फव्वारा फव्वारा चिल्लाने वाले थोड़ा गौर से देखें, उन्हें शिवलिंग दिखाई दे जाएगा

 नीरज कुमार दुबे

मुगल काल में प्रमुख हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया इस इतिहास से सब परिचित हैं। ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ से लेकर वाराणसी वैभव तक में प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर के विध्वंस का जिक्र है। यही नहीं जिस जगह शिवलिंग मिला है पौराणिक ग्रंथों में उसके वहीं पर होने की बात का उल्लेख भी है।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में शिवलिंग मिलने की खबर से देश-विदेश के करोड़ों हिंदुओं में उल्लास का माहौल है लेकिन मुस्लिम पक्ष और बड़बोले बयान देने वाले नेता असद्दुदीन ओवैसी शिवलिंग को फव्वारा बता रहे हैं। लेकिन हम यहां फव्वारा प्रेमी ओवैसी जैसे लोगों को बताना चाहेंगे कि पौराणिक ग्रंथों में जहां शिवलिंग होने का उल्लेख किया गया है एकदम वहीं पर शिवलिंग मिले हैं। नंदी बाबा वर्षों से बैठे-बैठे जिस ओर देख रहे हैं, वहीं भोले बाबा मिले हैं। इस समय सोशल मीडिया पर ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वायरल हो रहे वीडियो को जरा गौर से देखिये। इस वीडियो की क्वालिटी सही नहीं होने के बावजूद कोई भी इसे देखकर बता देगा कि वहां तो शिवलिंग है। जो इसे फव्वारा बता रहे हैं क्या वह जानते नहीं कि फव्वारे में छेद होता है और उसमें नीचे से कोई पाइप भी होता है। जब इसमें नीचे पाइप नहीं है और ऊपर छेद नहीं है तो क्या यह कोई चमत्कारी फव्वारा था? सवाल यह भी उठता है कि शिवलिंग को फव्वारा कहने वाले फव्वारा प्रेमी क्या इस फव्वारे को चलाकर दिखा सकते हैं? जो लोग सर्वे के दौरान वहां मौजूद थे वह खुद बता रहे हैं कि वहां चिकने काले पत्थर का शिवलिंग था।

पौराणिक ग्रंथों को भी देख लीजिये
मुगल काल में प्रमुख हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया इस इतिहास से सब परिचित हैं। ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ से लेकर वाराणसी वैभव तक में प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर के विध्वंस का जिक्र है। यही नहीं जिस जगह शिवलिंग मिला है पौराणिक ग्रंथों में उसके वहीं पर होने की बात का उल्लेख भी है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष नागेंद्र पाण्डेय ने भी मीडिया से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है कि पुराणों में स्पष्ट रूप से ज्ञानवापी मंदिर और वहां स्थित एक ‘ज्योतिर्लिंग’ के बारे में विस्तार से उल्लेख है। उन्होंने कहा है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद हमारे शास्त्रों में वर्णित मंदिर परिसर का एक हिस्सा था।
क्या नमाज पढ़ने से ही कोई स्थल बन जाता है मस्जिद?
अब मुस्लिम पक्ष कह रहा है कि हम जहां वर्षों से नमाज पढ़ रहे हैं वह हमारी मस्जिद हुई इसलिए हिंदू पक्ष का कोई दावा नहीं बनता। इस पर दो बातें हम कहना चाहेंगे। पहली यह कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं के लिए पवित्र ज्योतिर्लिंग पर दूसरे पक्ष के लोग वजू करते रहे। दूसरी बात यह है कि किसी भी साफ जगह पर ही नमाज पढ़ी जा सकती है और सिर्फ मस्जिद में नमाज पढ़ने का कुरान में जिक्र नहीं है। ऐसे तो आप रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, सड़क आदि पर भी नमाज पढ़ते हैं तो क्या वह भी मस्जिद हो गयी? किसी स्थान पर केवल नमाज पढ़ने से वह स्थान मस्जिद नहीं बन जाता है। स्वेच्छा से दान की जमीन या खरीदी हुई जमीन या निजी जमीन पर ही मस्जिद बन सकती है। इसके अतिरिक्त सब अवैध निर्माण है। इस्लामिक लॉ के अनुसार दूसरे समुदाय के धर्मस्थल पर मस्जिद नहीं बन सकती है वहीं हिंदू मान्यताओं के अनुसार जब तक विधि पूर्वक पूजन अर्चन के बाद मूर्ति का विसर्जन नहीं किया जाता तब तक वह स्थान मंदिर कहलाता है। इसलिए ज्ञानवापी मंदिर आज भी मंदिर है। चाहे गुंबद बदल दीजिये या मंदिर की दीवार तोड़ दीजिये, मंदिर हमेशा मंदिर ही रहता है। और अभी तो कमीशन की कार्रवाई में जो शिवलिंग मिला है वह मलबे से ढका हुआ होने के कारण 3-4 फीट ही दिखाई दे रहा है। संभावना है कि वो और भी बड़ा हो इसलिए मलबे को हटाकर और दरवाजे को खोलकर स्पष्ट शिवलिंग की रिपोर्ट सामने आना जरूरी है।

