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हिंदुओं वाला जम्मू अब मुस्लिम बहुल कश्मीर पर भारी पड़ेगा?

बदल गया पॉलिटिकल मैप और चुनाव का रास्ता हुआ साफ,

 अभिनय आकाश

परिसीमन आयोग की तरफ से अपनी रिपोर्ट में कई सारे बदलाव किए गए हैं। लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि परिसीमन आयोग ने जम्मू और कश्मीर को एक यूनिट के तौर पर देखा है।

जम्मू कश्मीर में विधानसभा और लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण करते के लिए गठित परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट 5 मई को सौंप दी। इससे जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया। वहां साल 2018 से ही लोग निर्वाचित सरकार से वंचित हैं। नए चुनाव करवाने की राह में सबसे बड़ी बाधा यही बताई जाती रही है कि जब तक परिसीमन आयोग की फाइनल रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक चुनावों की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती है। परिसीमन आयोग की तरफ से अपनी रिपोर्ट में कई सारे बदलाव किए गए हैं। लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि परिसीमन आयोग ने जम्मू और कश्मीर को एक यूनिट के तौर पर देखा है। केवल जनसंख्या को परिसीमन का आधार न बनाते हुए आयोग ने अलग-अलग इलाकों की भू संस्कृतिक पृष्ठभूमि, भौगोलिक जुड़ाव औऱ पाकिस्तान सीमा से दूरी जैसे तमाम कारकों को ध्यान में रहा। आज के इस विश्लेषण में हम जम्मू कश्मीर विधानसभा सीटों के लिए नए परिसीमन के प्रस्ताव का एमआरआई स्कैन करेंगे। इसके साथ ही जम्मू कश्मीर की राजनीति में इसके महत्व को समझने की कोशिश करेंगे और बताएंगे की इस प्रस्ताव का विपक्षी पार्टियां विरोध क्यों कर रही हैं। 

क्या होता है परिसीमन?
चुनावी क्षेत्रों की सीमा तय करमे की प्रक्रिया परिसीमन कहलाती है। विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन में जनसंख्या मुख्य आधार रहता है। जम्मू कश्मीर में आखिरी बार परिसीमन 1995 में हुआ था। तब सूबे में कुल 12 जिले और 58 तहसीलें थीं, जबकि आज जिलों की तादाद बड़कर 20 और तहसीलों की संख्या 270 हो चुकी है।

आयोग का गठन क्यों किया गया था?
परिसीमन तब आवश्यक हो गया जब जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 ने विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ा दी। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य में 111 सीटें थीं- कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में चार – साथ ही 24 सीटें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लिए आरक्षित थीं। जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बनाया गया था, तब जम्मू-कश्मीर में पीओके के लिए 24 सहित 107 सीटें बची थीं। पुनर्गठन अधिनियम ने जम्मू-कश्मीर के लिए सीटों को बढ़ाकर 114 – 90 कर दिया, इसके अलावा पीओके के लिए 24 आरक्षित सीटें। अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू एंड कश्मीर रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1957 जम्मू कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 (3) में बदलाव किया था। सेक्शन 47(3) में हुए बदलाव के मुताबिक वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते। परिसीमन आयोग जम्मू कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 के प्रावधानाों के तहत जम्मू कश्मीर में लोकसभा और विधानसभा का परिसीमन का जिम्मा सौंपा। परिसीमन आयोग का गठन पिछले साल रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई में किया गया। कानून मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और चार राज्यों के निर्वाचन आयुक्तों को आयोग का पदेन सदस्य बनाया गया था। उन्होंने तमाम ज़िला आयुक्तों को चिट्ठी लिख कर उनसे बुनियादी जानकारी मांगी है। पैनल को दिया गया समय, शुरू में एक साल, कई बार बढ़ाया गया क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस के तीन सांसदों ने शुरू में इसकी कार्यवाही का बहिष्कार किया था। 20 जनवरी को पहली मसौदा सिफारिशों में जम्मू के लिए छह और कश्मीर के लिए एक विधानसभा सीटों की वृद्धि का सुझाव दिया गया था।  6 फरवरी को, इसने अपनी दूसरी मसौदा रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। 
 क्यों होता रहा है विवाद?
जम्मू की अपेक्षा घाटी में असेंबली की तादाद ज्यादा होने के चलते राज्य की सियास में हमेशा घाटी का दबदबा रहता आया है। इस बार परिसीमन में दोनों के बीच की खाई को कम करने की कोशिश की गई है। पहले जहां दोनों के बीच नौ सीटों का अंतर हुआ करता था। उसे घटाकर अब चार करने की सिफारिश की गई है। हालांकि विपक्ष जम्मू संभाग में हुए सीटों के इजाफे को बीजेपी को फायदा पहुंचाने की कोशिश कवायद बता रहा है। 

