माता हमारे पिता के सपनों के अनुसार ही हमारी निर्माता है

(‘उगता भारत’ के प्रेरणास्रोत पूज्य महाशय राजेन्द्र सिंह आर्य जी की 103वीं जयंती 5 अक्टूबर 2014 और पूज्या श्रीमती सत्यवती आर्या जी की 89वीं जयंती 8 अक्टूबर 2014 के अवसर पर, विशेष रूप से तैयार यह आलेख आज के समाज में माता पिता के प्रति हमारे दृष्टिकोण में आ रहे परिवर्तन को ठीक करने में विशेष रूप से सहयोग करने वाला है-सहसंपादक-श्रीनिवास एडवोकेट)

ugtabharat family mother and fatherयज्ञ के समय पति की दक्षिण दिशा में पत्नी के लिए स्थान नियत किया जाता है। यज्ञ के समय आघारावाज्याभागाहुतियों-अग्नये स्वाहा से पहली आहुति उत्तर में दी जाती है और सोमाय स्वाहा-से दूसरी आहुति दक्षिण में दी जाती है। इसका कारण ये है कि अग्नि का स्थान उत्तर में तथा सोम का स्थान दक्षिण में निश्चित है। पुरूष अग्नि प्रधान होने से पुरूष में पौरूष का तो सोम प्रधान होने से नारी में ममता जैसे सरस गुणों का विकास होता है। इसलिए यज्ञ विज्ञान के नित्यविधान में पति-पत्नी का उपरोक्तानुसार स्थान निश्चित किया गया है।

सृष्टि संचालन के लिए अग्नि और सोम दोनों का होना आवश्यक है। अग्नि जब प्रचण्ड होती है, तो सोम को अग्नितत्व उसके भीतर रहकर भी संतुलित रखता है। ऐसे ही संसार में जब एक व्यक्ति किन्हीं नकारात्मक विचारों में या विध्वंसात्मक विचारों यथा काम क्रोधादि में फंस जाता है तो उसका जीवन साथी ही सबसे पहले उसे उनसे निकालता है, बचाता है, उसकी रक्षा करता है। संसार के आवेगों का पति शीघ्र शिकार होता है, इसलिए उस समय पत्नी उसकी रक्षिका होती है। इसलिए पत्नी का शाब्दिक अर्थ रक्षिका माना जाता है। स्वाभाविक है कि हर माता-पिता बनने से पहले पति -पत्नी है। उनके लिए सबसे सुंदर नाम है-दंपती। इसे हमने सबसे सुंदर नाम इसलिए कहा है कि संसार में एक और एक मिलकर गणित के अनुसार दो होते हैं, तो कई बार एक और एक व्यक्ति के बल के मिल जाने से जो गुणात्मक परिवर्तन होता है, उसके दृष्टिगत लोग एक और एक को ग्यारह भी बताते हैं। परंतु भारतीय संस्कृति की अनोखी खोज है कि प्रणय संस्कार में आबद्घ हो जाने पर एक और एक मिलकर एक हो जाते हैं।

सारे संसार के वैज्ञानिक मान रहे हैं कि संतान के संस्कारों पर और उनके विचारों पर माता-पिता के संस्कारों और विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा करता है। इसलिए भारतीय संस्कृति के कुशल शिल्पकार ऋषियों का चिंतन देखिए कि उन्होंने यज्ञ के माध्यम से ‘अग्नये स्वाहा और सोमाय स्वाहा’ कहकर पति पत्नी को एक दूसरे का धर्म समझाया कि तेरा धर्म अग्नि है, तो तेरा धर्म सोम है। पर तुम दोनों का लक्ष्य एक है। साधना एक है, व्रत संकल्प एक है-प्रजोत्पत्ति।

यहां बात प्रजा की कही गयी है-भीड़ की नही। भीड़ और प्रजा में अंतर है। प्रजा का अर्थ संतान से है और संतान का अर्थ है जो आपके विचारों की समुज्ज्वल चादर को तान दे। आपके विचारों को दूर-दूर तक फेेलाये। यज्ञ के समय जब हम पंच घृताहुति देते हैं, तो उसमें प्रभु से पांच पदार्थों की ही कामना की जाती है जिसमें सर्व प्रथम है प्रजया इधस्व-हमें प्रजा द्वारा चमकाइए।

प्रजा का अर्थ है-‘प्रकृष्टेन जायते’ जिसे माता पिता ने संकल्प लेकर, विशेष तैयारी के साथ उत्पन्न किया है। जो संतान खेल-खेल में बिना किसी उद्देश्य के ऐसे ही उत्पन्न हो जाती है, वह प्रजा नही है-भीड़ है। आज कल विश्व में व्याप्त अशांति का एकमात्र कारण यही है कि संतान की प्रजा के रूप में कामना करके उत्पत्ति नही की जा रही। वासनात्मक परिवेश में विश्व के विनाश की लीला रची जा रही है और बातें विश्व-शांति की हो रही हैं।

प्रजोत्पत्ति करने वाले दंपत्ती ही संसार में माता-पिता बनने या कहलाने का सौभाग्य रखते हैं। माता-पिता बनने से पूर्व उन दोनों को लक्ष्य की एकता और समानता साधनी पड़ती है। ऐसा नही होना चाहिए कि पति तो संतोषी मां का पुजारी हो और पत्नी निराकार ईश्वर की उपासिका हो, या पत्नी तो संकल्प ले कि पुत्र को उसके उत्पन्न होने के पश्चात पढ़ा लिखाकर डाक्टर बनाऊंगी और पति कहे कि मैं तो प्रोफेसर बनाऊंगा। यदि ऐसी मतभिन्नताएं हैं तो अग्नि और सोम में समझो द्वंद्व है और जहां द्वंद्व है वहीं अशांति है। यह द्वंद्व का भाव प्रजोत्पत्ति से पहले दंपत्ती बनते समय यदि मिटते-मिटते ‘एक’ में समाहित नही हुआ तो संतान के पैदा होने पर अपना गुल अवश्य खिलाएगा, और हम देखेंगे कि उस बच्चे को लेकर या तो माता-पिता में ही झगड़ा रहेगा कि मैं इसे ये बनाऊंगी या मैं ये बनाऊंगा या फिर वह बच्चा ही कह देगा कि मुझे ना ये बनना ना ये बनना, मैं तो ये बनूंगा।

माता-पिता से अलग जाकर ये कहना कि ‘मैं तो ये बनूंगा’ बता रहा है कि कहीं न कहीं विकृति रही। तभी तो नखरा है, नाज है, नकारात्मकता है ‘न’ ‘न’ कहने की प्रवृत्ति है।

आज समाज में यह ‘न’ ‘न’ की प्रवृत्ति बहुत बढ़ रही है। इसे समाप्त करने के लिए माता-पिता पहले श्रेष्ठ दंपती बनें। आवश्यक और अपेक्षित सुधार दिखने लगेगा।

माता-पिता को लेकर वेद ने एक और सुंदर चित्र खींचा है। ऋग्वेद (5/2/1) में माता को प्रकृति तथा पिता को ईश्वर कहा गया है। इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्वामी वेदानंद तीर्थ जी ने कहा है किवेद ने इस मंत्र में एक ऐसा मर्म बताया है जो सर्वथा प्रत्यक्ष है, किंतु संसारी जीव उसे देख नही पाते। हम प्रतिदिन लोगों को मरते देखते हैं, मृतकों को श्मशान ले जाते हैं, अपने हाथ से जलाते हैं, किंतु कितने हैं जिन्हें यह विचार आता है कि एक दिन हमारी भी यही अवस्था होगी, हमेें भी इस संसार से कूच करना होगा, यह पुत्र कलत्र, मित्र सभी यही रह जाएंगे। कोई साथ नही जाएगा। जीव की इस मूढ अवस्था का ही वर्णन मंत्र के पूर्वाद्घ में है। प्रकृति माता के रूप में पालिका-लालिका के रूप में आती है और उसे अपनी गोद में छिपा लेती है।

जो वास्तविक पालक है, उस परम पिता के पास नही जाने देती। प्राकृतिक विषयों में फंसा जीव परमात्मा को भूल जाता है। इसी भाव को देखकर या समझकर एक महात्मा ने यों कहा है-अनृत्येन प्रत्यूढ़ा:-अर्थात हम सब असत्य से प्रभावित हो रहे हंै। सचमुच परमात्मा से दूर होना असत्य प्रवाह में गिरना है।

जैसे प्रकृति अपनी माया ममता में हमें फंसाकर ईश्वर से हमारा साक्षात्कार नही होने देती। वैसे ही कई बार साधारण माताएं संतान और उसके दोषों को पिता से छिपाकर रखती हैं। जिससे संतान पिता से दूर हो जाती है। परंतु एक अच्छी माता सदा ही संतान को पिता से उचित स्नेह, वात्सल्य तो दिलाती ही है, साथ ही उचित लताड़ भी दिलाती है और पहले ये बता देती है कि ‘लताड़ की खुराक’ कितनी रखनी है? माता के इस स्वरूप से पिता का मार्गदर्शन होता है कि मुझे कितने अनुपात तक क्रोध करना है, अग्नि बरसानी है? यदि अग्नि अधिक बरस जाती है तो माता का सौम्य गुण उसमें संतुलन बनाकर प्रयास करता है कि पिता संतान के प्रति कोई दुर्भाव ना पाले और संतान पिता से घृणा न करने लगे। कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है-माता की। माता को निर्माता कहकर वेद ने सम्मानित किया है। यह स्थान वेद ने पिता को नही दिया। कभी-कभी वेद की बातों पर भी आश्चर्य होता है कि माता को निर्माता कह दिया और पिता को इस गौरवपूर्ण स्थान से वंचित कर दिया। पर बात वेद भगवान की ही सच है। क्योंकि संतान पर माता के विचारों, संस्कारों और गुणावगुणों का प्रभाव संतान के गर्भावस्थाकाल से ही पडऩा आरंभ हो जाता है। पिता की गोद में जो फल 9-10 माह बाद आएगा पहले वह अपना निर्माण माता के हृदय रस से करता है और यही वह अवस्था है, जब माता उसे बहुत कुछ बना देती है। इसलिए माता निर्माता होती है। परंतु इसका अभिप्राय यह नही कि पिता का कोई स्थान या हमारे निर्माण में कोई भूमिका ही नही होती है। भूमिका होती है और उस भूमिका को भी हमारी माता ही निर्धारित करती हैं। पिता हमारे विषय में ऊंची-ऊंची कामनाएं और अपेक्षाएं पालता है, हमें ऊंचाई पर ले जाना चाहता है-तो ‘मां चंदा मामा दूर के’ का गीत गाकर हमारी कल्पनाओं को पंख लगाती हैं। जब हमारी कल्पनाएं हमारे पंख बनकर उडऩे लगती हैं-तो कहीं ऊपर ही बैठे पिता के दर्शन हमें हो जाते है। तब हमें पता चलता है कि माता जो निर्माण कर रही थी वो पिता के सपनों से मिलाने के लिए कर रही थी।

अत: माता-पिता का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। इन दोनों के दिव्य स्वरूप को वैदिक दृष्टिकोण से यदि संसार अपना ले, तो संसार के बहुत से कष्ट-क्लेश मिट सकते हैं। पूज्या माता स्व. श्रीमती सत्यवती आर्या जी और पूज्य पिता स्व. महाशय राजेन्द्र सिंह आर्य जी का जीवन एक श्रेष्ठ दंपती का था, उनके दिव्य जीवन से सारा ‘उगता भारत’ परिवार प्रेरणा और ऊर्जा ग्रहण करता है। उनकी जयंतियों के अवसर पर संपूर्ण ‘उगता भारत’ परिवार उन्हें अपनी विनम्र श्रद्घांजलि अर्पित करता है।

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