आइये अब बात करते हैं ओवैसी की
ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वह ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण से आहत हैं क्योंकि इसमें 1991 के उच्चतम न्यायालय के फैसले की अनदेखी की गई है। हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद ओवैसी ने कहा कि ‘‘अब दोबारा कोई मस्जिद नहीं खोएंगे और ज्ञानवापी कयामत तक मस्जिद ही रहेगी।’’ उन्होंने भी कहा कि जिसे हिंदू पक्ष शिवलिंग बता रहा है वह दरअसल फव्वारा है। दरअसल ओवैसी को शिवलिंग फव्वारा इसलिए भी नजर आ रहा होगा क्योंकि वह अक्सर बोलते हुए आंखें बंद कर लेते हैं और जब आंखें बंद करके बोलेंगे तो सामने खड़ा सच कहां से दिखेगा? ओवैसी जी जहां शिवलिंग मिला है वहां तालाब का आकार 30 गुणे 30 फीट है और उसके बीच में एक गोलाकार स्थान है, जहां शिवलिंग स्थित है। तालाब पहले से ही लोहे के जाली से घिरा हुआ है और टिन शेड से ढका हुआ है। इसमें जाने के लिए तीन दरवाजे हैं। तालाब के चारों तरफ नल लगे हुए हैं, जिनमें तालाब का पानी आता है। इस तालाब में मछलियां भी हैं जिन्हें गंगाजी में छोड़ने की बात हो रही है। यह सब बातें हमने आपको इसलिए बताईं क्योंकि पौराणिक ग्रंथों में भी इन सब बातों का उल्लेख मिलता है। पौराणिक ग्रंथ आज तो लिखे नहीं गये इसलिए फव्वारा प्रेमियों को इस जिद पर नहीं अड़ना चाहिए कि “ज्ञानवापी मस्जिद, मस्जिद है और मस्जिद ही रहेगी बल्कि उनको यह सच स्वीकार करना चाहिए कि वहां शिव मंदिर था जो फिर से मिल गया है और इतिहास में की गयी गलतियों को सुधारने में सभी को सहयोग करना ही चाहिए।
बहरहाल, सब कुछ न्यायिक और लोकतांत्रिक तरीके से ही हो यह सुनिश्चित करना हमारी अदालतों और सरकारों की अभिन्न जिम्मेदारी है। इस मामले का हल न्यायिक तंत्र से आये तो ज्यादा हितकर रहेगा क्योंकि यदि इस मुद्दे को राजनीति के हवाले छोड़ा गया तो माहौल तनावपूर्ण ही रहेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *