-महात्मा हंसराज की 158वी जयन्ती 19 अप्रैल पर- “देश, धर्म और संस्कृति को समर्पित जीवनदानी महात्मा हंसराज”

ओ३म्

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लगभग 5,100 वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध की समाप्ति से देश का पतन आरम्भ हुआ व लगातार चलता रहा। इस प्रकार चलते चलते उन्नीसवीं शताब्दी का सन् 1825 आ गया जब गुजरात प्रदेश के मोरवी राज्य के टंकारा नामक ग्राम में पं. करषन जी तिवारी के यहां 12 फरवरी को एक विलक्षण बालक मूलशंकर का जन्म हुआ जो ईश्वर, वेद, देश, धर्मप्रेम सहित निर्भीकता और विशेष तर्कणा शक्ति को लेकर जन्मे थे। उनके समय में समाज धार्मिक अन्धविश्वासों सहित अनेक सामाजिक कुप्रथाओं आदि से ग्रस्त था। ईश्वर के सच्चे स्वरूप, उसकी उपासना व भक्ति की सच्ची यथार्थ वैदिक पद्धति को भुला दिया गया था और उसका स्थान अनेकानेक आडम्बरों से युक्त मूर्तिपूजा व अनेक प्रकार के मिथ्याचारों ने ले लिया था। ऋषि दयानन्द ने सन् 1860 में वेद प्रचार का, जो यथार्थ धर्म प्रचार का पर्याय है, उसका आगरा से शुभारम्भ किया था। वह देश के अनेक भागों में घूमें, वेद प्रचार किया, विरोधी मत वालों से शास्त्रार्थ, वार्तालाप व शंका समाधान आदि भी किये। ऋषि दयानन्द ने सन् 1875 में मुम्बई नगरी में आर्यसमाज नाम से वेद प्रचार का एक अपूर्व संगठन बनाया। पंजाब में भी इस सगठन का गहरा प्रभाव था। शिक्षित व अशिक्षित सभी लोग इसे उत्साहपूर्वक अपना रहे थे। महात्मा हंसराज जी उन दिनों लाहौर में पढ़ते थे। महान मनीषी पं. गुरुदत्त विद्यार्थी और देशभक्त लाला लाजपतराय जी गवर्नमेन्ट कालेज, लाहौर में उनके सहपाठी थे। आप तीनों मित्र आर्यसमाज लाहौर जाते थे और उसकी गतिविधियों में सक्रिय भाग लेते थे। आप तीनों मित्रों पर ऋषि दयानन्द, आर्यसमाज और इनकी वैदिक विचारधारा का गहरा रंग चढ़ा। तीनों मित्रों ने अपना समस्त जीवन निःस्वार्थ भाव से आर्यसमाज व ऋषि दयानन्द जी के शिक्षा संबंधी विचारों को देश के जन-जन में प्रचार को अपना मिशन बना लिया और उसे सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। हंसराज जी ने जिस संस्था को अपना जीवन समर्पित किया वह आर्यसमाज के विचारों से प्रभावित उसकी शिक्षा प्रचार की शाखा डी.ए.वी. स्कूल वा कालेज थी जिसकी बिना वेतन लिए आजीवन सेवा करने की भीष्म प्रतिज्ञा आपने की और अपने पूरे जीवन उसे सफलता पूर्वक निभाया। इस भीष्म प्रतिज्ञा को करके आपने अपनी समकालीन व भावी पीढ़ियों के लिए एक अनोखी मिसाल प्रस्तुत की जिसका पालन विरले मनुष्य ही कर सकते हैं। आपने एक त्यागी, तपस्वी, योगी व देश-समाज-भक्त आदर्श व्यक्ति का जीवन व्यतीत किया। युग-युगान्तरों तक आपके जीवन से देशवासी प्रेरणा ग्रहण कर अपने मनुष्य जीवन को सफल करने के साथ यश एवं कीर्ति भी अर्जित कर सकते हैं।

