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भारत में धर्म राजनीति की नकेल रहा है, और राजनीति धर्म की स्थापना का अर्थात मानवता को सर्वोपरि मनवाने का सशक्त माध्यम रही है। धर्म को जिन लोगों ने सम्प्रदाय या रिलीजन माना उन्होंने धर्म और राजनीति के खूनी संबंधों को मानवता के विरूद्घ मानकर धर्म और राजनीति को अलग-अलग करने का प्रयास किया। परंतु सत्य ये है कि राजनीति और धर्म अन्योन्याश्रित हैं, इन्हें अलग-अलग किया ही नही जा सकता। जिस दिन राजनीति धर्मविहीन हो जाएगी, उस दिन वह निरंकुश हो जाएगी और उससे तब मानवता को संकट भी उत्पन्न हो जाएगा।

भारत में धर्म के व्यापक अर्थ हैं। यहां मानवता के प्रति ही नही अपितु वेदों ने पशुओं के प्रति भी मानव के कत्र्तव्य धर्म का निरूपण किया है और उसे ‘पशूनपाहि’ का आदेश देकर पशुओं का रक्षक नियुक्त किया है-भक्षण नही। जो लोग पशु मांसभक्षक हैं, उन्हें भारतीयों ने प्राचीनकाल से ही चांडाल आदि का नाम दिया है। इसलिए पशुभक्षकों को कभी भी भारतीय समाज ने सम्मान की दृष्टि से नही देखा। यही कारण रहा कि भारतीय संस्कृति का निर्माण सात्विक भावों की प्रधानता से हुआ। इसमें आत्मविकास को प्राथमिकता दी गयी, आत्मविनाश को नही।

हमने पशुओं में सर्वोत्तम गाय को माना। हमने उन तत्वों, तथ्यों और सत्यों की खोज की जिनसे गाय हमारी माता मान ली गयी और उसके प्रति संपूर्ण समाज में वैसा ही श्रद्घाभाव उत्पन्न कर दिया गया। जिससे सारे समाज का सात्विक परिवेश बना। गाय के दूध की सात्विकता ने हमारी बुद्घि को सात्विक बनाया तो हमने उस सात्विक बुद्घि से बड़े बड़े अनुसंधान और आविष्कार कर संसार को चमत्कृत कर दिया। परंतु धीरे-धीरे वैदिक सूर्य को ग्रहण लगा और देश पर विदेशी आक्रमणकारी शासक बनकर शासन करने लगे। इस काल में देश के सांस्कृतिक मूल्यों का जमकर दोहन किया गया और हमें अपने धर्म से काटने का एक व्यापक षडय़ंत्र रचा गया। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ तो देशभक्तों को लगा कि अब संस्कृति का सूर्य पुन: उदय होगा, और सारे ‘राहु-केतु’ भाग खड़े होंगे। परंतु षडय़ंत्र की निराशा-निशा और भी गहराती गयी, और हमने देखा कि देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली पर देश की संस्कृति, धर्म और इतिहास को हम कारागार में ही पड़े छोडक़र उत्साह में आगे बढ़ लिए।

परिणामों पर विद्वानों ने चिंतन आरंभ किया, तो ज्ञात हुआ कि अभी स्वतंत्रता का एक और संघर्ष किया जाना शेष है। तब ‘धर्म-मनीषी’ और ‘धर्म-सम्राट’ अपना बड़े-छोटे का भेद भुलाकर नये स्वतंत्रता संग्राम की भूमिका और रणनीति बनाने में जुट गये। संघर्ष का सबसे प्रमुख मुद्दा गाय माता की रक्षा को माना गया। पर दुर्भाग्य था इस देश का कि देश का तत्कालीन नेतृत्व इस संग्राम की रूपरेखा, और रणनीति पर किंचित भी सहमत नही था। वह अपने आप ही अंग्रेजों की भूमिका में आ गया और उसने मन बना लिया कि इस आंदोलन को जन्म लेते ही कुचला जाएगा। यद्यपि गोरक्षा के आंदोलनों का भारत में पुराना और लंबा इतिहास है। जिसे इस लेख में समेटना असंभव है। पर हम यहां हिंदू महासभाई नेता महात्मा रामचंद्रवीर के 20 अगस्त 1966 से प्रारंभ किये गये गोरक्षार्थ आमरण अनशन और इससे उपजे आंदोलन तक ही अपने आप को सीमित रखेंगे। इस वीर महात्मा ने अपना आमरण अनशन उस समय तक महासभा के राष्ट्रीय कार्यालय में जारी रखा, जब तक (अनशन के 80वें दिन) उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल न ले गयी। इस काल में महासभा भवन में बहुत से लोगों ने व्यक्तिगत रूप से जाकर महात्मावीर को अपना समर्थन दिया था। सरकार ने उन पर ‘आत्महत्या’  का मुकद्दमा ठोंक दिया।

