उत्तर प्रदेश व बिहार से बाहर भी है जातिवाद की भयंकर राजनीति


 अभिनय आकाश

1985 में कांग्रेस का वोट 55.6 फीसदी था जो गिरकर 2017 में 41.1 फीसदी रह गया। इसी अवधि में बीजेपी का ग्राफ 15 फीसदी से बढ़ते हुए 49 फीसदी तक पहुंच गया। पिछले चार चुनावों में बीजेपी के लिए, ये 48-50 फीसदी के बीच रहा है।

गुजरात में एक कहावत है: “जब कुछ नहीं काम करता, तो मोदी काम करते हैं। ऐसा ही कुछ नजारा देखने को भी मिला था। भाजपा जहां विकास बुलंद है, मैं ही गुजरात हूं, मैं ही विकास हूं’ जैसे नारे के साथ चुनावी रण में अपना खम ठोकती नज़र आ रही थी तो वहीँ राहुल गांधी गुजरात में विकास को पागल करार देने में लगे थे। कांग्रेस की तरफ से जहां हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की तिकड़ी के भरत सिंह सोलंकी की खाम थ्योरी की तर्ज पर मैदान मारने की मंशा थी। लेकिन पाटीदार आंदोलन, ऊना की घटना और जातिय गोलबंदी को मोदी की एक भावुक अपील के जरिये ऐसे हवा कर दिया की विपक्ष का सत्ता से वनवास का दौर तीन दशक के आंकड़े को छूने के करीब पहुंच गया। देश में जब कभी भी जातिवादी राजनीति की चर्चा होती है तो उत्तर प्रदेश और बिहार का नाम हर किसी के दिमाग में तपाक से आ जाता है। इसके पीछे की वजहें भी हैं। मसलन, जयप्रकाश नारायण का इंदिरा गांधी सरकार की इमरजेंसी के खिलाफ किए गए आंदोलन और उससे उपजे लालू, मुलायम, मायावती, रामविलास, नीतीश जैसे कई नेताओं ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए जातिवाद का भरपूर सहारा लिया। लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल और केवल यूपी और बिहार में ही जातिवाद की राजनीति देखने को मिलती है। लेकिन उसकी चर्चा उतनी प्रमुखता से नहीं होती है। गुजराती साहित्य परिषद के संस्थापक रंजीतराम मेहता ने 100 साल पहले अपने एक लेख में लिखा भी था कि पूरे भारत में सबसे ज़्यादा जातिवाद गुजरात में है।

