natvarडॉ0 वेद प्रताप वैदिक

पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवरसिंह की पुस्तक ‘वन लाइफ इज़ नॉट इनफ’ ने प्रकाशित होने के पहले ही धमाके करना शुरु कर दिया है। संजय बारु ने सोनिया-मनमोहन संबंधों पर जो प्रकाश डाला था, उससे कहीं ज्यादा तेज़ रोशनी अब नटवरसिंह की किताब डालेगी, क्योंकि नटवरसिंह अफसर नहीं थे, नेता थे, साथी थे। यह अलग बात है कि कांग्रेस पार्टी में नेता और साथी लोग भी अफसरों से ज्यादा जी-हुजूरी करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस बात को नटवरसिंह ने ज़रा ज्यादा साफ शब्दों में बयान किया है।

 

नेहरु के जमाने में वल्लभ भाई, मौलाना आजाद, राजाजी, कृपालानी, पुरुषोत्तमदास टंडन, महावीर त्यागी जैसे लोग पार्टी में थे। वे नेहरु का समर्थन भी करते थे और खुला विरोध भी। इंदिराजी ने भी शुरु के वर्षों में कड़े विरोध का सामना किया। मोरारजी, निजलिंगप्पा, सदोबा पाटील, चंद्रभान गुप्त आदि कई नेता थे। लेकिन नटवरसिंह ने ठीक लिखा है कि सोनिया गांधी को शुरु से ऐसा राज-पाट मिला था कि जिसमें उनका विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। एक सीधी-साधी, शर्मिली, घरेलू और कम पढ़ी-लिखी महिला धीरे-धीरे कैसे निरंकुश, तानाशाह, षड़यंत्री और कुटिल (मैकियाविलियन) बनती जाती है, इस प्रक्रिया को शायद नटवरसिंह ने अपनी किताब में अच्छी तरह से चित्रित किया होगा।

यदि यह चरित्र-चित्रण सजीव और वास्तविक होगा तो यह किसी भी उपन्यास से अधिक रोचक होगा। इसमें शक नहीं कि इस चित्रण में लेखक के अपने पूर्वाग्रह भी शामिल होंगे लेकिन इस से मानव स्वभाव की कई गहन गुत्थियां भी सुलझेंगी। इससे यह भी पता चलेगा कि भारतीय लोकतंत्र को भविष्य में प्रवाह पतित होने से कैसे बचाया जाए? यह तो गनीमत है कि धुप्पल में नेता बने मां-बेटे ने सिर्फ कांग्रेस की ही बधिया बिठाई। यह हमारा सौभाग्य है कि वे देश को किसी भयंकर मुसीबत में नहीं फंसा पाए। उन्होंने प्रधानमंत्री पद की इकन्नी कर डाली। अरबों-खरबों रुपए लुटवा दिए। क्या गोपनीय फाइलें इसीलिए देखी जा रही थीं? भारत जैसा विशाल लोकतंत्र तभी सबल और स्वस्थ रह सकता है जबकि हमारी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र बरकरार रहे। इस नई मोदी सरकार के लिए भी यह बड़ी चुनौती है। यदि पार्टी और सरकार, दोनों किसी एक आदमी या परिवार की जेब में रहेंगे तो मान लीजिए कि उसकी दुर्दशा भी कांग्रेस-जैसी ही हो जाएगी।

नेता बनने के पहले नटवरसिंह विदेश मंत्रालय के बड़े जिम्मेदार अफसर रहे हैं। जाहिर है कि अपनी पुस्तक में वे ऐसे कोई रहस्य उजागर नहीं करेंगे, जिससे भारत के राष्ट्रहितों की हानि हो लेकिन मंत्री रहते हुए उन्हें जो चोट पहुंचाई गई थी, यदि वे उसका बदला नहीं निकालेंगे तो वे ‘कुंवर’ या ‘चौधरी’ किस बात के होंगे? यही डर सोनिया और प्रियंका को नटवर के घर ले गया। अभी तो यह शुरुआत है। आगे-आगे देखिए होता है, क्या?

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