मथुरा का कृष्ण जन्म भूमि के और हिंदू मुस्लिम पक्ष के बीच वे समझौते की सच्ची कहानी

 अभिनय आकाश

अब मथुरा की भी फाइल खुल गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद विवाद की याचिका स्वीकार कर ली गई है, जिसके बाद अब कृष्ण जन्मभूमि से सटी ईदगाह मस्जिद को हटाने की याचिका पर अदालती कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ है।

1990 का वो दौर राम मंदिर आंदोलन के दौरान एक नारा लगाया जाता था- अयोध्या तो झांकी है, अभी काशी मथुरा बाकी है। अब धीरे-धीरे वो नारा चरितार्थ होने लगा है। रास्ता वो हो न हो लेकिन अदालतती दरवाजे के रास्ते मंदिर कुछ वैसी ही दिखती है। काशी में ज्ञानवापी पर देश की सर्वोच्च अदालत की तरफ से केस वापस से जिला जज के पाले में ट्रांसफर कर दिया है। मतलब, जिला जज जिन्होंने कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने से लेकर सर्वे के आदेश दिए थे। अब फिर से मामले की सुनवाई करेंगे। लेकिन इन सब के बीच अब मथुरा की भी फाइल खुल गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद विवाद की याचिका स्वीकार कर ली गई है, जिसके बाद अब कृष्ण जन्मभूमि से सटी ईदगाह मस्जिद को हटाने की याचिका पर अदालती कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ है। एडवोकेट रंजना अग्निहोत्री ने भगवान श्रीकृष्ण के सखी के तौर पर एक केस सितंबर 2020 में सिविल कोर्ट के समक्ष दाखिल किया था जिसे उस वक्त सिविल कोर्ट की तरफ से खारिज कर दिया गया था। इसके बाद अक्टूबर में ये केस रिविजन के लिए जिला जज की कोर्ट में दाखिल किया गया। 

मथुरा कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है?
जिला और सत्र न्यायाधीश राजीव भारती ने श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और अन्य निजी पार्टियों द्वारा उस भूमि के स्वामित्व की अपील की, जिस पर शाही ईदगाह मस्जिद बनी है। ईदगाह श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थल के बगल में है, जहां भगवान कृष्ण का जन्म माना जाता है। विवाद में अनिवार्य रूप से 13.37 एकड़ भूमि का स्वामित्व शामिल है, जो याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह देवता भगवान श्री कृष्ण विराजमान का है। याचिका को पहले निचली अदालत ने खारिज कर दिया था, और बाद में जिला न्यायाधीश के समक्ष एक पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी। दीवानी वाद की सुनवाई अब निचली अदालत करेगी। राजस्व रिकॉर्ड देखने के अलावा, अदालत को श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान – मंदिर प्रबंधन प्राधिकरण, जो कानून के तहत एक पंजीकृत सोसायटी है – और ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह के बीच 1968 के “समझौता समझौते” की वैधता भी तय करनी होगी। जिसके द्वारा मंदिर प्राधिकरण ने भूमि के विवादास्पद हिस्से को ईदगाह को दे दिया। याचिका में 1968 में हुए समझौते को भी रद्द करने की मांग की गई है। याचिकर्ताओं का कहना है कि इस मामले में संस्थान को समझौता करने का अधिकार ही नहीं है। याचिका में कहा गया है कि कोर्ट की निगरानी में जन्मभूमि परिसर की खुदाई कराई जाए। उनका दावा है कि जिस जगह पर मस्जिद बनाई गई थी, उसी जगह पर वो कारागार मौजूद है जिसमें भगवान जन्मे थे। उनका ये भी कहना है कि कृष्ण जन्मभूमि का भी ज्ञानवापी की तरह से वीडियो सर्वे कराया जाए, जिससे सच पता लगेगा। हिंदुओं को मंदिर में पूजा करने का अधिकार दिया जाए। याचिका में संसद से पारित धर्म स्थल कानून यानी प्लेसेज ऑफ वर्सिप एक्ट 1991 को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि धर्मस्थलों का प्रबंधन और कानून व्यवस्था राज्य सरकार की सूची का विषय है। इस बाबत कानून और नियम बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को ही होना चाहिए। ऐसे में संसद में ये कानून बनाकर राज्य सरकार के अधिकारों में हस्तक्षेप किया गया है। 

