भारत में नई जनगणना की नई तकनीक

 अभिनय आकाश

ई-जनगणना की शुरुआत के साथ देश की 50 प्रतिशत आबादी अपने फोन पर डाउनलोड किए गए मोबाइल एप्लिकेशन पर अपना डेटा फीड कर सकेगी। जन्म के समय जनगणना में एक व्यक्ति का नाम जोड़ा जाएगा।

हम सब ने बचपन में जनसंख्या पर कई सारे निबंध लिखे। कैसे बढ़ती जनसंख्या ने देश के संसाधनों पर इतना दबाव बना दिया कि तरक्की नहीं हो पाई। फिर एक डर ये भी दिखाया जाता है कि देश में मुसलमानों की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि देश में जनसंख्या का अनुपात ही गड़बड़ा जाएगा। जनसंख्या को लेकर जितनी मुंह उतनी बातें। वैसे किसी भी विकासशील देश की उन्नति तभी रफ्तार पकड़ती है जब उस देश में रह रहे लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हों। इसके लिए सरकार नई नीतियां और योजनाएं बनाती रही है। लेकिन कई बार ये योजनाएं और नीतियां विफल साबित हुई हैं। इस बारे में कई लोगों का मानना है कि सरकार के पास जनगणना के सही आंकड़े नहीं हैं या फिर जनगणना सही तरीके के नहीं की गई। आंकड़े जुटाने के लिए लोगों के घर घर जाया जाता है और इससे जुड़े कई सारे सवाल पूछे जाते हैं जो फॉर्म में दर्ज होते हैं। लेकिन क्या हो अगर इस बार जनगणना करने वाले लोग आपके घर ही न आएं? आप अपने मोबाइल से ही अपना डेटा भर दें और आपका काम हो जाए। ये कोई मन की कपोर कल्पना नहीं बल्कि आने वाले वक्त की एक झलक है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम के अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान कहा कि भारत की अगली जनगणना इलेक्ट्रॉनिक जनगणना या ई-जनगणना होगी। गुवाहाटी में अमिनगांव क्षेत्र में जनगणना संचालन निदेशालय (असम) भवन का उद्घाटन करते हुए शाह ने कहा कि अगली जनगणना, जिसमें COVID के कारण देरी हुई है, एक ई-जनगणना होगी … सौ प्रतिशत पूर्ण जनगणना, जिसके आधार पर अगले 25 वर्षों के लिए देश का रोडमैप बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि ई-जनगणना में चुनौतियां तो होंगी ही, इसके फायदे भी होंगे।

जनगणना क्यों और कैसे होती है?

देश के प्रत्येक नागरिक की सामाजिक, आर्थिक स्थिति का आकलन करने और इसके आधार पर किसी क्षेत्र विशेष में विकास कार्यों को लेकर सरकारी नीतियों का निर्धारण करने के लिए लोगों की गिनती यानी जनगणना हर 10 साल में की जाती है। हर दस साल पर देश में जनगणना होती है। आजादी के बाद पहली बार जनगणना 1951 में हुई थी। 2011 तक जनगणना करने वाले अधिकारी घर-घर जाकर फॉर्म के जरिये जानकारी एकट्ठा करते हैं। इसमें गांव, शहर में रहने वालों की गिनती के साथ साथ उनके रोज़गार, जीवन स्तर, आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक स्थिति, उम्र, लिंग, व्यवसाय इत्यादि से जुड़े आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं। जिसके लिए हर घर से दो फॉर्म भरे जाते हैं। इसमें सबसे पहले हाउसिंग सेंसस होता है। इसमें घर, घर के उपयोग, पीने के पानी और शौचालय की उपलब्धता, बिजली आदि से संबंधित सवाल होते हैं। इसके बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर से संबंधित सवाल होते हैं। इस सेक्शन में भी कई जानकारियां मांगी जाती है। इन आंकड़ों का इस्तेमाल केंद्र और राज्य सरकारें नीतियां बनाने के लिए करती हैं। 

जनगणना के नियमों में क्या बदलाव किए गए हैं?

पिछले महीने सरकार ने अगली जनगणना और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) सूची में ऑनलाइन स्व-गणना की अनुमति देने के लिए जनगणना नियमों में कुछ संशोधनों को अधिसूचित किया है।  गृह मंत्रालय के अनुसार, “सामान्य निवासी” वे हैं जो कम से कम पिछले छह महीनों से स्थानीय क्षेत्र में रह रहे हैं, या अगले छह महीनों के लिए किसी विशेष स्थान पर रहने का इरादा रखते हैं। एक गजट अधिसूचना में, केंद्र ने जनगणना के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों की अनुसूची में “इलेक्ट्रॉनिक रूप” और “स्व-गणना” को शामिल करने के लिए जनगणना नियम, 1990 में संशोधन किया। संशोधन नियम -2 के खंड सी में डाला गया है, जो परिभाषाओं से संबंधित है। क्लॉज सी जनगणना अनुसूची का अर्थ है अजिसमें अधिनियम की धारा 8 की उप-धारा (1) में संदर्भित प्रश्न हैं।

ई जनगणना की जरूरत क्यों है

जनगणना की प्रक्रिया काफी जटिल होने के साथ ही इसमें कई बार गलतफहमी में लोग सही जानकारी नहीं दर्ज कराते हैं। हाल ही में सीएए और एनआरसी को लेकर हुए विवाद का असर जनगणा की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। अबत तक जिस तहर से जनगणना होती आई है उस पूरे अभियान में हजारों करोड़ का खर्च आता है। 

ई-जनगणना कैसे काम करेगी?

