संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मांगा सरकार से जवाब ?


 अभिनय आकाश

सुप्रीम कोर्ट ने 21 फरवरी को भारत के संविधान में निहित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को लागू करने की मांग वाली एक रिट याचिका में केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया।

अधिकारों की बात खूब करते सुना होगा। ये कहते सुना होगा कि ये हमारा संवैधानिक अधिकार है। लेकिन हरेक अधिकार अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आती है।जब बात आती है देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की तो हम सब पीछे हटने और टाल मटोली वाली हालत में आ जाते हैं। इसी संविधान ने हमें समाज व देश के प्रति जो जिम्मेदारी तय करने के मौलिक कर्तव्य दिए उसकी बात या तो कोई करना नहीं चाहता या हम जानबूझकर नहीं करते, मतलब साफ है कि हम पाना तो सबकुछ चाहते हैं लेकिन बदले में या अपना दायित्व समझ कर कुछ करना नहीं चाहते। आज के इस विश्लेषण में हम संविधान के तहत दिए गए मूल कर्तव्यों की  बात करेंगे।

सबसे पहले बताते हैं कि आज इसको लेकर चर्चा क्यों?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 21 फरवरी को भारत के संविधान में निहित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को लागू करने की मांग वाली एक रिट याचिका में केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने शीर्ष अदालत के वकील दुर्गा दत्त की याचिका पर नोटिस जारी किये। याचिका में कहा गया है संविधान के भाग IV-ए के तहत निर्धारित जनादेश का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश जारी करने की मांग की गई है और कहा गया है कि उनका पालन न करने का सीधा असर अनुच्छेद 14, 19, 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों के इस्तेमाल और उससे मिलने वाली खुशी पर पड़ता है। अधिवक्ता करुणाकर महलिक के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि मौलिक कर्तव्यों का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को निरंतर यह याद दिलाते रहना है कि संविधान ने यदि उन्हें कुछ मौलिक अधिकार दिये हैं, तो नागरिकों को भी लोकतांत्रिक आचरण और व्यवहार के कुछ बुनियादी मानदंडों का पालन करने की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि अधिकार और कर्तव्य परस्पर संबंधित होते हैं। दत्त ने कहा कि उनकी याचिका का उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर विचार करना और नागरिकों के बीच पारस्पर एवं राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता को बढ़ावा देना है, क्योंकि इससे राष्ट्र के विकास और प्रगति में मदद मिलती है। याचिका में कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ता इस (मामले में) अदालत से अपने अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल का आग्रह करने को विवश है, क्योंकि मौजूदा कानून मौलिक कर्तव्यों के प्रदर्शन को सुनिश्चित करने के लिए अपर्याप्त हैं।’’ याचिका में आगे कहा गया है कि कुछ बिखरे हुए कानूनों को छोड़कर, मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिए न तो एक समान नीति है और न ही एक व्यापक संहिता। याचिका में सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश या इस अदालत या उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों/पेशों के प्रतिष्ठित नागरिकों और हितधारकों एवं प्रतिवादियों के संबंधित अधिकारी शामिल हों।

संविधान में मौलिक कर्तव्यों को कैसे शामिल किया गया?
1950 में जब भारत का संविधान प्रभाव में आया तो इसमें नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था तो थी लेकिन कर्तव्यों का निर्धारण नहीं किया गया था। उस वक्त शायद ये उम्मीद जताई गई थी कि अधिकार मिलने पर लोग स्वत: ही कर्तव्य बोध उत्पन्न हो जाएगा। संविधान लागू होने के करीब ढाई दशक बाद आपातकाल के वक्त इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सरदार स्वर्ण सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IV-A में शामिल किया गया था। इस समिति ने संविधान में मौलिक कर्तव्यों का एक अलग अध्याय जोड़े जाने की संस्तुति की जिसके परिणामस्वरूप 42वां संविधान संशोधन करते हुए संविधान में अनुच्छेद-51(क) के तहत मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था की गर्इ, तब नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्य निर्धारित हुए थे, जिन्हें 2002 में 86वें संविधान संशोधन के द्वारा बढ़ाकर ग्यारह कर दिया गया। हालाँकि, एक अदालत किसी मामले पर फैसला सुनाते समय उन्हें ध्यान में रख सकती है। मौलिक अधिकारों के बदले में नागरिक के दायित्व पर जोर देने के लिए उन्हें संविधान का एक हिस्सा बनाया गया था। रूसी संविधान में मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा है।
नागरिक के मौलिक कर्तव्य क्या हैं?
अनुच्छेद 51 (ए) कहता है कि यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा:
 संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों और संस्थानों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना
स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों को ह्रदय में संजोये रखना और उनका पालन करना
भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखने और उसकी रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे
देश की रक्षा करने और ऐसा करने के लिए बुलाए जाने पर राष्ट्रीय सेवा प्रदान करने के लिए तैयार रहे
धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या अनुभागीय विविधताओं से परे भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना
हमारी समासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परीक्षण करे
वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना और जीवित प्राणियों के लिए दया करना
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जांच और सुधार की भावना का विकास करे
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे और हिंसा को दूर करने के लिए
व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करना ताकि राष्ट्र निरंतर प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तर तक पहुंचे
जो माता-पिता या अभिभावक हैं, जो छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच अपने बच्चे को प्राथमिक शिक्षा का अवसर प्रदान करे
बच्चों की शिक्षा पर अंतिम उपधारा, (के), 2002 में संविधान (86वां संशोधन) अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। इसी संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 21A भी पेश किया: “राज्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।”
मौलिक कर्तव्य का महत्व काफी व्यापक है और कई मायने में विशेष भी है। कर्तव्यों में जहां प्राकृतिक पर्यावरण की  बात कही गई है वहीं राज्य के नीति निदेशक तत्वों में पर्यावरण की बात कही गई है। भारतीय संविधान की खासियत की वजह से ही आगे चलकर देश में केंद्र और राज्य के साथ स्थानीय शासन का रास्ता साफ हुआ। अधिकारों का अभिप्राय है कि मनुष्य को कुछ स्वतंत्रताएं प्राप्त होनी चाहिए, जबकि कर्तव्यों का अर्थ है कि व्यक्ति के ऊपर समाज के कुछ ऋण हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य जुड़े हुए हैं जिनको निभाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

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