भारत और चीन के लिए बिम्सटेक के मायने

अभिनय आकाश

भारत ने शुरू से ही इस संगठन को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। बिम्सटेक दक्षिण एशिया दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के बीच एक सेतु की तरह काम करता है। म्यांमार और थाइलैंड भारत को दक्षिण पूर्वी एशिया से जोड़ने के लिहाज से बेहद अहम है।

यूक्रेन रूस संघर्ष की वजह से वैश्विक कूटनीति में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है। दक्षिण एशिया में भी चीन की सक्रियता काफी बढ़ने लगी है। वहीं अपने पड़ोसी देशों को साधने में भारत की कोशिशें परवान चढ़ती नजर आ रही है। वैसे कहा भी जाता है कि अगर आप अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं तो यकीन मानिए आपके पड़ोसियों का प्रगतिशील, सहयोगी और साझा विचार का होना बेहद जरूरी है। जो आप के विकास में बाधा न बनकर आपसी सहयोग के जरिए विकास की इबारत लिखने में सहयोग दें। यही बात देशों पर भी लागू होते हैं। यही वजह है कि भारत हमेशा क्षेत्रीय सहयोग, पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध और विकास उन्मुख होने के बाद लगातार करता रहा है। क्षेत्रीय सहयोग परस्पर विकास को मंच प्रदान करने के लिए सार्क ब्रिक्स, क्वाड, आसियान और बिम्सटेक जैसे कई मंचों ने आकार लिया। आज हम बात करेंगे बिम्सटेक की। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में 30 मार्च को बिम्सटेक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया है। यह वर्तमान वैश्विक हालातों के मद्देनजर कई मायनों में अहम है। बिम्सटेक क्या है? इसका इतिहास क्या है? सार्क से यह किस तरह से अलग है? इसके साथ ही सबसे अहम बात भारत के लिए बिम्सटेक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

बिम्सटेक यानी बे ऑफ बंगाल इनिसिएटिव फॉर मल्टीसेक्टोरल टेक्निकल एंड इकनोमिक कॉरपोरेशन दक्षिण एशिया दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग संगठन है। बिम्सटेक की स्थापना 6 जून 1997 को बैंकाक में हुई थी। आर्थिक और तकनीकी सहयोग के लिए बनाए गए संगठन में भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, भूटान और थाईलैंड शामिल है। दुनिया की आबादी का 22% देशों में ही रहती है। साथी देशों की कुल जीडीपी 2.8 ट्रिलियन डॉलर है। बिम्सटेक देश के आर्थिक और रणनीतिक रूप में काफी अहम है। 2014 तक ये एक लो-प्रोफाइल और उतनी गंभीरता से लिए जाने वाले उप-क्षेत्रीय समूह में था। लेकिन जैसे ही सार्क सहयोग की उम्मीदें फीकी पड़ गईं, भारत ने एक साहसिक पहल की जिसने छोटे समूहों को महत्वाकांक्षा विकसित करने में मदद की। बिम्सटेक के नेताओं को गहन चिंतन के लिए एक ऐतिहासिक रिट्रीट में आमंत्रित किया गया था; उन्होंने ब्रिक्स नेताओं के साथ भी बातचीत की। यह अक्टूबर 2016 में गोवा में था। दो साल बाद, बिम्सटेक ने खुद को एक गतिशील क्षेत्रीय समूह के रूप में पेश किया। इन सभी देशों ने 2012 से 2016 के बीच अपनी औसत आर्थिक वार्षिक वृद्धि दर 3.4 से 7.5 फ़ीसदी के बीच में बनाए रखा। 7 देशों का ये संगठन मूल रूप से एक सहयोगात्मक संगठन है जो व्यापार ऊर्जा पर्यटन मत्स्य पालन परिवहन और प्रौद्योगिकी को आधार बनाकर शुरू किया गया था। लेकिन बाद में इसे कृषि गरीबी उन्मूलन आतंकवाद संस्कृति जनसंपर्क सार्वजनिक स्वास्थ्य पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया गया बिम्सटेक का मुख्यालय ढाका में बनाया गया है। समुद्र के रास्ते पूरी दुनिया में होने वाले व्यापार का एक चौथाई हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुजरता है।

