श्रीलंका की विषम परिस्थिति और विक्रम सिंघे का नेतृत्व

 नीरज कुमार दुबे

श्रीलंकाई राजनीति में यह बड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम है कि वकील से नेता बने विक्रमसिंघे ने अगस्त 2020 में हुए आम चुनाव में अपनी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के हारने और एक भी सीट नहीं जीत पाने के लगभग दो साल बाद उल्लेखनीय रूप से वापसी करने में सफलता हासिल की है।

अपने इतिहास में सबसे बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका की जनता को समझना होगा कि उपद्रव से शांति और संपन्नता नहीं आ सकती। सरकार पर देश को आर्थिक बदहाली में पहुँचाने का आरोप लगाने वाली जनता खुद भी संसाधनों को जिस तरह नुकसान पहुँचा रही है वह सरासर गलत है। आगजनी और तोड़फोड़ से श्रीलंका को वापस अपने पैरों पर खड़ा होने में दशकों लग जायेंगे। पूरी दुनिया में श्रीलंका ही ऐसा देश है जहां जनता सरकारी बसों को फूंकने के बाद उसके साथ सेल्फी लेने भी पहुँच रही है।

इस बीच, संसदीय राजनीति का 45 वर्ष का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ नेता रानिल विक्रमसिंघे को देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को स्थिरता प्रदान करने के लिए 26वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गयी है। उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही महिंदा राजपक्षे को हिंसक झड़पों के बाद प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके चलते श्रीलंका में तीन दिन तक कोई सरकार नहीं थी और जब सरकार ही नहीं थी तो जनता ने भी जमकर उपद्रव मचाया। अब देखना होगा कि विक्रमसिंघे को जिन उम्मीदों के साथ लाया गया है क्या वह उस पर खरा उतर पाते हैं।

क्या बहुमत साबित कर पाएंगे विक्रमसिंघे?
फिलहाल तो सत्तारुढ़ श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (एसएलपीपी), विपक्षी समगी जन बालावेगाया (एसजेबी) के एक धड़े और अन्य कई दलों के सदस्यों ने संसद में विक्रमसिंघे के बहुमत साबित करने के लिए अपना समर्थन जताया है। हालांकि कई वर्ग नए प्रधानमंत्री के रूप में विक्रमसिंघे की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं।
विक्रमसिंघे पर लगाया दांव कितना रंग लायेगा?
देखा जाये तो विक्रमसिंघे की दूरदृष्टि वाली नीतियों के साथ अर्थव्यवस्था को संभालने वाले नेता के तौर पर व्यापक स्वीकार्यता है। उन्हें श्रीलंका का ऐसा राजनेता माना जाता है जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जुटा सकते हैं। श्रीलंकाई राजनीति में यह बड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम है कि वकील से नेता बने विक्रमसिंघे ने अगस्त 2020 में हुए आम चुनाव में अपनी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के हारने और एक भी सीट न जीत पाने के लगभग दो साल बाद उल्लेखनीय रूप से वापसी करने में सफलता हासिल की है। वैसे भारत के करीबी माने जाने वाले 73 वर्षीय नेता विक्रमसिंघे भले पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हों लेकिन इस बार की उनकी पारी सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। यदि वर्तमान हालात से उन्होंने श्रीलंका को उबार लिया तो वह इतिहास के पन्नों में अमर हो जायेंगे। बस जरूरत है उन्हें टिक कर काम करने दिया जाये।
उनकी नियुक्ति ने नेतृत्व के शून्य को तो भर दिया है लेकिन देखना होगा कि वह श्रीलंका का खाली पड़ा खजाना भी भर पाते हैं या नहीं? वैसे विक्रमसिंघे ने अपने साढ़े चार दशक के राजनीतिक कॅरियर के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। उनकी पार्टी यूएनपी देश की सबसे पुरानी पार्टी है जो 2020 के संसदीय चुनाव में एक भी सीट जीतने में विफल रही थी। 1977 के बाद यह पहली बार हुआ जब उनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। यूएनपी के मजबूत गढ़ रहे कोलंबो से चुनाव लड़ने वाले विक्रमसिंघे खुद भी चुनाव हार गए थे। बाद में वह सकल राष्ट्रीय मतों के आधार पर यूएनपी को आवंटित राष्ट्रीय सूची के माध्यम से संसद पहुंच सके थे।

कब-कब प्रधानमंत्री रहे विक्रमसिंघे
हम आपको बता दें कि श्रीलंका के पहले कार्यकारी राष्ट्रपति जूनियस जयवर्धने के भतीजे विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदास की हत्या के बाद पहली बार 1993-1994 तक प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था। वह 2001-2004 तक भी तब प्रधानमंत्री रहे जब 2001 में संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चा ने आम चुनाव जीता था। लेकिन चंद्रिका कुमारतुंगा द्वारा जल्द चुनाव कराए जाने के बाद, 2004 में उन्होंने सत्ता खो दी। विक्रमसिंघे ने 2015 के चुनाव में महिंदा राजपक्षे को करारी शिकस्त दी थी और अल्पमत सरकार का नेतृत्व किया था। वर्ष 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति सिरिसेना ने प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया और महिंदा राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया। सिरिसेना के इस कदम से देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया। हालांकि, उच्चतम न्यायालय के एक फैसले ने राष्ट्रपति सिरिसेना को विक्रमसिंघे को बहाल करने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे राजपक्षे का संक्षिप्त शासन समाप्त हो गया।
विक्रमसिंघे के शुरुआती दिन
श्रीलंका को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद 1949 में जन्मे विक्रमसिंघे 1977 में 28 साल की उम्र में संसद के लिए चुने गए थे। वह विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) की यूथ लीग में शामिल हो गए थे। उस समय श्रीलंका में सबसे कम उम्र के मंत्री के रूप में, उन्होंने राष्ट्रपति जयवर्धने के अधीन उप विदेश मंत्री का पद संभाला था।
बहरहाल, श्रीलंका में नयी सरकार बनने के बाद भी ‘पिक्चर अभी बाकी है’ वाला डॉयलॉग फिट बैठता है क्योंकि देश की जनता राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के भी इस्तीफे की मांग कर रही है। लेकिन राष्ट्रपति किसी तरह अपनी कुर्सी बचाने की कवायद में लगे हुए हैं। उन्होंने नयी सरकार को राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने और संसद को ज्यादा शक्तियां प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार पेश करने को कहा है। देखना होगा कि श्रीलंका में यह सब कवायद जनता का समर्थन हासिल कर पाती है या नहीं और वहां राजनीतिक एकता स्थापित हो पाती है या नहीं? श्रीलंका के जो मसले हैं उसका हल इस देश को खुद एकजुट होकर निकालना होगा। दुनिया श्रीलंका की सिर्फ मदद कर सकती है लेकिन रास्ता खोजने और पहल करने की कवायद खुद श्रीलंका को करनी होगी।

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