महात्मा हंसराज जी ने दयानन्द ऐंग्लो वैदिक स्कूल की स्थापना व संचालन के लिए अपने जीवन का जो दान किया, उसी कारण वह महात्मा कहे जाते हैं। उनका जीवन भी अनेक बड़ें बड़े महात्माओं से कहीं उच्च व आदर्श था। एक दीपक के समान वह सारे जीवन आर्थिक अभावों में तप व कष्टों से युक्त जीवनयापन करते रहे और सहस्रों जीवनों को अपने ज्ञान की ज्योति से प्रदीप्त कर उन्हें देश व समाज के लिए उपयोगी बनाया। विद्या एवं शारीरिक बल आदि अनेक क्षमताओं से युक्त होने पर भी महात्मा जी ने कभी अपना एक निजी मकान तक नहीं बनाया, न कभी कोई वाहन ही खरीदा, साधारण भोजन व साधारण वस्त्रों में रहे और ऋषि दयानन्द मिशन व उनके वैदिक सिद्धान्तों का पालन करते रहे। आपके संकल्प व डीएवी संस्था के लिए जीवन दान से आप जिस अर्थाभाव से गुजरे वह आपने अकेले नहीं अपितु आपके परिवार के सभी सदस्यों को उसे सहन करना पड़ा। महात्मा जी सरकारी शिक्षण संस्थाओ में पढ़े व योग्य बने। आर्यसमाज ने उन पर कोई घन व साधन व्यय नहीं किेये थे। दूसरी ओर हम अपने आज के गुरुकुलों को देखते हैं जिन्होंने आज सरकारी विद्यालयों जैसा वातावरण धारण कर लिया है। गुरुकुल दान से चलते हैं, किसी की आर्थिक स्थिति अच्छी व किसी की कम होती है। यदि हमारे वर्तमान गुरुकुलों में कोई विद्यार्थी योग्य बन भी जाये तो फिर वह लेक्चरार या प्रोफेसर बनना अधिक पसन्द करता है। आर्यसमाज के कार्य की सभी को प्रायः उपेक्षा करते ही देखा है। महात्मा हंसराज जी ने जिस परम्परा का शुभारम्भ व निर्वाह किया था, उन जैसा आज एक भी जीवन कहां हैं? हां, कुछ नाम दृष्टि पटल पर अवश्य उभरते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, प. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि की श्रृंखला में पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, पं. युधिष्ठिर मीमांसक, आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, आचार्य विजयपाल जी आदि कुछ नाम हैं जिनका जीवन भी आदर्श एवं गौरवपूर्ण रहा है। ऐसे अनेक और भी नाम हैं परन्तु अब यह श्रृंखला कमजोर पड़ रही है। जिन नामों का उल्लेख किया है, उन ऋषि भक्तों का जीवन भी त्याग व तपस्यापूर्ण जीवन था और इन्होंने भी वेदसेवा व समाजसेवा के प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। प्रत्येक ऋषिभक्त को ऋषि जीवन और महात्मा हंसराज जी के जीवन से प्रेरणा ग्रहण कर उनका अनुसरण करना चाहिये। इससे न केवल इस जन्म व भावी जीवन में हमें लाभ होगा अपितु इससे हम देव (ईश्वर) ऋण, ऋषि ऋण, वेद ऋण आदि से उऋ़ण भी होंगे।

महात्मा जी का जन्म 19 अप्रैल, सन् 1864 को बजवाड़ा ग्राम जिला होशियारपुर में लाला चुनीलाल जी के यहां हुआ था। 15 वर्ष की आयु में आर्यसमाज लाहौर के प्रधान लाला साईंदास के सत्संग से आप पर आर्यसमाज का रंग चढ़ा। सन् 1880 में आपने मिशन स्कूल, लाहौर से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बी.