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किस काम के ये खुदगर्ज जो किसी के काम न आएं

man+aloneजो सामाजिक प्राणी कहा जाता है उसका सीधा रिश्ता और जवाबदेही समाज अर्थात समुदाय से होता है।  जिस इंसान के सामाजिक सरोकार नहीं होते उसे सच्चा इंसान नहीं कहा जा सकता। ऎसे लोग किसी पुतले से कम नहीं हुआ करते जिनके प्रति लोग अपेक्षा, आकांक्षा और आशाओं को पूरी तरह यह समझ कर त्याग दिया करते हैं कि ये लोग किसी काम के नहीं हैं और इनका समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है।

कुछ दशकों से इंसान के सामाजिक सरोेकारों की स्थितियों में जबर्दस्त बदलाव आया है। अब आदमी समाज में  रहने के बावजूद लगता है अकेला है, एकाकीपन में जीने की उसकी आदत पड़ गई है। जिस सामाजिक प्राणी को समाज प्रिय होता था वह अब द्वीप की तरह रहने लगा है।

हम इंसानों की फितरतें कुछ अलग ही किस्मों से भरी हैं जिनके बारे में कल्पनाएं करने के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता। इंसानों की जात-जात की किस्मों में एक अजीब तरह की प्रजाति है उन लोगों की जो खुद ही खुद के लिए जीते हैं या अपने परिवार के लिए।

इन लोगों को न अपने पड़ोसियों से मतलब होता है, न समाज या क्षेत्र के लोगों से। आम तौर पर सामान्य आदमी का जीवन जितना गहरे तक सामाजिक, सेवा भावी एवं परोपकारी होता है उतना किसी और का नहीं हो सकता। अनपढ़, अशिक्षित और कम शिक्षित लोगों में समाज के लिए जीने-मरने के भाव अत्यन्त प्रगाढ़ होते हैं। देखा यह जाता है कि पढ़े-लिखे, उच्च शिक्षित और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों में स्वार्थ केन्दि्रत जीवन की बीमारी अधिक देखी जाती है।

कई बड़े-बड़े, उच्चतम पद-मद और कद के लोगों में अपने ही अपने लिए जीने की महामारी कुछ अधिक ही रहती है।  इस मायने में हर किसी बाड़े में इस प्रजाति के प्राणियों को देखा जा सकता है जिनके जीवन का हर क्षण इसी में गुजरता है कि वे अपने लिए कितना कुछ कर लें,किस अवसर को अपने लिए भुना लें, किस तरह अपनी ही अपनी ऊँचाइयों को पाने के लिए जतन करते रहें, कैसे अपने लोभ-लालच पूरे होते रहें,किस तरह वे ही वे आगे बढ़ते रहें और जमाने भर का वो सब कुछ हथिया लें जो औरों के भाग में नहीं है।

अपने इन लोभ-लालच और स्वार्थों से भरे कर्म में जो कोई बाधाएं आती हैं उनका निवारण करने में भी ये लोग माहिर होते हैं और इन्हें इस बात से कोई परहेज नहीं कि अपने किसी छोटे से स्वार्थ के लिए औरों का चाहे कितना नुकसान हो जाए।

इस प्रजाति के लोग जहाँ होते हैं वहाँ अपने आस-पास के लोगों, सहकर्मियों और क्षेत्रवासियों अथवा अपने से संंबंधित लोगों के किसी काम के नहीं होते। यों ऎसे लोग बड़ी-बड़ी हस्तियों के साथ दिन-रात रहते हैं और इन महान हस्तियों के किचन, बाथरूम से लेकर स्थायी और अस्थायी अन्तःपुरों के लिए सारी व्यवस्थाएं करने में लगे रहकर अपने आपको धन्य समझते हैं। लेकिन इन लोगों में न उदात्तता होती है न इतनी उदारता कि अपने आस-पास के लोगों के लिए  अपने संबंधों और आत्मीय व्यवहार का लाभ औरों को दिला सकें।

ये खुदगर्ज लोग चाहे कितने उच्च पदों या उच्चतम शिखरों के साथ भले रहें, ये अपने ही अपने उल्लू सिद्ध करने में लगे रहते हैं। इन्हें हमेशा इस बात का डर सताता रहता है कि औरों के जायज कामों के पचड़े में पडें़गे तो उनके काम निकलवाने में अड़चनें आ सकती हैं।

