वोट जिहाद: मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को बहुत बारीक़ी के साथ समझिए…!

-बाबा इज़रायली 🇮🇱

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ भारत के एक हिंदू संगठन का ही अनुषांगिक प्रकल्प है। यह प्रकल्प राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों को भाजपा से जोड़ने के प्रयासों का क्रियान्वयन करने के लिए जाना जाता है। हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि इस प्रकल्प के मुसलमान सदस्य ‘राष्ट्रवादी’ होते हैं और वे इस्लामी कट्टरता और जिहाद जैसे आतंकवादी कुकृत्यों में संलिप्त न रहकर भारतीय जनता पार्टी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ नामक ध्येय में अपना विश्वास रखते हैं और भाजपा को वोट देते हैं।

हमको विभिन्न समाचार-पत्रों से यह ज्ञात हुआ है कि इस राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में देश के मुस्लिम समुदाय से भाजपा को वोट देने की अपील की है। इस अपील को सुनकर भारतीय हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा यह सोचने लगा है कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की इस अपील पर भारत के मुस्लिम मतदाता भाजपा-विरोधी सांप्रदायिक ताक़तों के हाथ की कठपुतली नहीं बनेंगे और भाजपा के ‘सबका साथ, सबका विकास’ नामक ध्येय में अपना विश्वास रखते हुए भाजपा को अपना वोट प्रदान करेंगे।

प्यारे हिंदुओं! इस अपील को सुनकर यदि आपके हृदय में यह विचार आ रहा है कि राष्ट्रीय मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे विभिन्न इस्लामी प्रकल्प भाजपा के पक्ष में प्रचार-कार्य कर रहे हैं तो आपको अपनी याददाश्त पर थोड़ा-सा ज़ोर डालने की आवश्यकता है। यदि आप पूर्व में हुए चुनावों में इन इस्लामी प्रकल्पों की कथनी और करनी का अन्वेषण करेंगे तो आपको इनकी असलियत पता चल जाएगी।

उदाहरण के लिए वर्ष 2021 में हुए असम विधानसभा चुनावों को ही ले लेते हैं जिनमें कि लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज़ होने वाली भाजपा को 126 में से 60 सीटों पर जीत मिली थी। इसके बावजूद भाजपा ने असम में अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ को भंग कर दिया था। भाजपा द्वारा अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ को भंग करने के पीछे की मुख्य वजह यह थी कि असम विधानसभा चुनावों में उसके अल्पसंख्यक मोर्चा का प्रदर्शन बेहद निम्न स्तर का रहा था। भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा का यह प्रदर्शन इतना ख़राब था कि भाजपा को अपने अल्पसंख्यक मोर्चा के पंजीकृत सदस्यों तक के वोट प्राप्त नहीं हुए थे! इसका मतलब यह है कि भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के अंदर जो पंजीकृत मुस्लिम कार्यकर्ता थे, उन्होंने तक भाजपा को अपना वोट प्रदान नहीं किया था!

इसके बाद अल्पसंख्यक मोर्चा के द्वारा दी गई ग़द्दारी का पता चलते ही असम भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने प्रदेश में पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे को ही भंग कर दिया था। दास ने कहा था कि पार्टी को उन क्षेत्रों में बहुत कम वोट मिले, जिनकी हमें उम्मीद थी। चुनाव परिणामों का अन्वेषण करने के उपरांत पता चला था कि भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा की बूथ कमेटियों के पंजीकृत सदस्यों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया था। उन विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी कम से कम सात प्रवासी मुस्लिम-बहुमत वाली सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही थी। इसके लिए उसने मतदाताओं को लुभाने के लिए बूथ स्तर की जनसभाओं सहित एक मतदाता-केंद्रित रणनीति भी अपनाई थी लेकिन अपने मुस्लिम कार्यकर्ताओं के द्वारा धोखा देने के बाद असम भाजपा को अपने अल्पसंख्यक मोर्चा की स्टेट कमेटी, डिस्ट्रिक्ट कमेटी और मंडल कमेटी को भंग करना पड़ गया था।

प्यारे हिंदुओं, आप बाबा इज़रायली की इस बात को हमेशा याद रखना कि मुसलमान कभी भी भाजपा को वोट नहीं दे सकता है। यहां पर यदि आप यह समझ रहे हैं कि मुसलमान सपा-बसपा एवं कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टियों को वोट देता है तो भी आप एकदम ग़लत हैं। दरअसल मुसलमान कभी भी सपा-बसपा अथवा कांग्रेस जैसी तथाकथित सेकुलर पार्टियों को भी कभी वोट नहीं देता है। मुसलमान ‘पार्टी’ की जगह हमेशा ‘सीट’ पर वोट करता है। हर सीट पर भाजपा के विरुद्ध जो भी उम्मीदवार मुक़ाबले में होता है, मुसलमान केवल उसी को वोट देता है। यह बात अलग है कि ऐसा करने से उसका वोट सपा-बसपा अथवा कांग्रेस आदि पार्टियों को मिल जाया करता है और ये मूर्ख पार्टियां इस ग़फ़लत को पालने लग जाती हैं कि मुसलमान मतदाता उनको वोट दे रहा है।