क्या बदलाव किए गए हैं?
पांचों लोकसभा क्षेत्र में एक समान सीट
आयोग ने सभी पांचों लोकसभा क्षेत्र में बारबर-बराबर विधानसभा सीटों की संख्या रखने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही स्थानीय प्रतिनिधियों की मांग के हिसाब से कुछ विधानसभा क्षेत्रों के नाम भी बदले गए हैं। पहले जम्मू संभाग में दो सीटें- जम्मू और उधमपुर और कश्मीर संभाग में श्रीनगर, अनंतनाग औऱ बारामुला सीटें हुआ करती थीं। नई व्यवस्था में दोनों इलाकों में ढाई-ढाई सीटों का बंटवारा कर दिया गया है। जम्मू सीट का रजौरी पुंछ का इलाका अनंतनाद में मिलाते हुए इस सीट को अनंतनाग -रजौरी नाम दिया गया है। 
संसदीय सीटों में बदलाव का क्या मतलब है?
अनंतनाग और जम्मू के पुनर्गठन से इन सीटों पर विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों का प्रभाव बदल जाएगा। आयोग ने अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ विधानसभा सीटें आरक्षित की हैं। इनमें से छह पुंछ और राजौरी सहित रेडरवान अनंतनाग संसदीय सीट पर हैं, जहां अनुसूचित जनजाति की आबादी सबसे अधिक है। विपक्षी दलों का अनुमान है कि संसदीय सीट भी एसटी के लिए आरक्षित होगी। पूर्ववर्ती अनंतनाग सीट में एसटी आबादी कम थी। अगर पुंछ और राजौरी जम्मू लोकसभा सीट में बने रहते हैं तो इसे ST रिजर्व लोकसभा सीट घोषित करना पड़ सकता है। इससे बीजेपी को हिंदू वोट मजबूत करने में मदद मिलेगी।  लेकिन फिर से किए गए परिसीमन में पुंछ और राजौरी द्वारा तय किया जाएगा। घाटी में राजनीतिक दल इसे जातीय कश्मीरी भाषी मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव को कम करने के रूप में देखते हैं। घाटी में पार्टियों को उम्मीद है कि बारामूला के पुनर्गठन से शिया वोट मजबूत होंगे। इससे सज्जाद लोन के पीपुल्स कॉन्फ्रेंस में शिया नेता इमरान रजा अंसारी को मदद मिल सकती है।

विधानसभा सीटों में इजाफा: आयोग ने सात विधानसभा सीटों में वृद्धि की है – जम्मू में छह (अब 43 सीटें) और कश्मीर में एक (अब 47)। इसने मौजूदा विधानसभा सीटों की संरचना में भी बड़े पैमाने पर बदलाव किए हैं।
विधानसभा सीटों में बदलाव के मायने क्या है?
अभी जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बहुल वाले कश्मीर में 46 सीटें हैं और बहुमत के लिए 44 सीटें ही चाहिए। हिंदू बहुल इलाके जम्मू में 37 सीटें हैं। ऐसे में अधिकांश मुख्यमंत्री कश्मीर के बनते रहे हैं। परिसीमन के बाद यह गणित बदल जाएगा। नए परिसीमन के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की कुल 90 सीटों में से अब 43 जम्मू में और 47 कश्मीर में होंगी। साथ ही 2 सीटें कश्मीरी पंडितों के लिए रिजर्व करने का सुझाव दिया गया है। परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना है, परिवर्तनों का मतलब है कि जम्मू की 44%  आबादी 48% सीटों पर मतदान करेगी, जबकि कश्मीर में रहने वाले 56% लोग शेष 52% सीटों पर मतदान करेंगे। पहले के सेट-अप में, कश्मीर के 56% में 55.4% सीटों परऔर जम्मू के 43.8 फीसदी लोग 44.5% सीटों पर वोट करते थे। 
अगला कदम: विधानसभा चुनाव
अब अंतिम आदेश अधिसूचित होने के साथ, विधानसभा चुनाव के समय को लेकर सभी की निगाहें चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर होंगी। हालांकि घाटी में मुख्यधारा की पार्टियों ने रिपोर्ट की आलोचना की है, लेकिन संभावना है कि इससे केंद्र शासित प्रदेश में राजनीतिक जुड़ाव के लिए जगह बनेगी। बदले हालात में ये उम्मीद की जा सकती है कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में साल के अंत में होने वाले चुनावों के साथ ही जम्मू कश्मीर में भी चुनाव हो जाएं ताकि वहां सामान्य लोकतांत्रिक हालात बहाल हो और उसे राज्य का दर्जा वापस मिलने की स्थितियां बने। 

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