सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा श्रीराम, अध्याय – 14 ( ख ) सिंहावलोकन

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सिंहावलोकन

    राजनैतिक विचारक एंथोनी डी. स्मिथ ने राष्ट्र को कुछ इस तरह परिभाषित किया है, ‘मानव समुदाय जिनकी अपनी मातृभूमि हो, जिनकी समान गाथाएं और इतिहास एक जैसा हो, समान संस्कृति हो, अर्थव्यवस्था एक हो और सभी सदस्यों के अधिकार व कर्तव्य समान हों।’
         यदि एंथोनी के इस कथन पर विचार किया जाए तो भारत के आर्य / हिंदू लोग ही संसार में एकमात्र ऐसे राष्ट्र के निवासी हैं जिनकी अपनी मातृभूमि है, जिनकी अपनी समान गाथाएं हैं,  जिनका अपना गौरवपूर्ण इतिहास है, जिनकी संस्कृति समान है अर्थव्यवस्था एक है और सभी सदस्यों के अधिकार और कर्तव्य भी जहां समान हैं। जब भारत के वर्णाश्रम धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्य कर्म पहचाने ,समझे और पढ़े जाते हैं तो पता चलता है कि वह सारे के सारे कर्तव्य कर्म एक दूसरे का सम्मान बढ़ाने और एक दूसरे के अधिकारों की रक्षा के लिए निर्धारित किए गए हैं। इसी को आप भारत की धार्मिक व्यवस्था कह सकते हैं। हमारा धर्म हमें एक दूसरे के प्रति समर्पण के भाव से देखने के लिए प्रेरित करता है। हम एक दूसरे के विकास में सहयोगी होते हैं ना कि विनाश में । जो लोग स्वाभाविक रूप से इस धार्मिक व्यवस्था का पालन करते हैं, उन्हें ‘धार्मिक जन’ कहा जा सकता है । इन धार्मिक जनों को ही राष्ट्र की व्यवस्था में विश्वास रखकर चलने वाले सभ्य जन या नागरिक कहा जा सकता है।

श्रद्धा , समर्पण धर्म से मिलते हैं भरपूर।
मन कोमल रहता सदा पाप से भागे दूर।।

     आर्य वही हो सकता है जो सभ्य हो, विद्वान हो और धार्मिक हो। इस प्रकार धर्म और धार्मिक व्यवस्था ये दोनों ही राष्ट्र का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत ने अपने इसी वर्णाश्रम धर्म के कर्तव्य कर्मों को अपनाकर संसार को एक ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक विरासत प्रदान की जिस पर संपूर्ण विश्व गर्व और गौरव कर सकता है। इस प्रकार भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की सीमाओं तक बंधा हुआ नहीं है। भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तो संपूर्ण भूमंडल के निवासियों और प्राणीमात्र के लिए है। इतना ही नहीं, वनस्पति जगत के लिए भी इसमें ऐसी व्यवस्था की गई है जिससे चराचर जगत सब एक साथ मस्ती के संगीत में नाचता हुआ दिखाई देता है।
     भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मस्ती वह सोमरस है जिसे पीकर हमारे ऋषिगण मस्त हो जाया करते थे। यह वही सोमरस है जिसे पीकर हमारे क्रांतिकारियों ने देश की आजादी की जंग लड़ी और विदेशियों को अपनी मातृभूमि से खदेड़ कर ही दम लिया। यह वही सोमरस है जो हमें एक दूसरे के प्रति आत्मीय भाव से समर्पित होकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में जहां ऋषियों की आध्यात्मिक क्रांति अंतर्निहित है वहीं राष्ट्रीय स्वराज्य की अवधारणा को विकसित करने की राजनीतिक क्रांति भी समाविष्ट है। यह भौतिकवाद और अध्यात्मवाद दोनों का सम्मिश्रण है। इस पवित्र सम्मिश्रण ने ही हमारी समन्वित सामासिक संस्कृति का निर्माण किया है।
      राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी ने राष्ट्र-जन के विभिन्न घटकों का उल्लेख किया है: “समान इतिहास, समान पंरपरा, शत्रु-मित्रता का भाव समान, भविष्य की आकांक्षा समान ऐसी भूमि का पुत्र संबंध समाज राष्ट्र कहलाता है।”
  वास्तव में भारत में राष्ट्र की यह परिभाषा प्राचीन काल से रही है। हमने धरती को माता कहा है और अपने आपको उसका पुत्र कहलाने में गौरव की अनुभूति की है। जब- जब भारत माता पर किसी भी प्रकार का संकट आया है तब -तब हमने उसके लिए अपना प्राणोत्सर्ग करने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं किया। यही हमारा तेजस्वी राष्ट्रवाद है। यही हमारा गौरवमयी राष्ट्रधर्म है। यही हमारा राष्ट्र रक्षा का सर्वोत्कृष्ट भाव है। हमारे इसी भाव से तेजस्वी राष्ट्रवाद की लौ प्रज्ज्वलित होती है, जो हम सबको समान रूप से अपने प्रकाश से नहला देती है। इस तेजस्वी राष्ट्रवाद की रोशनी से नहाते हुए हम सब एक जैसी गौरवमयी भावना से प्रेरित होते हैं। इसी को संस्कृति बोध कहते हैं।