ए. की परीक्षा आपने सन् 1885 में लाहौर के गवर्नमेन्ट कालेज से उत्तीर्ण की थी। आप पंजाब विश्वविद्यालय में इस परीक्षा में द्वितीय रहे थे। यह भी जानने योग्य है कि उन दिनों पंजाब में पूरा पाकिस्तान व दिल्ली तक के प्रदेश सम्मिलित थे। दिनांक 30 अक्तूतबर, 1883 को अजमेर में ऋषि दयानन्द का बलिदान हुआ था। उनकी स्मृति में पंजाब के आर्यनेताओं ने उनका एक स्मारक बनाने का निश्चय किया जिसका स्वरूप ऐसा था कि जहां प्राचीन व अर्वाचीन शिक्षा का देश के बालकों को अध्ययन कराना था। आपने इस योजना के लिए 27 फरवरी, सन् 1886 को डीएवी शिक्षा आन्दोलन के आरम्भ के दिनों में संस्था से बिना वेतन लिए आजीवन अपनी सेवायें देने की सार्वजनिक घोषणा की थी। एक प्रकार से आपने अपना जीवन ही दयानन्द स्कूल व कालेज को दान कर दिया था। आप 1 जून, 1886 को डी.ए.वी. स्कूल के मुख्याध्यापक बनेे। सन् 1891 में आर्य प्रतिनिधि सभा तथा सन् 1893 में आप आर्य प्रादेशिक सभा के प्रधान बने। आपका हृदय देश व समाज सेवा की भावनाओं से भरा हुआ था। आपके समय में जब भी कहीं भूकम्प, दुष्काल, बाढ़, दंगे व महामारी आदि का प्रकोप हुआ तो आप पीड़ितों की सहायता के लिए पहुंचते थे अथवा अपने मित्रों व सहयोगियों के दल वहां पीड़ितों की सेवा करने भेजते थे। सन् 1911 में आप मात्र 47 वर्ष के थे। आपने स्कूल के प्राचार्य पद से त्याग पत्र दे दिया जबकि कालेज कमेटी ने आपको त्याग पत्र न देने व उसे वापिस लेने की प्रार्थना की थी। यह भी बता दें इन दिनों डी.ए.वी. कालेज उन्नति के शिखर पर था, ऐसे में त्याग पत्र देना सबको हैरानी में डालने वाला था। सन् 1913 में आप कालेज कमेटी के प्रधान चुने गये थे। आपकी पत्नी माता ठाकुर देवी जी का सन् 1914 में देहान्त हुआ। सन् 1918 में आप पंजाब शिक्षा सम्मेलन के अध्यक्ष बनाये गये थे। इससे यह सहज अनुमान होता है कि आप उस समय के प्रमुख शिक्षा शास्त्रियों में एक थे। स्वामी श्रद्धानन्द जी के कार्यों में भी आपने सहयोग किया। सन् 1923 में स्वामी श्रद्धानन्द जी ने मथुरा, आगरा व उसके निकटवर्ती स्थानों के मलकान राजपूतों की शुद्धि की थी। इस कार्य में महात्मा हंसराज जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी को अपना सक्रिय सहयोग दिया। इसके अगले वर्ष सन् 1924 में आप अखिल भारतीय शुद्धि सभा के प्रधान बने। आर्यसमाज ने सन् 1927 में अपना प्रथम आर्य महासम्मेलन आयोजित किया जिसका प्रधान आपको ही बनाया गया। सन् 1937 में आपने आर्य प्रादेशिक सभा के प्रधान पद से त्याग पत्र दे दिया था। 15 नवम्बर, 1938 को लाहौर में आपका देहान्त हुआ। पाठकों के लाभार्थ हमने महात्मा जी की संक्षिप्त जीवनयात्रा को प्रस्तुत किया है। इससे ज्ञात होता है कि महात्मा जी ने डीएवी स्कूल के मुख्याध्यापक से कार्य आरम्भ किया, डीएवी स्कूल व कालेज निरन्तर प्रगति करते रहे, महात्मा जी कालेज के प्राचार्य बने और 47 वर्ष की आयु में 25 वर्षों तक अपनी निःशुल्क सेवायें देने के बाद स्वेच्छा से पद का त्याग कर दिया। आप डीएवी विद्यालय के संगठनों की प्रशासनिक संस्था आर्य प्रादेशिक सभा के प्रधान रहे और आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के भी प्रधान रहे। आपने समय समय पर भूकम्प, बाढ़, आपदा, महामारियों जैसे कठिन अवसरों पर पीड़ितों की प्रशंसनीय सेवा भी की व कराई। शुद्धि आन्दोलन में भी आपने स्वामी श्रद्धानन्द जी को सहयोग दिया। आपका जीवन युगों युगों तक देश के लोगों व विद्यार्थियों को प्रेरणा देता रहेगा और आपके जीवन व कार्यों को पढ़कर, जानकर व सुनकर लोग मानसिक रूप से आपको अपना मानस पिता, मार्गदर्शन व प्रणेता स्वीकार करने सहित आपके अनुरूप श्रेष्ठ कार्यों को करने की प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे।

महात्मा हंसराज जी ऋषि दयानन्द, आर्यसमाज, वेद एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन व संगति की देन थे। आपने जो पढ़ा, जाना व समझा, उसे अपने जीवन का अंग बनाया। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व सत्य ज्ञान की खोज में अपने माता-पिता, परिवार, घर व धन-सम्पत्ति का त्याग कर देश के ऐसे सभी स्थानों पर गये थे जहां उन्हें किसी विद्वान का सत्संग मिल सकता है और जो उनकी शंकाओं का समाधान कर सकता था। अन्ततः ऋषि दयानन्द को ज्ञानरूपी अमृत प्राप्त हुआ था। आपने उस अमृत का पान कर अपने जीवन को देश व समाज के लिए समर्पित किया जिसका परिणाम देश से अज्ञान व अन्धविश्वासों को मिटाने में आपको उल्लेखनीय सफलता मिली और इतिहास में आपका अक्षुण स्थान बना। शहीद भगत सिंह जैसे अनेक क्रान्तिकारी युवक डी.ए.वी. कालेज की ही देन थे। महात्मा जी के बड़े भाई का उनके जीवनदान के व्रत को निभाने में सर्वाधिक योगदान है। हमें समय समय पर उनको भी याद करना चाहिये। वह पोस्ट आफीस में काम करते थे और महात्मा जी की लगन को देखकर उन्होंने जीवनभर अपना आधा वेतन महात्मा जी को उनके परिवार के निर्वाहार्थ प्रदान किया था। अपना जीवन वह आधे वेतन में निर्वाह करते रहे। इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना असम्भव है। इसे पढ़कर तो राम व लक्ष्मण जी की स्मृति होती है। वस्तुतः यह दोनों भाई राम व कृष्ण के समान ही थे। यह भी बता दें कि आर्य विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने महात्मा जी का जीवन चरित एवं उनके लेख व विचारों का संग्रह तैयार कर उसे ‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली’ से अप्रैल, 1986 में चार खण्डों में प्रकाशित किया था।

महात्मा जी का जीवन बहुआयामी जीवन था। एक लेख में उनके सभी गुणों को समाविष्ट नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो पाठकों को महात्मा हंसराज ग्रन्थावली का अध्ययन करना ही समीचीन है। 19 अप्रैल, 2022 को उनके 158 वें जन्म दिन पर उनकी ग्रन्थावली का स्वाध्याय ही उनको सबसे अच्छी श्रद्धांजलि हो सकती है। ऐसा करके हम महात्मा जी के समग्र जीवन की एक झलकी प्राप्त करने के साथ कर्तव्य बोध को पा सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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