–शंकर दिग्विजय—


आदि गुरु शंकर के जीवन के बारे में जानने के दो प्रामाणिक स्रोत हैं- मध्वाचार्य का शंकर दिग्विजय और आनंदगिरि का वृहद शंकर विजय। आदिगुरु के बारे में समस्त जानकारी के स्रोत ये ही दो ग्रंथ हैं। मात्र छह वर्ष की आयु में घर से संन्यासी के रूप में निकले शंकर ने 32 वर्ष की आयु तक सारे भारत की लंबाई-चौड़ाई पैदल नाप ली थी। जिस समय शंकर भारत भ्रमण कर रहे थे भारत मे इस्लाम मालाबार के रास्ते प्रवेश कर चुका था। बौद्ध धर्म भारत मे दार्शनिक स्तर पर ही नहीं सांगठनिक स्तर पर भी गहरे अपनी जड़ जमा चुका था।

बौद्ध धर्म लोकोन्मुखी नहीं था। यह गृहस्थ लोगों की अभीप्सा शांत कर सके ऐसा धर्म नहीं था। यह सन्यासियों एवं मठों में पुष्पित पल्लवित हुआ धर्म था। मोक्ष की प्राप्ति केवल सन्यासी कर सकता था, गृहस्थ इसकी अभिलाषा नही कर सकता था। भारत की चेतना के साथ उसकी संगति नहीं बैठती थी। उसका स्वरूप व्यक्तिवादी था, भारत की चेतना समुदाय में बसती थी। बौद्धों की नीयत शून्यवादी थी, भारत को सगुण से अनुराग था। बौद्ध अनात्म की बात करता था, जबकि भारत की चेतना भगवत दर्शन के लिए विकल थी। बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्राप्त था किंतु कालान्तर में बुद्ध के धम्म में दोष चले आए थे। शंकर ने भारत को यह बोध कराया कि उसे सनातन की ही शरण में ही जाना होगा। किंतु बौद्धों को बौद्धिक रूप से पराजित किए बिना यह मनोवैज्ञानिक विजय सम्भव नहीं थी। इसमें शंकर की मेधा यह है कि उन्होंने सनातन परम्परा का परिमार्जन और उसमें अनेक रचनात्मक सुधार करते हुए ऐसा कर दिखाया। मात्र बौद्धिक विजय तो मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक श्रेष्ठता की थी, शंकर ने एक कुशल संगठक की तरह संन्यासियों को विभिन्न ‘अखाड़ों’ में संस्थागत किया एवं श्रद्धा के केंद्रों की रचना भारत को सांस्कृतिक सूत्र में बांधने के लिए की। अगर शंकर ने एक ही अखाड़ा बनाया होता तो क्या उसका नेतृत्व भी ‘पोप’ अथवा ‘खलीफा’ की तरह ‘स्टेट क्राफ्ट’ का एक औजार बन सकता था ???

कुमारिल भट्ट मीमांसा दर्शन के दो प्रधान संप्रदायों में से एक भट्टसंप्रदाय के संस्थापक थे। उन्होने बौद्ध धर्म को भारत से समूल उखाड़ने के लिए बौद्धिक दिग्विजय का दिव्य अभियान चलाया था। कुमारिल भट ने जो आधार तैयार किया उसी पर आदि शंकराचार्य ने विशाल भवन उठाया। कुमारिल ने बौद्ध धर्म का अध्ययन नालंदा गुरुकुल में किया वहीं उन्होंने उसके सांगठनिक ढांचे का अध्यन भी किया। चूंकि बौद्ध गुरु से छल किया था इसलिए कुमारिल ने आत्मदाह का निर्णय लिया। प्रयाग में आत्मदाह कर रहे कुमारिल भट्‌ट से शंकर का भेंट करना, उन्हें ब्रह्मसूत्र का अपना भाष्य दिखलाना और उसे देखकर कुमारिल का शंकर से आग्रह करना कि वे मण्डन से शास्त्रार्थ करें, यह भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मोड़ है। कुमारिल ने शंकर को बौद्ध धर्म की दार्शनिक एवं सांगठनिक कमजोरियों से अवगत करवाया।

शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध कहने वाले कम नहीं हैं। शंकर वैदिक धर्म का प्रसार करने निकले थे, किंतु उनका यंत्र, मंत्र और तंत्र औपनिषदिक था। आधुनिक मानस वेद के बजाय उपनिषद की ओर अधिक आकर्षित होता है, हालांकि वेदान्त का मूल तो वेद में ही है। वेद की मूल आस्थाओं पर बुद्ध ने गहरे प्रहार किए थे, किंतु उनकी भी तत्व-मीमांसा औपनिषदिक ही थी। शंकर ने यह भांप लिया था की पूर्व मीमांसा अथवा कर्म-मीमांसा से बात नहीं बनेगी, ज्ञान-मीमांसा की ओर जाना होगा और बौद्धों को उन्हीं के अखाड़े में परास्त करना होगा- यह समझ ही शंकर को इतिहास में महानतम दार्शनिक और सिद्धांतकार की पंक्ति में खड़ा करती है।

जब शंकर कुमारिल के शिष्य मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में परास्त करने को उद्यत होते हैं तो वे यह स्थापित कर रहे होते हैं कि अब कर्मकाण्ड के बजाय ज्ञानमार्ग को महत्व देना होगा। मण्डन कर्मकाण्ड और मीमांसक के तत्कालीन सबसे बड़े सिद्धांतकार थे। शास्त्रार्थ में उनकी पराजय ने उत्तर मीमांसा अथवाअद्वैत-वेदान्त का पथ-प्रशस्त किया। पूर्व-मीमांसा की केंद्रीयता समाप्त हुई और उसका स्थान उत्तर-मीमांसा अथवा वेदांत ने लिया। आगे चलकर अद्वैत के प्रतिकार में रामानुजाचार्य सरीखे द्वैतवादियों के जो आंदोलन सामने आए, वो अपने स्वरूप में भक्तिवादी थे। फलस्वरूप ज्ञान मार्ग की प्रभुता स्थापित नहीं रह सकी और आम जनमानस में भक्ति का प्रभाव ज्यादा व्यापक हुआ। हालांकि भक्ति पहली शताब्दी में दक्षिण के आलवार संतों में प्रकट हो चुकी थी परंतु आम जनमानस में रामानुज ही उसे स्थापित कर सके।

इससे यह हुआ कि द्वेत-अद्वैत-विशिष्टाद्वैत आदि ढेरो डिस्कोर्स खड़े हो गए। महायान, हीनयान और वज्रयान हाशिये में चले गए, और इसके स्थान पर द्वैत-अद्वैत, वेद-उपनिषद्, कर्म-ज्ञान, शैव-वैष्णव, सगुण-निर्गुण के संदर्भों की भारतीय जनमानस में स्थापना हुई। हिंदू धर्म में नयी ऊर्जा की निर्मित हुई। इसी ऊर्जा ने आगे चलकर भारत को इस्लामिक सुनामी और आधुनिक ख्रिस्तानी संस्थाओं के डिज़ाइन में भी हमें बचाए रखा।

आठवीं शताब्दी में भारत का विस्तार आज के अफगानिस्तान से आगे ईरान के कुछ भूभाग तक था।
आदिगुरु शंकराचार्य जी के उन भूभागों तक न पहुंच पाने पर ढेर प्रश्न दिमाग मे आते हैं। पूरे पश्चिमी और उत्तरी पाकिस्तान जिसमे तक्षशिला, पख्तूनिस्तान सहित अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों जैसे आज के तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तिब्बत एवं चीन के कई क्षेत्रों में आठवी शताब्दी तक जनता पूरी तरह से बौद्ध धर्म स्वीकार चुकी थी एवं उनका राज्य स्तर पर काफी गहरा दखल था जैसे अफ़ग़ानिस्तान कि तुर्कशाही (665-850) और मध्य एशिया की तांग डायनेस्टी। शंकर को वहां बलपूर्वक रोका जा सकता था। शंकर शायद यह भांप चुके थी जो क्षेत्र बचाए जा सकते हैं वहां काम किया जाए। अगर उनकी अल्प आयु में दुर्भाग्यशाली मृत्यु नही होती तो वह निश्चित ही बौद्धों की मांद में घुसते जैसे नालंदा। कुमारिल भट्ट का भी नालंदा में हत्या का प्रयास हुआ था परंतु वह जान बचा कर भागने में सफल हुए थे।

आप पाएंगे जहां जहां बौद्ध प्रभाव था वहां लोग तुरंत इस्लाम मे बदल गए बिना प्रतिरोध के। क्योंकि बौद्ध भी इस्लाम की तरह एकेश्वरवादी थे और जाति त्याग चुके थे। बंगाल में भी बौद्धधर्म का बड़ा प्रभाव था। परंतु जहां बौद्ध प्रभाव नहीं था वहां 600 वर्ष का शासन भी काम न आया।

लेखक : आनंद स्वरूप काशिव

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