राष्ट्र बने तेजोमयी – है यही धर्म का सार।
तेज के पूजक जन रहें हो भव से बेड़ा पार।।

  भारत ने संसार को आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की अवधारणा अपने प्राचीन ऋषियों – अग्नि, वायु ,आदित्य ,अंगिरा के माध्यम से प्रदान की। हमारा यह आध्यात्मिक राष्ट्रवाद हमारी सांस्कृतिक चेतना का वह मूल बिंदु है जो हमें आंतरिक जगत से पवित्र निर्मल और स्वच्छ किए रखता है। हमारे अंदर एक दूसरे के प्रति तनिक भी वैर भाव को पनपने नहीं देता। इस आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की पवित्र भावना ने ही हम सब राष्ट्रजनों को ‘आर्य’ शब्द दिया। आर्य अर्थात जो वैर विरोध में विश्वास नहीं करता।
जिस राष्ट्र के जन अथवा निवासी स्वाभाविक रूप से एक दूसरे से वैर विरोध में विश्वास नहीं रखते, और स्वाभाविक रूप से प्रेम प्रीति के साथ रहने के अभ्यासी होते हैं वही राष्ट्र विश्व गुरु हो सकता है। जब रामचंद्र जी अपने काल में संस्कृतिनाशकों का विनाश कर रहे थे तो वह हमारे राष्ट्र के इन सभी पवित्र मूल्यों की रक्षा के लिए ही ऐसा कर रहे थे।
       यह सर्वमान्य सत्य है कि संसार में मानव समाज के लिए आध्यात्मिक चेतना बहुत दूर तक अर्थात जब तक यह सृष्टि कार्य करती रहेगी तब तक के लिए अपना कार्य करती रहेगी। हमारा मानना है कि आध्यात्मिक चेतना एक ऐसी मिसाइल है जो सृष्टि के आदि से अन्त तक की दूरी की मारक क्षमता रखती है अर्थात सृष्टि के आदि से अंत तक के बीच की दूरी को नाप सकती है । यद्यपि उसकी यह मारक क्षमता संहारकारी नहीं होती, इसके विपरीत वह सृजनात्मक शक्तियों से भरपूर होती है। संसार में जितने भर भी प्राणी हैं वे सभी किसी एक ही पिता की संतानें हैं – यह भी एक सांस्कृतिक मूल्य है। वे सब परस्पर प्रेम भाव से रहें , यह भी एक सांस्कृतिक मूल्य है। पर वे सब एक ही पिता की संताने हैं और उन्हें परस्पर प्रेम भाव से रहना चाहिए – इस दिव्य भाव को जगाने वाला तत्व आध्यात्मिक चेतना है।
इस मूल्य की रक्षा प्रत्येक वह संवेदनशील और गंभीर व्यक्ति करना अपना धर्म समझता है जो यह मानता है कि प्रत्येक प्राणी एक ही परम पिता परमेश्वर की संतान है।
    बस, भारत का सांस्कृतिक राष्ट्र भी इसी अवधारणा पर खड़ा हुआ है कि परमपिता परमेश्वर की प्रत्येक संतान की रक्षा करना प्रत्येक संवेदनशील और गंभीर व्यक्ति का पुनीत कर्तव्य है। जो लोग संसार में आकर उस परमपिता परमेश्वर की संतानों के अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं या हनन करते हैं, उनको स्वयं ही जीने का कोई अधिकार नहीं रहता। ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक ऐसे व्यक्ति का क्षत्रियों या शासक वर्ग के द्वारा विनाश करना भी एक पवित्र कार्य है जो परमपिता परमेश्वर की व्यवस्था में विश्वास रखकर जीने वाली उसकी संतानों के अधिकारों का अतिक्रमण या हनन करते हैं।

