देवभूमि उत्तराखंड और हिमाचल में चल रहा है भूमि जिहाद

आज से 29 वर्ष पूर्व जब मै कश्मीर में आतंकवाद के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही का हिस्सा था । मुझे पाक-प्रशिक्षित कई आतंकवादियों के इंटेरोगेशन यानी पूछताछ करने का अवसर प्राप्त हुआ। कुछ याद नहीं की मैंने कितने आतंकवादियों का इंटेरोगेशन किया था । लेकिन एक आतंकवादी का इंटेरोगेशन इतना अधिक महत्वपूर्ण और कौतूहल पैदा करने वाला था । कि उसको मैंने अपनी पुस्तक “कश्मीर में आतंकवाद: आंखों देखा सच” में “प्रेम, पराजय और मोहभंग” नामक चैप्टर में लगभग 20 पृष्ठों में लिखा था । उस आतंकवादी ने पाकिस्तान में दिए जा रहे जिस प्रशिक्षण के विषय में बताया था । यह सब धीरे-धीरे करके अक्षरशः सत्य साबित हो रहे हैं । और हमारे सामने आ रहे हैं।
गजवा-ए-हिंद और दारुल-इस्लाम के विषय में अब अधिकतर भारतीय जागरूक हो चुके हैं । लेकिन बहुत कम लोगों को पता है । कि दारुल-इस्लाम और गजवा-ए-हिंद के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए “हिमालय का इस्लामीकरण” (Islamization of Himalayas) नामक भूमि और जनसंख्या जिहाद भी चल रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही इसके प्रति बिल्कुल उदासीन लगती है। जहां इसके लिए मूलतः कांग्रेस और हरीश रावत उत्तरदायी हैं । वहीं भाजपा के त्रिवेन्द्र रावत की भूमिका भी कुछ अच्छी नहीं रही है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 2018 में उस कानून से छेड़छाड़ की । जिसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो उत्तराखंड का मूलनिवासी नहीं है । उत्तराखंड में जमीन नहीं खरीद सकता । रावत के इस परिवर्तित कानून का दुष्परिणाम यह हुआ । कि देवभूमि उत्तराखंड का इस्लामीकरण और ईसाईकरण एक षड्यंत्र और योजनाबद्ध तरीके से बहुत तेजी से हो रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण राज्य हैं । क्योंकि पूरे हिमालयन रीजन में मात्र यही दो राज्य हैं । जो इस्लामीकरण और ईसाईकरण से बचे हुए हैं।
हिमालय पर्वत का 2400 किलोमीटर का विस्तार कई शृंखलाओं में बंटा हुआ है । जो पश्चिमोत्तर में हिंदूकुश पर्वत शृंखला (अफगानिस्तान) से शुरू होता है । और पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पूर्व में नागालैंड की पटकाई पर्वत श्रृंखला पर समाप्त हो जाता है। इसके सब-टरेनियन विस्तार (sub-terrainian parts) का कुछ हिस्सा तिब्बत और चीन के कब्जे में भी है। इस 2400 किलोमीटर के पूरे विस्तार में मात्र हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड दो ऐसे राज्य हैं । जो अभी भी अपने सनातनी और हिंदू चरित्र को बनाए रखे हुए हैं। हिमालय की पश्चिमोत्तर की अधिकतर बड़ी पर्वत शृंखलाएं जैसे हिंदूकुश (अफगानिस्तान), कराकोरम (पाकिस्तान/पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर) ज़ंसकर (पाक अधिकृत कश्मीर और लद्दाख) पीर पंजाल (भारत- जम्मू-कश्मीर) इत्यादि पहले से ही इस्लामिक हो चुकी हैं। एक समय में हिंदू-बौद्ध संस्कृति का केंद्र अफगानिस्तान अब पूरी तरह से एक इस्लामिक देश (Islamic Republic Afghanistan) अब 100% मुसलमानों का देश हो चुका है। जो थोड़े हिन्दू /सिख बचें थे । वर्तमान तालिबान शासन के शुरू होते ही वहां से खदेड़ दिए गए । या भयाक्रांत हो भाग लिए। कराकोरम पर्वत श्रृंखला जो पाकिस्तान/ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और भारत तक फैली है । पूरी तरह से इस्लामीकरण का शिकार हो चुकी। यहां तक कि भारत में भी हिमालय की गोद में बसा कश्मीर, कश्मीरी पंडितों के बहिष्करण (exodus) के बाद 97% मुसलमान आबादी का क्षेत्र बन गया है। कश्मीर और शेष भारत को अलग करने वाली पर्वत श्रृंखला “पीर पंजाल” का भी इस्लामीकरण हो चुका है।
पीर पंजाल के दक्षिण की तरफ से जम्मू क्षेत्र शुरू होता है । जहां हिंदू कुल मिलाकर किसी तरह बहुसंख्यक बने हुए हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अभी तक बाहरी लोगों के बसने पर प्रतिबंध लगा हुआ था/है। इन प्रतिबंधों के बावजूद उत्तराखंड और हिमाचल में मुसलमान बहुत तेजी से अनधिकृत रूप से बस रहे हैं। इनका बसाव मजदूर, रेडी पटरी वाले और दुकानदारों के आवरण के रूप में हो रहा है। अधिक आश्चर्य की बात यह है । कि इनमें से बहुसंख्य भारतीय मुसलमान नहीं है । बल्कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी हैं।