उदाहरण के लिए पिछले कुछ समय में जैसे-जैसे इस्लामी कट्टरपंथी मोहम्मद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी भूमि तलाशना शुरू की है, वैसे-वैसे मुसलमानों के लिए सपा-बसपा और कांग्रेस जैसी तथाकथित सेकुलर पार्टियों की अहमियत कम होती चली गई है। इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण वर्ष 2020 में बिहार के सीमांचल क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों पर हुए चुनावों में देखने में आया जब मुसलमानों ने वहां के भाजपा-विरोधी ‘महा-गठबंधन’ की सेकुलर पार्टियों को लात मारकर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम पार्टी को अपना एकमुश्त वोट दिया और अपने पांच मुस्लिम विधायकों को चुनने में कामयाबी हासिल की।

इसके अलावा एक बात और कि ‘विकास’ एवं ‘सेकुलरिज़्म’ नामक भस्मासुरी सिद्धांतों का कीड़ा केवल हिंदुओं को ही काटता है। मुसलमान इन मुद्दों पर कभी भी वोट नहीं देता है। मुसलमान केवल और केवल उन्हीं उम्मीदवारों को अपना वोट देता है जो उसके ‘इस्लामी हितों’ को सुरक्षित बनाए रहने की 100% गारंटी देते हैं। पिछले बिहार विधानसभा चुनावों के बीच में जब एक मुस्लिम से यह पूछा गया कि भाजपा की नीति तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की है तो फिर आप क्यों उसका विरोध करते हैं? इस सवाल के जबाब में उस मुस्लिम का कहना था कि जब हमारी मज़हबी आज़ादी (असलियत में इस्लामी गुंडागर्दी) ही सुरक्षित नहीं है तो क्या हम विकास को लेकर चाटेंगे? काश! भारत के पढ़े-लिखे हिंदू भी अनपढ़-ज़ाहिल कहे जाने वाले इस मुस्लिम मतदाता की राजनितिक क़ाबलियत से कुछ सबक़ सीख पाते!

हिंदुओं, आपको मुसलमान के वोट देने का पैटर्न जितनी जल्दी समझ में आ जाएगा, उतना आपके भविष्य के लिए बेहतर रहेगा! उम्मीद है कि आप भी मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को समझ कर उसके विरुद्ध वैसे ही ‘हिंदू वोटिंग पैटर्न’ पर कार्य करेंगे और प्रत्येक स्थिति में केवल और केवल भाजपा को ही अपना वोट प्रदान करेंगे। यदि आपने ऐसा न किया तो आने वाले समय में जैसे-जैसे आपकी जनसंख्या कम होती चली जाएगी वैसे-वैसे आपके वोट की अहमियत भी कम हो जाएगी। उसके बाद एक बार जैसे ही मुसलमानों के एकजुट वोट के दम पर इस्लामी पार्टियां सत्ता में आएंगी, आपकी सेकुलरिज़्म का भारत के अंदर भी ठीक उसी तरह से ‘इलाज’ किया जाएगा जिस तरह से पूर्व में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामी मुल्कों में किया गया था।

और हां, यह तो रही हिंदू मतदाताओं की बात लेकिन उनका वोट लेने वाली पार्टी भाजपा को भी अपनी कार्यविधियों पर चिंतन और मनन करने की अत्यंत ही आवश्यकता है। उसे भी राष्ट्रवादी हिंदू पक्ष का वोट लेकर राष्ट्रद्रोही आतंकवादी पक्ष का विकास नहीं करना होगा। उसके द्वारा ऐसा करना, अपने हिंदू-मतदाताओं के साथ विश्वासघात करना होगा। पूरी तरह से हिंदू वोटों के द्वारा चुनकर आने वाली भाजपा को केवल और केवल हिंदू-हितों के लिए ही कार्य करने हेतु चुना जाता है। यदि उसे इस्लामी और हिंदूद्रोही तबके का भी विकास करना है तो फिर हिंदुओं के लिए उसमें और अन्य पार्टियों के बीच में फ़र्क़ करने का आधार ही क्या बचा रह जाएगा?

शलोॐ…!

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