इस स्वतंत्रता संग्राम को सर्वदलीय गोरक्षा महाअभियान समिति ने नई ऊंचाईयां दीं। 14 सितंबर 1966 को भारत गोसेवक समाज के कार्यालय दिल्ली में महाभियान समिति के पदाधिकारियों का निर्वाचन किया गया। जिनमें स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थजी महाराज, गोवर्धन पीठाधीश्वर पुरी अनंत श्री स्वामी करपात्री जी महाराज, श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी गुरूचरण दास जी, मुनि सुशील कुमार जी, श्री माधव राव, सदाशिव गोलवलकर जी व श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार को सम्मिलित किया गया। 5 सितंबर 1966 को संसद भवन पर गोभक्त एक विशाल प्रदर्शन कर चुके थे। जिससे आंदोलन गति पकडऩे लगा था और उस आंदोलन को सही दिशा देने के लिए ही उपरोक्त लोगों का चयन किया गया था। 5 सितंबर के आंदोलन में डेढ़ से दो लाख लोग सम्मिलित हुए थे।

सर्वदलीय गोरक्षा महाअभियान समिति और हिंदू महासभा गोरक्षा को एक जनान्दोलन बनाने के लिए दिन-रात एक करने पर उतारू हो गये। अंत में 7 नवंबर 1966 को दिल्ली में संसद भवन पर एक विराट गोभक्त सम्मेलन करने का निर्णय लिया गया। निश्चित दिवस को हजारों  नही अपितु लगभग बारह लाख लोगों ने स्वतंत्रता और गोरक्षा के इस महायज्ञ में सहयोग और समिधा प्रदान कीं। जिससे से सारी दिल्ली गो सुगंधि में रच-बस गयी। परंतु सरकार को इन 12 लाख लोगों की 36 लाख (एक व्यक्ति तीन समिधाएं छोड़ता है) समिधाओं से प्रचण्ड हुई यज्ञाग्नि से सुगंधि नही अपितु दुर्गंध निकलती दिखाई दी।

तत्कालीन संसार ने हमारी स्वतंत्रता के बीस वर्ष पूर्ण होने से पूर्व ही देख लिया कि इस देश की संघर्ष क्षमता क्या है और वह अपनी संस्कृति की रक्षार्थ सब कुछ न्यौछवर करने को तैयार है। लोगों ने महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा में उमड़े जनसैलाब (लगभग दस लाख लोग) को देखकर कहा था कि इतने लोग नही लगता कि किसी मुद्दे को लेकर फिर कभी एकत्र हो पाएंगे। जिनका ऐसा अनुमान था उन्होंने देख लिया कि गाय ने गांधी के कीर्तिमान को अठारह वर्ष पश्चात ही ध्वस्त कर दिया। सरकार को पसीना आ गया। संसद भवन के सामने एक विशाल मंच बनाया गया था जिस पर देश की गूंगी बहरी सरकार के कान खोलने के लिए देश के नामचीन धर्म नायक बैठे और उन्होंने सरकार को अहिंसक रूप से चुनौती दी। मंचासीन लोगों में स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी महाराज, निरंजन देवतीर्थ जी महाराज, स्वामी करपात्री जी महाराज, प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी, जैन मुनि सुशील कुमार जी, स्वामी रामेश्वरानन्द जी, भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार, अटल बिहारी वाजपेयी, प्रकाशवीर शास्त्री, सेठ गोविन्द राय इत्यादि का नाम उल्लेखनीय था।