यही कारण है कि धूत्र्त, स्वार्थी और मक्कार लोग  चाहे कितने बड़े से बड़े और प्रभावशाली इंसान के साथ क्यों न रहें, ये अपने भीतर इतना साहस पैदा नहीं कर पाते कि औरों के अथवा समाज या क्षेत्र के कल्याण के लिए अपने संबंधों का लाभ दिला सकें।

ऎसे खुदगर्ज और स्वार्थी लोगों की कई सारी जमातें अस्तित्व में आती रहीं और ऊपर जाती रहीं लेकिन न इनके प्रति किसी में श्रद्धा भाव रहा है, न रहने वाला है। हम कई सारे ऎसे लोगों के बारे में सुनते हैं जो कि कभी प्रभाव में रहे हैं अथवा प्रभावशाली लोगों के चापलुस, यशगान करने वाले अथवा दिन-रात चम्पी करने वाले रहे हैं और बड़े लोगों के अत्यन्त करीबी कहे जाते रहे हैं लेकिन ये लोग सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से शून्य कहे जा सकते हैं।

खूब सारे ऎसे लोगों के बारे में समझदार लोग यही कहते हैं कि ये लोग जहाँ कहीं प्रभाव में रहे, जिन बड़े लोगों के साथ रहे, उनका लाभ खुद ही खुद के लिए लिया, न अपने बाड़ों के बारे में ध्यान रखा, न अपने सहकर्मियों के बारे में, और न ही अपने समाज और क्षेत्र के बारे में।

आम लोग इस किस्म के लोगों के बारे में साफ-साफ कहते हैं कि इन नालायकों की वजह से कई सारे अच्छे लोग पिछड़ गए, कई अच्छे काम रह गए और इन लोगों ने जितना फायदा उठाया, वही अपने आप में ऎसा इतिहास है जिसकी हर लकीर में खुदगर्जी, शोषण और धूत्र्तता झलकती है।

ऎसे नालायकों के कारण समाज और क्षेत्र का जितना नुकसान महसूस किया जाता रहा है वह दुर्भाग्यजनक ही है। इन खुदगर्ज लोगों को दुर्भाग्यशाली लोगों की श्रेणी में रखा जाना ज्यादा उचित होगा जिनकी वजह से सज्जनों और समाज को अपूरणीय क्षति होती रही है।

हममें से काफी लोग ऎसे हैं जो ऎसे खूब सारे लोगों से त्रस्त रहे हैं जो जहां भी रहे वहाँ अपने ही अपने लिए जिये और हमेशा अपने ही स्वार्थ और लाभों के लिए  चिंतित रहे। कई लोग ऎसे भी होते हैं जिन्हें उनकी खुदगर्जी और नालायकियों के बारे में बार-बार स्मरण कराए जाने और उलाहना दिए जाने के बावजूद उन पर कोई फरक नहीं पड़ता बल्कि ये लोग इतने बेशर्म और निर्लज्ज, निगुरे होते हैं कि इन्हें अपने काम निकलवाने और स्वार्थ सिद्धि से ही मतलब होता है, चाहे कोई इनका कितना ही अपमान क्यों न कर डाले।  अपने काम निकलवाने के लिए ये लोग कुछ भी करने-करवाने तक से गुरेज नहीं रखते।

असल में जीवन उसी का सार्थक व धन्य है जो औरों के काम आए, सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण रखे। वे लोग मनुष्य जाति और समाज के शत्रु ही कहे जा सकते हैं जो कि अपने लिए ही जीते हैं और जिनके लिए  अपने स्वार्थ पूरे करना ही जीवन भर का लक्ष्य है। पर इतना अवश्य है कि इस प्रजाति के लोग अपने जीवन के उत्तरार्ध में एकाकीपन में  जीते हैं और दूसरे लोग इनके बारे में जहां मौका मिलता है, यह कहने से नहीं चूकते कि इन नालायकों ने किसी का काम नहीं किया और जो कुछ किया खुद ही खुद के लिए।

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