामिल नहीं है, क्योंकि वे इसे सीधे-सीधे नरसंहार के रूप में वर्गीकृत करते हैं। 
1974 का सदर बाजार दंगा
1974 में दिल्ली में सदर बाजार के मुहाने पर हुए छोटे से विवाद ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। हिंसा दो मुस्लिम युवकों और एक हिंदू लड़के के बीच झगड़े से शुरू हुई थी। छोटे से तर्क वितर्क ने देखते ही देखते हिंदू-मुस्लिम टकराव का रूप ले लिया। आगजनी, भारी ईंट-पत्थरबाजी और फायरिंग हुई। दंगे के अंत में, 11 लोग मारे गए थे – आठ हिंदू, दो मुस्लिम, एक सिख और क्षेत्र 44 दिनों तक कर्फ्यू में रहा।
1984 का सिख विरोधी दंगा
1984 तो दिल्ली के इतिहास में सिख दंगे का पर्याय ही बन चुका है। 31 अक्टूबर को तत्तकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो जाती है। इंदिरा गांधी की मौत के बाद लोग सिखों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। सबसे ज्यादा कहर दिल्ली पर बरसा। करीब तीन दिन तक दिल्ली की सड़कों औऱ गलियों पर कत्लेआम होता रहा। सिख जान बचाने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। जिन इलाकों में नेताओं का दबदबा सबसे ज्यादा था और जिन बस्तियों में सिख सबसे ज्यादा बसते थे, सबसे ज्यादा मातम वहीं गूंज रहा था। त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, नंदनगरी, सागरपुर, कल्याणपुरी, उत्तम नगर, जहांगीरपुरी, तिलकनगर, अजमेरी गेट। दिल्ली के ये वो इलाके थे जहां सबसे ज्यादा कहर टूटा था। घरों से घसीटकर सिखों को मारा गया। जिंदा जलाया गया। जो घर से बाहर नहीं निकले उनके पूरे घर को ही आग के हवाले कर दिया गया। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली के त्रिलोकपुरी के ब्लाक 32 में 200 घरों को जला दिया गया था और 400 सिख मार दिए गए थे। कई सिखों के पैर काटकर और गले में टायर डाल कर जिंदा जला दिया गया था। 
1990 के दशक में साम्प्रदायिक हिंसा की घटना
फिर साल 1990 में नवंबर के महीने में दिल्ली के सदर बाजार के ईदगाह पार्क में साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी। इस हिंसा में 8 लोगों की मौत हुई थी और 32 लोग घायल हुए थे। इस दौरान 42 गाड़ियों जलाई गई थीं और कई लोग घायल हुए थे। साल 1992 में दिल्ली के सीलमपुर में साम्प्रदायिक हिंसा में लगभग 20 लोगों की मौत हुई और इस हिंसा में मरने वाले लोग अधिकतर जलने की वजह से मरे थे।
2014 की दिवाली पर थर्राने वाला दंगा
साल 2014 की दिवाली पर दंगा भी थर्राने वाला था। यहां दिवाली की रात त्रिलोकपुरी इलाके में एक मस्जिद के पास बवाल हुआ था। रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां पर देवी दुर्गा को समर्पित एक माता की चौकी कार्यक्रम के दौरान लाउडस्पीकर के कारण हिंसा शुरू हो गई। मामला बातचीत से हाथापाई और पथराव तक पहुंच गया था। हालांकि त्रिलोकपुरी के दंगों में कोई जनहानि नहीं हुई थी। तीन दर्जन से अधिक लोग झड़पों में घायल हुए थे। त्रिलोकपुरी दंगों के बाद, दिल्ली पुलिस ने अमन समितियों का गठन किया।

नाबालिग से छेड़छाड़ और आपस में भिड़े दो समुदाय
इसके अलावा 2016 में दिल्ली में ही एक नाबालिग से छेड़छाड़ के मामले ने हिंसा का रूप ले लिया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वाल्मीकि समुदाय के एक नाबालिग द्वारा दूसरे धर्म के एक व्यक्ति द्वारा छेड़छाड़ किए के मामले में बवाल हुआ था। यहां दो समुदाय आपस में भिड़ गए थे। 
2018 में मंदिर को लेकर हुआ था बवाल
उत्तर पश्चिमी दिल्ली के संगम पार्क में 2018 में दो समुदायों के लोग आपस में भिड़ गए थे। इस दौरान खूब पथराव हुआ था। जिसमें करीब आधे दर्जन लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे। साल 2019 में मध्य दिल्ली में एक मंदिर मामले को लेकर बवाल शुरु हुआ था। हालांकि उन सब मामलों में स्थिति को समय पर नियंत्रित कर लिया गया था। 
2020 का दिल्ली दंगा
 22-23 फरवरी 2020 के दरमियान रात को जाफराबाद मेट्पो स्टेशन के पास भी रास्ता रोककर प्रदर्शन शुरू हो गए थे। सीएए आंदोलन के वक्त प्रदर्शन बनाम प्रदर्शन का दौर चला। सीएए के विरोध में भी रैलियां हो रही थी और पक्ष में भी। इसी तरह धरने का जवाब भी धरने से दिया जा रहा था। जाफराबाद मेट्रो के नीचे सीएए के विरोध में धरना और मौजपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे रास्ता खुलवाने की मांग वाला प्रदर्शन जिसकी अगुवाई बीजेपी के नेता कपिल मिश्रा कर रहे थे। इसी दिन सीएए समर्थकों और विरोधियों में पत्थरबाजी शुरू हुई। पहले दिन पुलिसवालों समते कई जख्मी हुए लेकिन बात सिर्फ पत्थरबाजी तक सीमित नहीं रही। अगले दिन अहमदाबाद में ट्रंप की मेहमानवाजी चल रही थी और इसके बीच देश की राजधानी में पत्थरबाजी, आगजनी और गोलियां चल रहीथीष दंगा हो रहा था। पुलिस की गाड़ियों में आग लगाई जा रही थी, पेट्रोल पंप जलाए जा रहे थे और एक दूसरे का कत्ल होरहा था। मौजपुर और जाफराबाद के अलावा दिल्ली के भजनपुरा, चांद बाद और गोकुलपुरी जैसे इलाकों में हिंसा हुई। हालात पूरी तरह से काबू करने में एक हफ्ते का वक्त लगा। ताहिर हुसैन को भला कौन भूल सकता है। दिल्ली का खजूरी खास इलाका जहां ताहिर हुसैन का घर है। उन दिनों उसका घर दंगाईयों का अड्डा बन गया था। दिल्ली दंगों का उसे मास्टरमाइंड माना जाता है। इस वक्त वो जेल की सलाखों के पीछे है। उसके घर से पेट्रोल बम, बड़े-बड़े पत्थर, पत्थर फेंकने वाली बड़ी गुलेल मिले थे।  तत्कालीन विंग कमांडर अभिनन्दन की तरह मूँछें रखने वाले हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल को पीट-पीट कर मार डाला गया था। रतनलाल को उन्मादी भीड़ द्वारा उस समय बेरहमी से मारा गया था, जब वह चांद बाग के वजीराबाद रोड पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे। नौजवान की ऐसी नृशंस हत्या के लिए कहां से आई इतनी नफरत की अंकित के जिस्म को चाकुओं से इतनी बार गोदा गया कि दरिंदगी की सारी हदें पार हो गईं।