भारत ने शुरू से ही इस संगठन को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। बिम्सटेक दक्षिण एशिया दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के बीच एक सेतु की तरह काम करता है। म्यांमार और थाइलैंड भारत को दक्षिण पूर्वी एशिया से जोड़ने के लिहाज से बेहद अहम है। इससे भारत के व्यापार को न केवल बढ़ावा मिलेगा। बल्कि भारत और म्यांमार के बीच हाइवे का प्रोजेक्ट पूर्व एशिया नीति को मजबूती प्रदान करेगा। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को सफल बनाना है तो बिम्सटेक को भी सफल बनाना होगा। बेय ऑफ बंगाल के जितने भी तटीय देश हैं उनके साथ मेल जोल बढ़ेगा। भारत का लगभग 50 प्रतिशत ट्रेड ईस्ट को जाता है। एशिया ही ऐसी जगह है जहां पर तरक्की हो रही है और ग्रोथ ज्यादा है। पाकिस्तान की नकारात्मक भूमिका के चलते भी भारत के लिए बिम्सटेक काफी महत्वपूर्ण है। बिम्सटेक देशों में मजबूत संबंध भारत को अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को गति प्रदान कर सकता है।

अगले कुछ दिनों के दौरान पड़ोसी देशों के साथ भारत के संपर्क अभियान पर गौर करें तो पता चलेगा कि पड़ोसियों को साधने की कोशिशों पर काफी तेजी से काम हो रहा है। जयशंकर मालदीव के बाद श्रीलंका की यात्रा पर गए। जहां वो बिम्सटेक की तैयारियों में ही तीन दिन गुजारेंगे। 29 मार्च को बिम्सटेक देशों के विदेश मंत्रियों और 30 मार्च को सरकारों के प्रमुखों की शिखर वार्ता होगी। इसके अगले ही दिन नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा भारत के दौरे पर आने वाले हैं। जुलाई 2021 में सत्ता संभालने के बाद देउबा की ये पहली आधिकारिक यात्रा होगी। इससे पहले साल 2017 में पीएम रहते हुए वे भारत के दौरे पर आए थे। अमेरिकी बिल को नेपाल की मंजूरी के बाद चीन की तरफ से उस पर लगातार दवाब बनाया जा रहा है। वहीं चीन के विदेश मंत्री वांग यी नेपाल के दौरे पर भी हैं।
अपने खिलाफ हो रही गोलबंदी से डरा ड्रैगन डैमेज कंट्रोल में लगा
19 मार्च को जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा और 21 मार्च को ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के साथ भारतीय प्रधानमंत्री की शिखर बैठक के बाद 24 मार्च को चीनी विदेश मंत्री वांग यी भारत दौरे पर आए। एक तरफ जहां जापान और ऑस्टेलिया ने यूक्रेन-रूस के मुद्दे पर भारत के स्टैंड पर अपनी आंखें मूंदे रखी और इसे एक तरह से नजरअंदाज किया ताकि चार देशों के हिंद प्रशांतीय संगठन क्वाड में कोई फूट न पड़े। वहीं चीन भी अब खुद के खिलाफ हो रहे गोलबंदी से डैमेड कंट्रोल में जुट गया है। चीन की कोशिश है कि पेइचिंग में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी की मौजूदगी भी हो। पीएम मोदी के वैश्विक कद के लिहाज से उनका बिक्स समम्मेलन से दूरी बनाना इस संगठन की चमक को फीका कर देगा। जिस तरह से भारत के बिना क्वाड की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह भारत के बिना ब्रिक्स की भी कोई कल्पना नहीं हो सकती। चीन ने भारत के साथ अपने रिश्तों को पटरी पर लाने और आला नेताओं के एक-दूसरे के यहां आने जाने का जो प्रस्ताव दिया है उसकी टाइमिंग के मद्देनजर उसे क्वाड को कमजोर करने की एक कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन इन सब से इतर भारत की तरफ से क्वाड शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी के शामिल होने की हामी पहले से ही भर दी गई है। लेकिन वांग यी को भारत की तरफ से कोई आश्वासन नहीं दिया गया है।

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