असम के मुख्यमंत्री,हेमंत विश्वा शर्मा सरकार के द्वारा असम में दबाव बनाने और अनधिकृत कब्जे वाली भूमि को रोहिंग्या और बांग्लादेशियों से खाली कराने के बाद काफी बांग्लादेशी घुसपैठिये मुसलमान हिमाचल और उत्तराखंड की पहाड़ियों की ओर रुख किए हुए हैं । सबसे दुखद बात यह है । कि यह हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर डेमोग्राफी (धार्मिक जनसंख्या) में बदलाव की दिशा में बढ़ रहे हैं। पहाड़ों में रोजगार कम होने के कारण अधिकतर पहाड़ी नौजवान मैदानी इलाकों में नौकरी की तलाश में चले आते हैं । और पीछे सिर्फ बूढ़े, महिलाएं और बच्चे छूट जाते हैं । ऐसी स्थिति जिहादियों के लिए बहुत ही अनुकूल होती है । क्योंकि ना सिर्फ उन्हें दुकान खोलने, मजदूरी करने और अन्य कार्यों को करने का अवसर मिल जाता है । बल्कि ऐसे में लव जिहाद के लिए भी मैदान खाली मिल जाता है। यह सब कुछ उत्तराखंड और हिमाचल में बहुत तेजी से हो रहा है। हिमाचल प्रदेश के ज्वाला देवी मंदिर के आसपास पहले कई किलोमीटर तक एक भी मुसलमान नहीं था । लेकिन आज वहां हजारों की संख्या में मंदिर के निकट काफी बड़ी संख्या में मुसलमान बस चुके हैं। यही स्थिति उत्तराखंड में हरिद्वार और नैनीताल की है । जहां एक समय एक भी मुसलमान नहीं था । और इन दोनों जगहों पर कोई भी मस्जिद नहीं थी । लेकिन आज स्थिति यह है । कि यहां पर मुसलमान भले ही कम हो । लेकिन मस्जिद बहुत तेजी से बन रही है। तारिक फतेह जी ने स्वयं एक वीडियो में बताया है । कि अभी कुछ वर्ष पूर्व जब वह नैनीताल गए थे । तो सुबह उन्हें बहुत ऊंचे वॉल्यूम में अजान सुनाई पड़ी । तारिक फतेह अपने होटल से उठकर उस मस्जिद तक गए । और देखा कि वहां सिर्फ 11 लोग नमाज पढ़ रहे थे। उन्होंने मौलवी से पूछा । कि यहां आस-पास कितने मुसलमान रहते हैं । तो उसने बताया कि जितने रहते यही हैं । तब तारेक फतह ने प्रश्न किया कि जब कुल 11 लोग ही हैं । तो इतनी ऊंची आवाज में अजान देने की आवश्यकता क्या है ? स्पष्ट है अजान नमाजियों को बुलाने के लिए नहीं बल्कि अपना डोमिनेंस यानी आधिपत्य स्थापित करने के लिए इतने ऊंचे वाल्यूम में पढ़ी जाती है।
हिमालय के इस्लामीकरण का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है । कि जो हमारे पवित्र स्थान हैं । जैसे रूद्र प्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग इत्यादि इन स्थानों पर भी मांस का विक्रय प्रारंभ हो गया है। आवश्यक नहीं कि यह गाय का ही मांस हो । लेकिन जो हिंदू धर्म स्थलों की पवित्रता है । वह नष्ट होती जा रही है। नेपाल में भी यही दशा है। “हिन्दू राष्ट्र” का संवैधानिक दर्जा हटने के बाद वहां भी ईसाई और इस्लामी करण बहुत तेजी से हो रहा है। बात यह है कि यह सब स्वाभाविक नहीं बल्कि योजना बद्ध और वाह्यारोपित (induced) है।
हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । कि हमारे देश के नेताओं को भूगोल का महत्व नहीं पता है। उन्हें पता नहीं कि “जिनका भूगोल नहीं उनका न तो इतिहास होता है न ही भविष्य”। नेहरू ने चीन को प्लेट पर रख कर के तिब्बत दे दिया। ना सिर्फ हमारे बहुत से पवित्र स्थल जैसे मानसरोवर आज चीन के कब्जे में है । बल्कि हमारी अधिकतर नदियों का उद्गम स्थल भी चीन के कब्जे में है । और चीन उस पर बड़े-बड़े बांध बनाकर भारत के लिए “जल प्रलय” की स्थिति पैदा कर रहा है। हमें यह समझना होगा । कि पहाड़ों पर जो लोग बसे हुए हैं । उनका बहुत अधिक महत्व है। उत्तराखंड से ही हमारे देश की अनेक पवित्र और प्रमुख नदियां निकलती है । जिसमें गंगा और यमुना भी शामिल हैं। उत्तराखंड को देव भूमि कहा जाता है । और हरिद्वार उसका प्रवेश द्वार है । लेकिन जिस तरह से षड्यंत्र के तहत देव भूमि का इस्लामीकरण हो रहा है । वह सनातन धर्म और देश के लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी है।
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देवेंद्र सिंह आर्य

लेखक उगता भारत समाचार पत्र के चेयरमैन हैं।

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