क्या है 1968 में हुए समझौते का विवाद
मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि से लगी हुई है। इतिहासकारों का मानना है कि औरंगजेब ने प्राचीन केशवनाथ मंदिर को नष्ट करके शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवाया। 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से वाराणसी के हिंदू राजा को जमीन के कानूनी अधिकार सौंप दिए गए थे, जिस पर मस्जिद खड़ी थी। 1951 में श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर ये तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और उसका प्रबंधन ट्रस्ट की तरफ से किया जाएगा। 1958 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की संस्था का गठन किया गया। कानूनी तौर पर ये संस्था को जमीन पर मालिकाना हक हासिल नहीं था। लेकिन ट्रस्ट के लिए तय सारी भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी गई। इस संस्था ने 1964 में पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए सिविल केस दाखिल किया। लेकिन 12 अक्टूबर 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ एक समझौता कर लिया। श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह के प्रतिनिधियों में समझौता किया गया। 17 अक्टूबर 1968 को इस समझौता पेश किया गया और 22 नवंबर 1968 को मथुरा सब रजिस्टार के यहां इसे रजिस्टर किया गया। 1968 समझौते के अनुसार, शाही ईदगाह कमिटी और श्री कृष्णभूमि ट्रस्ट के बीच एक समझौता हुआ जिसके अनुसार, जमीन ट्रस्ट के पास रहेगी और मस्जिद के प्रबंधन अधिकार मुस्लिम कमिटी को दिए जाएंगे। लेकिन अब याचिका में कहा गया है कि वो समझौता श्रीकृष्ण भक्तों की भावना के खिलाफ था। याचिका में कहा गया कि कटरा केशव देव की संपूर्ण संपत्ति ट्रस्ट की है और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को उसका मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता है। इसलिए उसके द्वारा किया गया समझौता यहां अवैध होगा। कटरा केशवदेव की संपत्ति पर शाही ईदगाह का किसी प्रकार का अधिकार नहीं हो सकता। इसिलिए उस पर किया गया निर्माण भी अवैध है। अब इसी आधार पर शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की बात की जा रही है।  
श्रीकृष्ण जन्मभूमि और मथुरा का इतिहास भी जान लीजिए
जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ पहले वह कारागार हुआ करता था। यहां पहला मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी ‘वसु’ नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था। इसके बहुत काल के बाद दूसरा मंदिर सन् 800 में विक्रमादित्य के काल में बनवाया गया था, जबकि बौद्ध और जैन धर्म उन्नति कर रहे थे। इस भव्य मंदिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला। ओरछा के शासक राजा वीर सिंह बुंदेला ने फिर से इस खंडहर पड़े स्थान पर पहले से भी विशाल मंदिर बनवाया। जिसके बारे में कहा जाता था कि ये इतना ऊंचा था कि इसे आगरा से भी देखा जा सकता था। लेकिन 1679 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर उत्तर भारत में कई जगह ऐतिहासिक मंदिर तोड़े गए। इसके पीछे धार्मिक कारण थे और हिंदुओं की आस्था पर चोट करना इसका मकसद था। इसके अलावा इसके आर्थिक उद्देश्य भी थे, क्योंकि इन मंदिरों में काफी धन संपदा होती थी जिसे औरंगजेब ने लूट लिया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को भी उसी समय तोड़ा गया। इसका अभिलेखीय साक्ष्य भी है कि कब ऐसे आदेश दिए गए। औरंगजेब के कोर्ट में एक ‘मुहतसिब’ होता था, जो धार्मिक आचरण को नियंत्रित करता था और उसी की सलाह पर औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलाया।’ औरंगजेब की तरफ से जन्मभूमि के आधे हिस्से पर ईदगाह बना दी गई, जो आजतक कायम है।

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