ईश्वर उपासना क्यों और कैसे ?* …………………

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ईश्वर उपासना का अधिकारी बनने के लिए आवश्यक है कि सब प्रकार के छल कपट, द्वेष, अन्याय, पाखंड, अन्धविश्वास, पशुबलि, पाषाण पूजा, ऊंच-नीच, जात-पात आदि से मुक्त हुआ जाए । जात-पात व ऊंच नीच पर परशुराम और श्रवण कुमार का संवाद प्रेरणादायक है- श्रवणकुमार, ऋषि परशुराम को अपना परिचय देते हुए उन्हें बताते हैं कि ‘मैं एक वैश्य ऋषि और एक छोटी जाति की माता की संतान हूँ” इस पर ऋषि परशुराम उनको धिक्कारते हुए कहते हैं- ”तुम्हें अपनी माता को छोटी जाति का कहते हुए शर्म नहीं आती ! माता तो माता होती है,जो पूजनीय होती है,व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है,जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं,संस्कार व्यक्ति को बड़ा बनाता है,वायु और सूरज सभी को समान रूप से अपनी हवा और प्रकाश देते हैं, इसलिए दोनों महान हैं । जन्मना जायते शूद्रः,संस्कारात् भवेत द्विजः , वेद-पाठात् भवेत विप्रः ब्रह्म, जानातीति ब्राह्मणः”  जातिगत संकीर्णता और वैमनस्यता के दावानल में जलने वाले ईश्वर की उपासना में कभी सफल नहीं हो सकते ।
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अकामो धीरोअमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः। तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरंयुवानम्॥
     -अथर्ववेद १०\८\४४

हे मनुष्यो, जो मुझ कामना रहित ,धीर , अविनाशी , स्वयंभू , आनन्दघन , न्यूनताओं से रहित, धीर , अजर , नित्यनूतन  सर्वव्यापक को उपासना के द्वारा जान लेता है वह जन्म मरण के बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।
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उक्षा महाँ अभि ववक्ष एने अजरस्तस्थावितऊतिर्ऋष्वः।
उर्व्याः पदो नि दधाति सानौ रिहन्त्यूधो अरुषासो अस्य॥
( ऋग्वेद १-१४६-२)

हे मनुष्यो, सूर्य जो पृथ्वी और अन्य ग्रहों से बहुत विशाल है ,समस्त सौरमंडल को धारण किए हुए है, अपने सौर परिवार को संरक्षण और निरंतर स्थापित किए हुए है, उसकी किरणें वर्षाजल का कारण बनती हैं, सभी को प्रकाशित करती हैं, बिना किसी भेदभाव के सबको जीवन देती हैं, सबका उपकार करती हैं, सूर्य जैसा व्यवहार आप सबका भी हो।
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ईश्वर की उपासना क्यों करें ?
१. ईश्वर के उपकारों का धन्यवाद देने के लिए।
२.मन इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने के लिए।
३. बुरे संस्कार नष्ट करने के लिए।
४. अच्छे संस्कार उत्पन्न करने लिए।
५. निष्काम कर्म करने के लिए।
६. वेदानुकूल आचरण करने के लिए।
७. ईश्वर के प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए।
८. ज्ञान,बल व आन्न्द पाने के लिए।
९. सहनशीलता,सन्तोष पाने के लिए।
१०.प्राणियों से प्रेमभाव बनाने के लिए।
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क्या मूर्तियों की पूजा भी ईश्वर की उपासना है ?

जी नहीं, बिल्कुल नहीं, यह सब आडम्बर तो उपासना में बाधक हैं।सृष्टि के आदि में ईश्वर प्रदत्त वेद में एक निराकार ईश्वर की उपासना का ही विधान है । चारों वेदों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जो मूर्ति पूजा का पक्षधर हो ।महर्षि दयानन्द के शब्दों में ”मूर्त्ति पूजा एक गहरी खाई है जिसमें जो एक बार पड़ जाता है निकलना बहुत कठिन हो जाता है, मूर्ति-पूजा वैसे ही है जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।”

स पर्यगाच्छुक्रमकायमवर्णमस्नाविरँ शुद्धम् अपापविद्धम् कविर्मनीषी परिभू:स्वयंभूर्याथातथ्यतोअर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:||-(यजुर्वेद ४०.८ ) वह परमात्मा सर्वव्यापक, काया रहित, रंग रुप रहित, नस नाड़ियों के बंधन में न आने वाला, शुद्ध, पवित्र, सर्वज्ञ, स्वयंभू, पाप रहित,छिद्ररहित है, उसी ने इस अद्भुत सृष्टि की रचना की है, उसी ने सब जीवों के कल्याण के लिए सब पदार्थों व वेदों को प्रगट किया है ।

न तस्य प्रतिमा ऽ अस्ति यस्य नाम महद्यश: । हिरण्यगर्भ ऽ इत्येष मा मा हि सादित्येषा यस्मान्न जात ऽ इत्येष ॥(यजुर्वेद , अध्याय ३२ , मंत्र ३)
महान यश वाले उस ईश्वर की कोई उपमा, प्रतिमा, नाप ,तोल,आकार वा मूर्त्ति नहीं। उस सर्वव्यापक निराकार ने ही सम्पूर्ण सृष्टि को धारण किया हुआ है ।

वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम-यजुर्वेद32.8
अर्थात् विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है ।

अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते । ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।।
(यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 )
अर्थात जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं, वे  घोर अंधकार वा दु:ख को प्राप्त होते हैं ।