गुजरात का जातिय समीकरण
गुजरात के जातिय समीकरण पर अगर गौर करें तो यहां करीब 52 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) बेताज बादशाह है। राज्य में 146 जातियां ओबीसी की कटेगरी में आती हैं। इसके अलावा 16 फीसदी पाटीदार समुदाय (सामान्य जाति में आता है) को गुजरात का किेंगमेकर कहा जाता है।  गुजरात में 7 फीसदी दलित, 11 फीसदी आदिवासी, 9 फीसदी मुस्लिम और 5 फीसदी में सामान्य जाति के ब्राह्मण, बनिया और अन्य जातियां शामिल है। 1960 में गुजरात के गठन के बाद पहली बार 1973 में चिमनभाई पटेल ग़ैर ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। इसके पहले जीवराज नारायण मेहता बनिया थे और बाक़ी के मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। ऐसा तब था जब गुजरात में ब्राह्मण जाति एक फ़ीसदी से भी कम थी।
कांग्रेस की खाम थ्योरी जिसका रिकॉर्ड आज भी कायम है 
 राज्य में क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुसलमान (खाम) के गठजोड़ की उनकी सोशल इंजीनियरिंग सफल रही और कांग्रेस के लिए कारगर साबित हुई। 1985 के चुनाव में कांग्रेस को 149 सीटें मिलीं। बहरहाल, आरक्षण विरोधी आंदोलन के जारी रहने और सांप्रदायिक दंगों के कारण सोलंकी को जुलाई, 1985 में फिर से इस्तीफा देना पड़ा। वह चौथी बार दिसंबर, 1989 से मई 1990 तक मुख्यमंत्री रहे। राज्य में और देश में बीजेपी की लहर और नरेंद्र मोदी के करिश्माई चेहरे और अमित शाह जैसे राजनीति के चाणक्य के कुशल संयोग के बावजूद आजतक वह रिकॉर्ड नहीं टूट सका है।
गुजरात की राजनीति का किंगमेकर है पटेल समुदाय
पाटीदार गुजरात का ताक़तवर राजनीतिक समुदाय बना हुआ है। आबादी में तो ये सिर्फ 15 प्रतिशत हैं। लेकिन 85 प्रतिशत पर भारी पड़ते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल, केशुभाई पटेल, चिमनभाई पटेल, आनंदीबेन पटेल और अभी कुछ समय पहले सामने आए युवा नेता हार्दिक पटेल. ऐसे तमाम नेता, इस समुदाय से उभरे। इन नेताओं का उभार यह साबित करता है कि पाटीदारों ने अन्य जातियों के मुकाबले बहुत पहले राजनीति में हिस्सेदारी बनानी शुरू कर दी थी और आज वे अपना राजनीतिक आधार बहुत मजबूत कर चुके हैं। आज इस समुदाय की गुजरात में क्या हैसियत है, इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि भाजपा ने राज्य चुनाव से ठीक सालभर पहले पाटीदार नेता- भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया है। वैसे तो यह समुदाय कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अहम रहा है। लेकिन यह खुद भाजपा की तरफ झुका नजर आता है क्योंकि भाजपा ने उन्हें अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व देकर उनका दिल जीता है। बीजेपी के साथ पाटेदारों को जोड़ने में केशुभाई पटेल की बहुत बड़ी भूमिका थी। बीजेपी से अलग होने के बाद उन्होंने पाटेदारों की अस्मिता को बहुत बड़ा मुद्दा बनाया था। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में अटकलें लगाई जा रही थी कि अगर पाटेदार केशुभाई पटेल के साथ चले गए तो बीजेपी के लिए मुश्किल हो जाएगी। नतीजे आए तो बीजेपी की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था। जबकि केशुभाई पटेल की पार्टी को करीब 3.6 प्रतिशत वोट मिले थे और 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। मतलब साफ था कि पटेल समुदाय ने मोदी के नेतृत्व में लड़ रही भाजपा को ही चुना था। मोदी के जाने के बाद गुजरात के जो हालात बने उन्हें संभालना आनंदीबेन पटेल के लिए बेहद मुश्किल भरा रहा। बतौर मुख्यमंत्री आनंदीबेन की पहली राजनीतिक परीक्षा पटेल आंदोलन के समय हुई लेकिन इस राजनीतिक परीक्षा में आनंदीबेन फ़ेल साबित हुई और जो पाटीदार समुदाय एक समय भाजपा का मजबूत आधार मन जाता रहा वह भाजपा से दूर जाता दिखा। बाद में डैमेज कंट्रोल के रूप में आनंदीबेन की जगह विजय रूपाणी को सीएम और नितिन पटेल को डिप्टी सीएम बनाया गया था। गुजरात की 182 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 92 सीटें चाहिए। वोटों के लिहाज से देखें तो पाटेदार गुजरात में 182 में से कुल 60 सीटों पर अपना दबदबा रखते हैं। 
गुजरात की राजनीति का यूपी है सौराष्ट्र
गुजरात की राजनीति में सौराष्ट्र का वही रोल है, जो देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश का है। राज्य के 182 विधायकों में से सबसे ज्यादा 54 विधायक सौराष्ट्र से आते हैं। यहां पर भी जातिगत राजनीति का बोलबाला है।  सौराष्ट्र की इन 54 सीटों पर साल 2017 के चुनाव में बीजेपी को कांग्रेस से जबरदस्त टक्कर मिली थी। पाटीदार आंदोलन की वजह से कांग्रेस ने सौराष्ट्र में 55 फीसदी सीटें अपने नाम कर ली थी जबकि बीजेपी को 33 फीसदी सीटें प्राप्त हुई थी। इस तरह से 54 में से 30 सीटों पर कांग्रेस ने फतह हासिल की और बीजेपी को 23 सीटों से संतोष करना पड़ा था। 