जहांगीरपुरी हिंसा 
सारा उत्पाद और उन्माद कुशलचौक के ब्लॉक सी और ब्लॉक जी के बीच में हुआ। दोनों ही जगहों पर मुस्लिम आबादी ज्यादा है। हिंसा शुरू होते ही कुछ ही मिनटों के अंदर सैकड़ों की संख्या में उन्मादी सड़क पर थे। राजधानी दिल्ली में हनुमान जयंती के अवसर पर शोभायात्रा के दौरान जामा मस्जिद के पास शाम करीब 6 बजे अंसार नाम का शख्स अपने 4-5 साथियों के साथ आता है और शोभायात्रा में सामिल लोगों से बहस करने लगा। झगड़ा बढ़ा और फिर पथराव शुरू हो गया। इसके बाद आगजनी की घटनाएं भी हुईं। हालांकि करीब एक घंटे के अंदर ही हालात पर नियंत्रण पा लिया गया था और बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती कर दी गई थी।
दिल्ली के संवेदनशील इलाके कौन-कौन से ?
जहांगीरपुरी में दंगे के बाद राष्ट्रीय राजधानी के मौजपुर, जाफराबाद, सीलमपुर, गौतमपुरी, भजनपुरा, चांद बाग, मुस्तफाबाद, वजीराबाद और शिव विहार सहित संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल तैनात किया गया है। इसके अलावा, सीआरपीएफ की आठ कंपनियों को भी हिंसा प्रभावित इलाकों में तैनात किया गया है। किसी भी तरह की झड़प जैसी स्थिति को रोकने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति पर नजर रखी हुई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर कैसे तय होता है कि कौन सा क्षेत्र संवेदनशील है। इसके लिए कई पैमाने हैं। मसलन,  अपराधी तत्त्वों की मौजूदगी, सांप्रदायिक और जातिगत तनाव, उग्रवाद, पहले की कानून-व्यवस्था का इतिहास,  क्षेत्र के तहत आने वाले थानों में कितने मुकदमे कायम हुए हैं। कुल मिलाकर छह-सात क्राइरेटरिया हैं जिसके आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों को निर्धारित किया जाता है।

आंकड़ों के अनुसार दिल्ली के दंगे
अगर हर साल दिल्ली में कुल दंगों के आंकड़ों को देखा जाए तो इसमें साल 2015 में 130 दंगे हुए थे। इसके बाद फिर साल 2016 में 79, साल 2017 में 50, साल 2018 में 23, साल 2019 में 23, साल 2020 में 689 और साल 2021 में 68 दंगे हुए थे।
विदेश मेहमानों के आगमन के वक्त दंगा महज संयोग? 
देश की राजधानी दिल्ली जहां की सुरक्षा सबसे चाक-चौबंद मानी जाती है। वहां भी इस तरह की घटना देखने को मिलती है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन 21 अप्रैल को भारत के दौरे पर आने वाले हैं। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ आठ दिन के भारत दौरे पर हैं। जब 2020 में दिल्ली में दंगे हुए तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे। अभी एक देश के प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर हैं और दूसरे आने वाले हैं। उन तक ये सारी खबरें पहुंचती होंगी तो भारत की क्या छवि बनती होगी। ये महज एक संयोग की है कि जब कभी विदेशी मेहमान भारत की जमीं पर होते हैं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान दिल्ली पर बना रहता है तो इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। 
बहरहाल, पत्थर जिस्मों पर ज्यादा पड़े या अक्ल पर, आग दुकानों में ज्यादा लगे या दिलों पर। नुकसान संपत्ति का हो या भाई चारे का। जख्म जिस्मों पर ज्यादा लगे या मुल्क की रूह पर। दंगों की हिंसा के निशान तो शायद वक्त के साथ मिट भी जाएं लेकिन कलंक के वो दाग कैसे मिटेंगे जो दंगाईयों ने दिल्ली के माथे पर लगा दिए। 

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