सरकार के पसीने छूट रहे थे-ऐसी धर्म विभूतियों के आवाह्न पर जुटी विशाल भीड़ को देखकर। दिल्ली में गोभक्तों का ऐसा जमावड़ा उससे पूर्व कभी नही हुआ था। नेहरू को कांग्रेस ने बेताज का बादशाह कहकर महिमा मंडित किया था। जिससे कांग्रेस में एक भ्रांति घर कर गयी थी कि वह जो चाहे सो कर सकती है, देश की जनता तो उसी के साथ रहेगी। 24 जनवरी 1966 को देश का नेतृत्व इंदिरा गांधी के हाथ में आ गया था। इंदिरा गांधी तब एक अनुभव हीन राजनीतिज्ञा थीं। दूसरे उन्हें ‘बेताज के बादशाह’ नेहरू की बेटी होने का घमण्ड भी था। अत: इन दोनों तत्वों ने उनका धैर्य स्तर निम्न कर दिया। वह बौखला गयीं और बौखलाए हुए व्यक्ति से कभी भी किसी उचित निर्णय के लेने की अपेक्षा नही की जा सकती। इसलिए उन्होंने अपने गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को आंदोलन से शक्ति से निपटने का निर्देश दिया।

सरकार ने अपनी हिंसक रणनीति को उचित ठहराने के लिए पहले अपने सरकारी गुण्डों से शांतिपूर्ण चल रही सभा में प्रदर्शनकारियों पर लाठी प्रहार करवा दिया। जिससे चारों ओर अव्यवस्था फेेल गयी। सरकारी षडय़ंत्र का पहला चरण पूर्ण हो गया तो अब षडय़ंत्र का दूसरा चरण आरंभ हुआ और सरकार ने अहिंसक लोगों पर आंसू गैस के गोले और राइफलों की गोलियों की बौछार करानी आरंभ कर दी। पुलिस ने अपनी जिस निर्दयता का प्रदर्शन किया उससे जलियांवाला बाग के हत्याकांड का जिम्मेदार डायर भी लज्जित हो गया होगा? उसने भी नही सोचा होगा कि धर्मप्रेमी जनता के अहिंसक प्रदर्शन पर राजकीय शक्ति कभी इतनी निर्मम हो सकती है। सरकार ने लगभग 5000 साधु संतों का वध कराया और अपने आप को छिपाने के लिए सारे शवों को विद्युत भट्टी में जलवाकर समाप्त करा दिया। दिल्ली ‘अपने लोगों की नादिरशाही’ को देखकर कांप उठी।

अब आगामी 7 नवंबर को संसद भवन के निकट शहीद हुए पांच हजार बलिदानियों का बलिदान दिवस है। जिसे सर्वदलीय गोरक्षा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठा. जयपाल सिंह नयाल ने विशेष रूप से मनाने का निर्णय लिया है। जिसे हिंदू  महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (कार्य.) पं. बाबा नंदकिशोर मिश्र ने भी अपना समर्थन दिया है। इस दिन अमर हुतात्माओं को श्रद्घांजलि देने के लिए दौड़ का आयोजन किया जाएगा। वास्तव में यह निर्णय एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।

आज गौमाता के प्राणों को 1966 से भी अधिक संकट है। मैराथन दौड़ से भी आगे इस दिशा में कुछ करने की आवश्यकता है। हमें भारत के प्रधानमंत्री मोदी से विशेष अपेक्षाएं हैं। उन्होंने गाय के लिए कुछ किया भी है, परंतु वह अपर्याप्त है, प्रत्येक दिन की देरी लाखों गायों की हत्या का कारण बन रही हैं। जिसे और अधिक सहन करना अब भारी होता जा रहा है। इसलिए सरकार को इस ‘मैराथन दौड़’ में सहयोग करना चाहिए और गोभक्त हुतात्माओं की आत्मा की शांति के लिए उनके बलिदान दिवस को ‘गोभक्त बलिदान दिवस’ के रूप में मान्यता देकर सम्मानित करना चाहिए। हम चाहेंगे कि इस बलिदान दिवस पर लोग दौड़ें और विश्व को  एक अनोखा संदेश दें, कि धरती पर एक ऐसा देश भी है जहां के लोग अपने लिए नही, अपितु एक पशु की रक्षा के लिए दौड़ रहे हैं और उसे राष्ट्रमाता घोषित कराने की मांग कर रहे हैं। नयाल जी को इस पहल के लिए धन्यवाद।

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