अमित शाह के अनुसार जनगणना “आधुनिक तकनीकों की मदद से अधिक वैज्ञानिक, सटीक और बहुआयामी” होगी। सरकार ई-जनगणना के लिए नया सॉफ्टवेयर तैयार कर रही है। ई-जनगणना की शुरुआत के साथ देश की 50 प्रतिशत आबादी अपने फोन पर डाउनलोड किए गए मोबाइल एप्लिकेशन पर अपना डेटा फीड कर सकेगी। जन्म के समय जनगणना में एक व्यक्ति का नाम जोड़ा जाएगा। जब वे 18 साल के हो जाएंगे, तो नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और मृत्यु के बाद, नाम हटा दिया जाएगा। जन्म और मृत्यु रजिस्टर को जनगणना से जोड़ा जाएगा। इसका मतलब है कि जनगणना देश में हर जन्म और मृत्यु के बाद अपने आप अपडेट हो जाएगी। गृह मंत्री के अनुसार, जनगणना के आंकड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तन, आर्थिक मानचित्रण, विकास के मानकों में पीछे छूटे क्षेत्रों और सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ई-जनगणना में विभिन्न एजेंसियां ​​शामिल होंगी और पते बदलने जैसी प्रक्रियाएं आसान होंगी। ऑनलाइन स्व-गणना के अलावा, जनगणना डेटा एकत्र करने के लिए प्रगणकों द्वारा घर का दौरा जारी रहेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घरों में आने वालों के पास टैबलेट या स्मार्टफोन होने की संभावना होगी, जो उन्हें सीधे एक पोर्टल में जानकारी दर्ज करेंगे। सितंबर 2020 में शाह द्वारा पहली बार एक ऑनलाइन जनगणना का उल्लेख किया गया था। फरवरी में, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसके लिए 3,786 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था।

आजादी से पहले और आजादी के बाद की जनगणना

भारतीय जनगणना के इतिहास को दो भागों में विभाजित करके देख सकते हैं। आजादी से पहले और आजादी के बाद की। किसी भारतीय शहर की पूरी जनगणना 1830 में हुई थी। जिसे ढाका (वर्तमान के बांग्लादेश की राजधानी) में हेनरी वाल्टर ने करवाई थी। इस जनगणना में लिंग, उम्र, घर जैसी चीजों की जानकारी लोगों से ली गई थी। 1866-67 में देश के अधिकतर हिस्सों में लोगों की गिनती की गई थी। जिसे 1872 के सेंसस के तौर पर जाना जाता है। 1881 के बाद हरेक 10 साल पर भारत में लगातार सेंसस हुए हैं। आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई थी। 10 साल में होने वाली जनगणना अब तक 7 बार हो चुकी है। भारत सरकार ने इससे पहले अप्रैल 2010 से सितंबर 2010 के दौरान जनगणना 2011 के लिए घर-घर जाकर सूची तैयार करने तथा प्रत्येक घर की जनगणना के चरण में देश के सभी सामान्य निवासियों के संबंध में विशिष्ट सूचना जमा करके इस डेटाबेस को तैयार करने का कार्य शुरू किया था। 

अगली जनगणना कब होगी?

जनगणना मार्च 2020 में हाउस-लिस्टिंग चरण और एनपीआर गणना के साथ शुरू होने वाली थी। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। भारत के इतिहास में पहली बार इसमें देरी हुई है। जबकि जनगणना कब शुरू होगी, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि जून 2022 तक जिलों और अन्य नागरिक और पुलिस इकाइयों की सीमाओं में बदलाव न करें।

खुलेंगे एनआरसी के रास्ते?

गृह मंत्रालय की तरफ से 2024 से पहले तक जनगणना रजिस्टर तैयार होने का दावा किया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो केंद्र सरकार को देश में रहने वाले वैध नागरिकों की एक सूची मिल जाएगी जो वृहद-व्यापक और त्रुटिविहीन होगी। ये जनगणना रजिस्टर एनआरसी को तैयार करने के लिए ब्लूप्रिंट का काम कर सकता है। बड़ी बात ये है कि एनआरसी में भी सरकार उन नागरिकों का डेटा चाहती है जो भारत के वैध नागरिक हों और जनगणना रजिस्टर भी लगभग इनहीं आंकड़ों का दस्तावेज है। जनगणना रजिस्टर के एक बार तैयार हो जाने के बाद इसमें भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने वालों के लिए अपना नाम दर्ज करवा पाना लगभग नामुकिन होगा। 

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