ज्ञानवापी मस्जिद का मामला भी बाबरी मस्जिद जैसा ही

राजीव चौधरी

अगर इतिहास विवादित है तो भविष्य अपने आप विवादित हो जाता है। अयोध्या के बाबरी ढांचे के बाद अब बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद मामले में ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वहां मिले सबूतों के आधार पर हिन्दू पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद सन 1669 में औरंगजेब ने भव्य विश्वेश्वर (विश्वनाथ) मंदिर को ध्वस्त कर दिया था और उसके स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया। हार्वर्ड विद्वान डायना एल ऐक के अनुसार ध्वस्त किया गया मंदिर काफी भव्य था, जिसमें एक गर्भ गृह और चारों ओर आठ मंडप थे। हालांकि, मंदिर पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ था। औरंगजेब ने जानबूझकर पुराने मंदिर की एक दीवार खड़ी कर रखी थी और उसे अपने धर्मस्थल से मिला दिया। दीवार ने सुनिश्चित किया कि भयानक यादें बगल के कुएं की पूजा के रूप में जीवित रहे।
अगर ये इतिहास बंटवारे के समय ही लिख दिया गया होता तो शायद ये विवाद आज यहाँ आकर खड़ा नहीं होता! पिछले दिनों पांच महिलाओं ने मस्जिद परिसर को मंदिर का हिस्सा बताते हुए कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका को स्वीकारते हुए, अब कोर्ट के आदेश पर सर्वे और वीडियोग्राफी कड़ी सुरक्षा में की जा रही है। ऐसे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, लोगों की आशंकाएं हैं, क्या ज्ञानवापी मस्जिद विवाद भी अयोध्या में बाबरी की तरह रंग ले लेगा?
शायद ऐसा ना हो, क्योंकि वर्तमान में ज्ञानवापी मस्जिद के मामले में हिंदू पक्ष मस्जिद को हटाने और यथास्थिति को बहाल करने जैसी कोई मांग नहीं कर रहा, केवल पूजा का अधिकार देने की मांग कर रहा है। दरअसल, 1991 में संसद में पारित पूजा स्थल अधिनियम सभी धर्मों के पूजन स्थल को 15 अगस्त 1947 के स्वरूप में रखने की बात करता है। ऐसे में हिंदू पक्ष को यहां कोई बड़ा कानूनी अधिकार मिल जाएगा, यह मानना मुश्किल है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि औरंगजेब ने मूर्तियों को तोड़ा था। 1991 का प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट किसी भी धर्मस्थल के वर्तमान धार्मिक चरित्र को बदलने की कोई गुंजाइश नहीं देता है। इस तरह से देखें तो वाराणसी में वर्तमान खींचतान हिंदू उपासकों के लिए जगह हासिल करना है।
यानि 1947 के बाद का इतिहास और 1991 में बना कानून इस ओर ईशारा कर रहा है कि ज्ञानवापी ढांचा अपनी जगह बनी रहेगा। हाँ अगर ढांचे को हटाकर वहां ग्यारहवीं सदी के भव्य विश्वेश्वर मंदिर की पुन: स्थापना करनी है तो कानून और इतिहास दोनों बदलने पड़ेंगे। हालाँकि इस विवाद के बीच कोई धर्म की बात कर रहा है तो कहीं धर्मनिरपेक्षता की चर्चा है। किन्तु ऐसे सवाल ये है कि भारत में हिन्दुओं के प्राचीन आस्था स्थल पर या उनके निकट मस्जिदें कहाँ से आई ?
साधरण मनुष्य का दर्शनशास्त्र कहता है कि जब आप किसी से आस्था का केंद्र छीन लेते है तो बदले में उन्हें या तो नया आस्था स्थल और मार्ग दे दीजिये या फिर उनके पूर्व के आस्था स्थल को अपनी शैली और प्रार्थना के मार्ग में बदल दीजिये। इस्लाम और इन विवादित मस्जिदों के ढ़ांचों को समझने के लिए दर्शन का यह कथन बिलकुल सत्य है। छठी सदी में अरब से निकली विचारधारा बेहद कम समय में सातवीं सदी के आरम्भ तक हिंसक तरीके से भारत की सीमाओं को छू चुकी थी। 50 वर्ष के अन्तराल में ही अरब में यहूदी मंदिर सिनेगॉग तोड़े और अल्प अवधि में ही उन्हें मस्जिद का आकार दिया। इसी दौरान यजीदी समुदाय के मलक ताउस मंदिर तोड़े, ईरान में पारसियों के मंदिर आतिश बेहराम तोड़कर मस्जिद का ढांचा बना दिया। अफगानिस्तान में बौद्ध मंदिर बुद्ध की प्रतिमाएं खंडित की गयी. सिंध वर्तमान (पाकिस्तान) में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को तोडा गया। इसके बाद मुगलकाल में आक्रांताओं ने काफी तरह से भारत की संस्कृति, हिंदू धर्म की आस्था को खंडित करने की कोशिश की। मंदिरों को तोड़ने का काम इसी में से एक है। मुगल काल में तोड़े गए मंदिरों की एकदम सही संख्या बता पाना मुश्किल है, क्योंकि उस दौरान का इतिहास भी मुगल शासकों ने अपने अनुसार लिखवाया था। हां, ये जरूर कहा जा सकता है कि कई हजार मंदिरों को मुगलों ने तोड़ दिया। कई के सबूत आज भी मौजूद हैं।