बीजेपी और कांग्रेस के बीच रहा 10 प्रतिशत का अंतर
1985 में भी कांग्रेस इस फॉर्मूलों को अपनाकर चुनावी जीत हासिल कर चुकी है। लेकिन ओबीसी समुदाय को जब गुजरात में आरक्षण दिया गया तो पाटीदार समुदाय कांग्रेस से जुदा हो गया था। इसके बाद कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने सियासी फॉर्मूला बनाया था, जिसमें गुजरात के ओबीसी, मुस्लिम, दलित और आदिवासी शामिल थे। 1985 में कांग्रेस का वोट 55.6 फीसदी था जो गिरकर 2017 में 41.1 फीसदी रह गया। इसी अवधि में बीजेपी का ग्राफ 15 फीसदी से बढ़ते हुए 49 फीसदी तक पहुंच गया। पिछले चार चुनावों में बीजेपी के लिए, ये 48-50 फीसदी के बीच रहा है। कांग्रेस ने भी 1990 में 30.7 फीसदी से अपना प्रदर्शन सुधारते हुए। 2012 में इसे 39 फीसदी तक पहुंचाया। औसतन बीजेपी और कांग्रेस के बीच 10 फीसदी वोटों का अंतर रहा है।   
 साल बीजेपी कांग्रेस 2002 49.85 30.59 2007 49.12 39.63 2012 48.30 40.59 2017 49.01 41.01
गुजरात में दलित राजनीति का उभार
लोकतंत्र में संख्याएँ बहुत मायने रखती हैं। संख्याएँ सबाल्टर्न सामाजिक समूहों को राजनीतिक प्रभाव हासिल करने की क्षमता देती हैं और संसाधनों, विकास और सत्ता में हिस्सेदारी का अवसर भी देती हैं। कुछ महीने पहले, हमने पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव देखे थे। इस साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे। गुजरात में अनुसूचित जनजाति (एसटी) 16% और अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 7 प्रतिशत अनुमानित है – इसमें लगभग 36 जातियाँ और सामाजिक समूह शामिल हैं। भारत के अन्य हिस्सों की तरह, गुजरात में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जाति भी अभी तक राजनीतिक रूप से शक्तिशाली ब्लॉक के रूप में विकसित नहीं हुई है। गुजरात में वंकर, वाल्मीकि, खाल्पा (चंभर), मेघवाल एससी के बीच तुलनात्मक रूप से बड़े समुदाय हैं। हालांकि प्रभावशाली संख्या में होने के बावजूद राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व अभी तक दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि, सरकारी लाभ, विकास कार्यक्रम, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का लाभ धीरे ही सही लेकिन उन तक पहुंच रहा है। गुजरात में कांग्रेस के शासन में इन हाशिए पर पड़े समुदायों के कुछ राजनीतिक नेता सामने आए, मुख्यतः क्योंकि उन्होंने अपनी जड़ों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में खोजा था। लेकिन समय के साथ कांग्रेस की राजनीति में इन नेताओं ने अपनी चमक खो दी, जिसकी विभिन्न वजहें हो सकती हैं। कांग्रेस के समय में तैयार किए गए कई दलित नेता अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में चले गए हैं, जो राज्य में लगभग 27 वर्षों से सत्ता में है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में राज्य में एक मजबूत नेतृत्व विकसित किया है, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) है जिसने स्वतंत्रता के बाद इन समुदायों के बीच काम करना शुरू किया। पिछले तीन-चार दशकों में, संगठन के प्रयासों ने इन हाशिए के समुदायों के राजनीतिक प्रोफाइल में बदलाव किया है। हिंदुत्व की बुनियाद पर भाजपा सरकार के कल्याणवाद ने इन समुदायों को पार्टी के और करीब लाकर खड़ा कर दिया। साल 2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो आदिवासी और दलित लोगों ने भाजपा के ऊपर अपना विश्वास जताया था। भाजपा के खिलाफ दलित नेता जिग्नेश मेवानी के धुंआधार प्रचार, ऊना जैसी घटनाओं के बावजूद कोई खास असर नहीं पड़ा और बीजेपी ने दलित और आदिवासी बहुल क्षेत्र में 15 फीसदी का भारी इजाफा हासिल किया। गुजरात की 6 करोड़ की आबादी में 11 फीसदी आदिवासी मतदाता है जो कई सीटों पर चुनाव परिणामों को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए कांग्रेस, बीजेपी आदिवासी मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए जोर आजमाइश कर रही है। वहीं इस कड़ी में आम आदमी पार्टी भी शामिल होती दिख रही है। प्रदेश में पहली बार आम आदमी पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने को तैयार है। गुजरात में आदिवासी समुदाय के बाद अब सौराष्ट्र के पाटीदारों को साधने की कवायद के साथ आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के राजकोट में जनसभा को संबोधित किया। 10 दिनों के भीतर केजरीवाल ने दो बार गुजरात का दौरा कर लिया है। ये कदम ये बताने के लिए साफ है कि आम आदमी पार्टी (आप), जो गुजरात की राजनीति में अपेक्षाकृत नई जगह तलाश रही है। आप की नजर भी दलित वोटरों पर है इसलिए वो दलितों को पार्टी में स्थान और स्थानीय चुनावों में टिकट देकर उन्हें लुभाने की कोशिश कर रही है। 

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