वेदों के प्रमाण देने के बाद किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं ।परंतु आदि शंकराचार्य ,आचार्य चाणक्य व महर्षि दयानन्द जैसे महान विद्वानों ने भी इसकी निन्दा की है। कबीर व नानक जी ने भी इसका निन्दा की है ।बाल्मीकि रामायण में  राम ने शिवलिंग की पूजा नहीं की थी । वैदिक मंत्रों द्वारा संध्या  हवन-यज्ञ करके सच्चे शिव की  उपासना की थी । रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना श्रीराम ने नहीं दक्षिण के एक राजा ने की थी।

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ (केनोपनिषद) अर्थात जो आंख से नहीं दीख पड़ता और जिस से सब आंखें देखती है उसी को तू ब्रह्म जान और उसी की उपासना कर । और जो उस से भिन्न सूर्य ,विद्युत और अग्नि आदि जड़ पदार्थ है उन की उपासना मत कर ।

‘अधमा प्रतिमा पूजा’ अर्थात् मूर्तिपूजा सबसे निकृष्ट है । यष्यात्म बुद्धि कुणपेत्रिधातुके । स्वधि … स: एव गोखर: ॥ ( श्री मद् भागवत दशम् स्कन्ध अ.८३) अर्थात् जो लोग धातु, पत्थर,मिट्टी आदि की मूर्तियों में परमात्मा को पाने का विश्वास तथा जल वाले स्थानों को तीर्थ समझते हैं । वे सभी मनुष्यों में बैलों का चारा ढोने वाले गधे के समान हैं ।

जो जन परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य की उपासना करता है वह विद्वानों की दृष्टि में पशु ही है।
(शतपथ ब्राह्मण14/4/2/22)
              
या वेदबाह्या: स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टय: । सर्वास्ता निष्फला: प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ता: स्मृता: ॥
(- मनु० अ० १२)
पशु बलि, पाषाण पूजा ,अवतारवाद आदि को बढ़ावा देने वाले वेद विरुद्ध ग्रंथ दुष्ट व स्वार्थी पुरुषों के बनाए हुए हैं, ये सब संसार को दु:खसागर में डुबोने वाले हैं।

प्रतिमा स्वअल्पबुद्धिनाम-
चाणक्य नीति अध्याय 4 श्लोक 19
अर्थात् मूर्ति-पूजा मूर्खो के लिए है । मूर्ति-पूजा कोई सीढी या माध्यम नहीं बल्कि एक गहरी खाई है। जिसमें गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है। जो पुन: उस खाई से निकल नहीं सकता–
( दयानन्द सरस्वती स.प्र. समु. 11)

वेदों में मूर्तिपूजा निषिद्ध है अर्थात् जो मूर्ति पूजता है वह वेदों को नहीं मानता । तथा “ नास्तिको वेद निन्दक: ” अर्थात् मूर्ति-पूजक नास्तिक हैं । कुछ लोग कहते है भावना में भगवान होते है । यदि ऐसा है तो मिट्टी में चीनी की भावना करके खाये तो क्या मिट्टी में मिठास का स्वाद मिलेगा ?

सत्यार्थप्रकाश जैसे आर्ष ग्रन्थों के स्वाध्याय के बिना इन पाखंडों से छुटकारा नहीं मिल सकता ।  एक पक्षी को भी पता होता है कि कोई मूरत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है, वह किसी मनुष्य की मूर्ति पर पेशाब कर देता है, बीट कर देता है उससे डरता नहीं है । कोई मूर्ति का शेर हमें खा नहीं सकता । कोई मूर्ति का कुत्ता काट नहीं सकता तो मनुष्य की मूर्ति मनोकामना कैसे पूरी करती है ? ।  रूढ़िवाद, धर्मांधता , सांप्रदायिकता , पाप , दुराचार व समस्त बुराइयों का मूल कारण यह वेद-विरुद्ध कर्म पाषाण-पूजा ही है। मूर्ति-पूजा के पक्ष में जो लोग थोथी दलीलें देते है वे स्वार्थी अज्ञानी व नास्तिक हैं,  अनीति के पक्षधर व मानवता के कट्टर दुश्मन है । जिस प्रकार उल्लू को दिन पसंद नहीं होता , चोरों को उजेली रात पसंद  नहीं होती। इसी प्रकार स्वार्थियों को मूर्ति-पूजा का खंडन पसंद नहीं होता और वह उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैंं,कभी कभी तो मार भी डालते हैं ।
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ईश्वर की उपासना कैसे करें ?

ईश्वर उपासना की सर्वोत्तम विधि है- अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वर में प्रणिधान आदि यम नियमों का पालन करना और ध्यान मुद्रा में बैठ कर ओम् का अर्थ सहित जप करना (ओम् का अर्थ है- अनंत ज्ञान बल व आन्न्द से युक्त एक दिव्य चेतन पदार्थ जिसने आकाशगंगाओं की रचना की है) इसके लिए किसी मन्दिर मस्जिद चर्च व आडम्बर की आवश्यकता नहीं।
ओम् क्रतो स्मर- यजुर्वेद 40.15
तस्य वाचक: प्रणव: -योगदर्शन 1.27
तज्जपस्तदर्थभावनम्-योगदर्शन 1.28
तत: प्रत्येक्चेतनाधिगमोsप्यन्तरायाभाश्च
-योगदर्शन 1.29
वेद के इस मंत्र व योगदर्शन के इन चार सूत्रों का यही उपदेश है कि ईश्वर के सर्वोत्तम ओम् नाम का जप करो । इसका अर्थ सहित जप करने से आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार होता है और समस्त रोगादि विघ्नों का नाश होता है ।

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