दूसरा आज इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि दक्षिण एशिया खासकर भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू थे। इस लिहाज से इस कथन से भी मना नहीं किया जा सकता है कि उनकी आस्था के केंद्र अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे भूभाग में स्थित मंदिर थे। यानि लोगों को जबरन इस्लाम में लाया गया और उनके प्राचीन स्थलों को तोड़कर उसी स्थान पर उन्हें मस्जिदों के ढांचे बनाकर दिए गये। यानि हिन्दुओं के साथ-साथ जबरन ये आस्था स्थलों का भी धर्मांतरण था!
क्या इस तथ्य को कोई भारतीय मुसलमान नकार सकता है कि महमूद ग़ज़नवी ने 11 वीं शताब्दी में भारत के उत्तर पश्चिम पर हमला किया? उसके आक्रमण धर्मस्थलों को तोडने, मूर्तियों को खण्डित करने के लिये प्रसिद्ध थे। इनमें सोमनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर और मथुरा, थानेसर,उज्जैन के मन्दिर विशेष हैं। उसके दरबार के इतिहासकार अल-उत्बि के अनुसार वें आक्रमण इस्लाम के प्रसार और गैर-इस्लामिक प्रथाओं के विरुध एक जिहाद का हिस्सा थे। केवल मथुरा से ही उसने हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाया था?
खुद मुस्लिम इतिहासकार मौलाना हाकिम सैयद अब्दुल हाजी लिखते है कि ऐबक के शासन में धर्मान्धता के अन्तर्गत हिन्दू,जैन,बौद्ध पूजास्थलों को तोडा गया। दिल्ली की पहली मस्जिद क़ुव्वत अल इस्लाम के निर्माण में 20 हिन्दू, जैन मन्दिरों के अवशेषो का इस्तेमाल किया गया था। क़ुतुब मीनार के आसपास भी पुरातन मन्दिर के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। खिलजी शासन के दौर में भी धार्मिक अत्याचार का दौर चलता रहा। धार्मिक हिंसा का ये प्रक्ररण न केवल सेना के द्वारा रचा गया, अपितु मुफ्ती, क़ाज़ी और अन्य दरबारियों ने भी धार्मिक आधार पर इसे मान्यता दी। क़ाज़ी मुघीसुद्दीन बयाना ने अल्लाउद्दीन को सलाह दी कि हिन्दूओं को कुचल कर अपने अधीन रखना धर्मसंगत है और पैगंबर के आदेशानुसार हमें उन्हें मारना, लूटना और क़ैद करना चाहिये। या वो इस्लाम को स्वीकार करें या मार दिये जायें, गुलाम बना दिये जाये और उनकी व्यक्तिगत एवं धार्मिक संपत्ति को नष्ट कर दिया जाये। बाबरनामा में भी अनेकों हिन्दू नरसंहारों का उल्लेख है। इन नरसंहारों का सामना ना केवल हिन्दूओं ने बल्कि यहूदी, पारसी, बौद्ध एवं सिखों समेत यूरोप में ईसाइयों ने भी किया। तुर्की की अलअक्सा मस्जिद इसका सबसे बड़ा उदहारण है।
यहाँ एक बात जो सर्वाधिक गौर करने वाली है वो ये है कि जहाँ-जहाँ इस्लाम गया वहां-वहां वो पैठ बनाकर आज भी बैठा है। लेकिन भारत के मामले में ऐसा नहीं हुआ समय के साथ मुग़लकाल या कहे इस्लामिक भूचाल समाप्त हुआ। अंग्रेजी शासन आया और स्वतंत्रता के साथ दो विचारधाराओं के बीच बंटवारा हुआ और भारत की सत्ता की बागडौर हिन्दुओं के हाथ में आ गयी।
मुगलकाल में मुसलमान बने लोगों ने मजहब के नाम पर मजहबी देश का चुनाव किया। लोगों को लगा चलो आस्था का विवाद भी सीमा के उस पार चला गया। तब तत्कालीन सरकारों का कर्तव्य बनता था कि सैंकड़ों वर्ष के कलंकित इतिहास को सुधारा जाये। विवादित सभी आस्था स्थलों का समाधान हो। लेकिन ऐसा नहीं हुआ 1947 में भारत के विभाजन के बाद आज भी ये टकराव न केवल जिन्दा है बल्कि सभी सरकरों ने इन्हें कायम भी रखा।
यही कारण है कि सैंकड़ों वर्षों की धार्मिक दासता में रहने वाले आज हर श्रद्धालु ने नुकसान वाराणसी मथुरा या अटाला जैसी मस्जिदें देखकर नुकसान और गुस्से दोनों का अनुभव किया। आगे चलकर यह हिंदू सशक्तीकरण की भावना के संदर्भ में बदले की भावना बढ़ने और अन्य स्थानीय विवादों को सामने ला सकता है। जनता की भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए केवल कानून का सहारा लेना ही काफी नहीं है। हिस्टोरिकल नैरेटिव की भी जरूरत है जो सभी भारतीय समुदायों को बदसूरत मध्ययुगीन विरासत की सच्चाई बताए। अगर यह विवादित इतिहास और कानून सुधर जाये तो भारत का भविष्य भी आगे सुन्दर नजर आएगा। वरना हर आस्थावान श्रद्धालु ज्ञानवापी को बाबरी की तरह ही देखता रहेगा।

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