जम्मू कश्मीर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लेकर क्यों भड़के जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दल

 नीरज कुमार दुबे

परिसीमन आयोग ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सीटों की संख्या में 4 की वृद्धि की है। केंद्र सरकार यदि आयोग की रिपोर्ट को अक्षरशः स्वीकार करते हुए अधिसूचित कर देती है तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 90 हो जाएगी।

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों के नये सिरे से परिसीमन का काम पूरा हो गया है और अब मोदी सरकार के वादे के अनुरूप जल्द ही इस केंद्र शासित प्रदेश में पहले विधानसभा चुनाव कराये जाने का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लेकर बड़ा राजनीतिक बवाल भी खड़ा हो गया है क्योंकि पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए कश्मीर के राजनीतिक दलों ने भी परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया है।

हम आपको बता दें कि उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय परिसीमन आयोग ने दो साल के अपने निर्धारित कार्यकाल में एक कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य पूरा करते हुए कश्मीर क्षेत्र में विधानसभा सीटों की संख्या 47 जबकि जम्मू क्षेत्र में विधानसभा सीटों की संख्या 43 रखने की अनुशंसा की है। आयोग ने जम्मू में छह अतिरिक्त विधानसभा सीटों और कश्मीर में एक अतिरिक्त सीट का प्रस्ताव रखा है। यानि परिसीमन आयोग ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सीटों की संख्या में 4 की वृद्धि की है। केंद्र सरकार यदि आयोग की रिपोर्ट को अक्षरशः स्वीकार करते हुए अधिसूचित कर देती है तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 90 हो जाएगी। फिलहाल इनकी संख्या 86 है जिनमें से 37 सीट जम्मू में जबकि 46 कश्मीर में हैं।

परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में सबसे बड़ी बात क्या है?
परिसीमन आयोग ने एकसमान जनसंख्या अनुपात बनाए रखने के लिए जम्मू क्षेत्र की अधिकांश विधानसभा सीटों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया है और निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या 37 से बढ़ाकर 43 कर दी है। आयोग ने जम्मू में अनुसूचित जाति (SC) को सात और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय को पांच सीटें आरक्षित करके बड़ा प्रतिनिधित्व दिया है। 
विधानसभा की नयी सीटें किन जिलों में हैं?
नयी सीटें छह जिलों- डोडा, किश्तवाड़, सांबा, राजौरी, कठुआ और उधमपुर से बनाई गई हैं। इसके साथ ही डोडा, किश्तवाड़ और सांबा में अब तीन-तीन सीटें, उधमपुर में चार, राजौरी में पांच और कठुआ की छह सीटें हो जाएंगी। किश्तवाड़ जिले को एक विधानसभा सीट पद्देर नागसेनी मिली है। डोडा जिले की नयी सीट डोडा पश्चिम है। जसरोटा कठुआ में नयी सीट है, उधमपुर में रामनगर और सांबा में रामगढ़ नयी सीट है। इसके साथ ही आयोग ने जनता के आक्रोश को देखते हुए जम्मू जिले के सुचेतगढ़ निर्वाचन क्षेत्र को बरकरार रखा है।
किन सीटों पर आरक्षण रहेगा?
परिसीमन आयोग ने पांच सीटें- राजौरी, थानामंडी (राजौरी जिला), सुरनकोट, मेंढर (दोनों पुंछ जिला) और गुलबगढ़ (रियासी)- अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित की हैं। सात सीटें- रामनगर (उधमपुर), कठुआ, रामगढ़ (सांबा), बिश्नाह, सुचेतगढ़, माढ़ और अखनूर (सभी जम्मू) को अनुसूचित जाति समुदाय के लिए आरक्षित किया गया है। देखा जाये तो कुल 90 विधानसभा क्षेत्रों में से नौ को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखा गया है। इन नौ क्षेत्रों में छह जम्मू में और तीन घाटी में हैं।
रिपोर्ट में विशेष सिफारिशें क्या की गयी हैं?
इसके अलावा परिसीमन आयोग ने राजौरी और पुंछ के क्षेत्रों को अनंतनाग संसदीय सीट के तहत किया है। आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा में कम से कम दो सदस्य मनोनीत हों, जिनमें से एक कश्मीरी प्रवासी समुदाय की महिला हो। आयोग ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के विस्थापितों को मनोनयन के जरिए विधानसभा में कुछ प्रतिनिधित्व देने पर विचार करने की भी सरकार से सिफारिश की है।

पाकिस्तान क्यों हुआ आग बबूला?
बहरहाल, परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लेकर आ रही प्रतिक्रियाओं की बात करें तो भाजपा ने जहां इस रिपोर्ट का स्वागत किया है वहीं कश्मीर के राजनीतिक दलों और पाकिस्तान ने इसकी कड़ी आलोचना की है। खास बात यह है कि जो बयान पाकिस्तान दे रहा है एकदम वही बयान कश्मीर के राजनीतिक दल भी दे रहे हैं। हम आपको बता दें कि जिस तरह पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने का विरोध कर रहा है उसी तरह कश्मीर घाटी के राजनीतिक दल भी अनुच्छेद 370 हटाये जाने का विरोध कर रहे हैं। अब परिसीमन आयोग की रिपोर्ट पर पाकिस्तान कह रहा है कि जम्मू-कश्मीर में हिंदू बहुल क्षेत्रों में सीटें जानबूझकर बढ़ायी गयी हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भारत के प्रभारी राजदूत को तलब करके परिसीमन आयोग की रिपोर्ट पर आपत्ति भी दर्ज करा दी है। पाकिस्तान सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए दावा किया है कि भारतीय परिसीमन आयोग का उद्देश्य कश्मीर में मुस्लिमों को नागरिकता से वंचित करना और उन्हें कमजोर करना है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि इस कदम के पीछे भारत सरकार की गुप्त योजना छिपी हुई है क्योंकि विधानसभा क्षेत्रों का निर्धारण इस तरीके से किया गया है ताकि मुस्लिमों की बढ़त को कम किया जा सके। इसके साथ ही पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत इस प्रयास के जरिये 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 हटाये जाने के अपने फैसले को वैधानिक आधार देना चाह रहा है। यही नहीं पाकिस्तान भारतीय परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कश्मीर के राजनीतिक दलों के बयान का भी हवाला दे रहा है।
क्या कह रहे हैं कश्मीरी राजनीतिक दल?
आइये अब आपको बताते हैं कि कश्मीरी नेताओं ने ऐसा क्या है जिसको आधार बनाकर पाकिस्तान भारतीय परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर रहा है। सबसे पहले बात करते हैं नेशनल कॉन्फ्रेंस की। फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की इस फैमिली पार्टी ने कहा है कि वह जम्मू-कश्मीर में हर विधानसभा क्षेत्र पर परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के असर का अध्ययन कर रही है। पार्टी ने यह भी कहा कि जब भी केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव होंगे, मतदाता भारतीय जनता पार्टी और उसके छद्म चेहरों को सजा देंगे।
उधर, कश्मीर में पाकिस्तान परस्त और आतंकवादियों की हमदर्द नेता की छवि रखने वाली महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कहा है कि आयोग की रिपोर्ट ने परिसीमन की कवायद शुरू किये जाते समय जताये गये हमारे डर को सच साबित कर दिया है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सवाल पूछे जाने पर कहा है कि किस परिसीमन की बात कर रहे हैं आप? उस परिसीमन आयोग की, जो भाजपा की विस्तार इकाई बन गया है? महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि परिसीमन आयोग ने जनसंख्या के बुनियादी मानदंड की अनदेखी की है और उनकी इच्छाओं के विपरीत क्षेत्रों को जोड़ा या घटाया है। उन्होंने कहा कि हम इसे खारिज करते हैं, हमें इसमें कोई भरोसा नहीं है।

दूसरी ओर गुपकार गठबंधन से अलग हो चुके सज्जाद गनी लोन की पीपल्स कॉन्फ्रेंस ने इस मामले पर नेशनल कॉन्फ्रेंस पर ठीकरा फोड़ते हुए आरोप लगाया है कि परिसीमन आयोग के विचार-विमर्श में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसदों ने भाग लिया था और इस तरह उसने परिसीमन की कवायद को अपनी स्वीकृति दी। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने कहा है कि बीते छह दशक में जम्मू-कश्मीर विधानसभा की सीटों में कश्मीर की हिस्सेदारी 43 से बढ़ाकर 47 कर दी गई जबकि जम्मू का प्रतिनिधित्व 30 से बढ़कर 43 हो गया। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने पूछा है कि 1947 के बाद से कश्मीरी लोगों के अधिकारों को सुनियोजित तरीके से छीनने के लिए कौन जिम्मेदार है।
वहीं माकपा नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने परिसीमन आयोग के गठन पर ही सवाल उठाते हुए कहा है कि इसका गठन परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत किया गया, लेकिन उसने केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं का पुन: सीमांकन जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अनुरूप किया है जिसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी है। वहीं कांग्रेस वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज ने कहा कि रिपोर्ट पर सरसरी नजर डालें तो इसके ‘अत्यंत नकारात्मक’ पहलू दिखाई देते हैं, जिसे जम्मू-कश्मीर की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।
बहरहाल, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से इतर हम आपको बता दें कि परिसीमन आयोग का गठन मार्च 2020 में किया गया था। आयोग को 2011 की जनगणना के आधार पर जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन का काम सौंपा गया था। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 53.72 लाख और कश्मीर क्षेत्र की 68.83 लाख है। उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व वाले आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा और जम्मू-कश्मीर के राज्य चुनाव आयुक्त के.के शर्मा पदेन सदस्य हैं। आयोग के सदस्यों द्वारा अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद एक राजपत्रित अधिसूचना जारी कर दी गयी है

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