अत्याचारी दुष्ट जन जो पाप करें दिन-रात।
शासक को अधिकार है उनका करे विनाश।।

  ऐसे में हम जब भारत के किसी महापुरुष का आंकलन या मूल्यांकन करते हैं तो यह देखते हैं कि उसने भारत की संस्कृति के इन दोनों मूल्यों की रक्षा के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाया ? उनका कितना पालन किया और कितना नहीं ? यदि किसी व्यक्ति ने इन दोनों मूल्यों का यथावत और सही संदर्भ में पालन नहीं किया है तो उसे भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा में किसी भी दृष्टिकोण से महापुरुष नहीं माना जा सकता। जिसने इन दोनों सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्प लिया और उसे जीवन भर निभाते रहने का भी महान कार्य किया हम उसे ही महापुरुष मानते हैं। यदि इसी बात को श्री राम के जीवन के संदर्भ में देखें तो उन्होंने तो जीवन में पग-पग पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए महान कार्य किया। इसलिए वह तो महापुरुष से भी आगे बढ़कर हमारे लिए भगवान बन गए।
   सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पवित्र भावना के उन्नायक भारत के विषय में ‘विष्णु पुराण’ में कहा गया है :-

उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे चैव दक्षिणम्
वर्षम् तद् भारत नाम भारती यत्र संतति।
आसिन्धु सिन्धु पर्यन्ता: यस्य भारत भूमिका
पितृभु: पुण्यभूश्चेव स वै हिन्दुरिति स्मृत:।।

जो समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में स्थित है, उसका नाम भारत है और भारतीय उसकी संतान हैं। हिमालय से लेकर समुद्र तक जो भारत भूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्य भूमि समझता है , वही हिंदू है।
हमारा मानना है कि जिस व्यक्ति का भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में विश्वास है और जो उसके प्रति पूर्णतया समर्पित और निष्ठावान है, वह मूल रूप में आर्य संस्कृति का उपासक है। क्योंकि वह भारत भूमि को धरती का मात्र एक टुकड़ा नहीं मानता। वह भारत भूमि के प्रति आत्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अपने आपको जुड़ा हुआ अनुभव करता है। वह ‘धरतीपुत्र’ है । क्योंकि वह धरती को अपनी माता मानकर उसके प्रति श्रद्धा और सम्मान के भाव से भरा हुआ है। धरती को अपनी माता मानने से वह संसार में खून खराबा करना उचित नहीं मानता । वह धरती के प्रत्येक प्राणी के भीतर उसी आध्यात्मिक चेतना को देखता है जो स्वयं उसके भीतर है।
     वह स्वयं आर्य है और सारे संसार को आर्य बनाने के लिए संकल्पित है। हिंदू इसी आर्य का उत्तराधिकारी है। इस प्रकार हिंदू सत्य सनातन वैदिक संस्कृति का सबसे उत्तम प्रहरी सिद्ध होता है। जो उसके गहरे ज्ञान सागर में गोता खा-खाकर राष्ट्रवाद के मोतियों को चुनता है।
     इस प्रकार हिंदू वह है जो सत्य सनातन वैदिक धर्म के मौलिक स्वरूप में आस्था रखता है और उसी के प्रति निष्ठावान होकर जीवन जीने में आनंद अनुभव करता है।

जो सत्य सनातन धर्म में नित रखता विश्वास।
वही सनातन हिंदू है पाखंड का करे विनाश।।

हिंदू से अलग भारत भूमि किसी अन्य की ‘पितृभूमि’ और ‘पुण्य भूमि’ हो भी नहीं सकती । इसका कारण यह है कि हिंदू से अलग किसी अन्य मजहब को मानने वाले लोग भारत भूमि के प्रति वह सम्मान भाव नहीं रखते जो हिंदू रखता है, अर्थात मां बेटे का रिश्ता बनाना उनकी दृष्टि में हेय है। भारत भूमि को पवित्र माता मानना पत्थर पूजा नहीं है। यह तो अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक सर्वोत्तम माध्यम है। कृतज्ञता ज्ञापित करना भी हर किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के वश की बात नहीं है। जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र आध्यात्मिक चेतना के एक ही मूल स्रोत से जुड़े होते हैं और जो उसके संगीत की मधुर ध्वनि को अपने भीतर गुंजित अनुभव करते हैं, वही इस बात की अनुभूति करते हैं कि जिस धरती पर खड़े होकर वह ऐसा अनुभव कर रहे हैं- वह उनकी माता है।
     यद्यपि यहां पर पुराणकार ने देश -काल – परिस्थिति के अनुसार किसी ऐसे व्यक्ति को भी हिंदू मान लिया है जो अपना मतान्तरण करने के पश्चात किसी अन्य मत में चला गया है ,परंतु इसके उपरांत भी वह भारत भूमि को अपनी पुण्य- भूमि और पितृ भूमि हृदय से स्वीकार करता है। हम भी ऐसा मान लेते हैं कि जो व्यक्ति भारत भूमि को अपनी पुण्य -भूमि और पितृभूमि मानता है, वह हिंदू है । अब चाहे वह किसी भी मजहब, पूजा पद्धति या संप्रदाय को मानने वाला ही क्यों ना हो ?
हमारा यह भी मानना है कि हिंदू वही व्यक्ति हो सकता है जो भारत के प्राचीन गौरव में विश्वास रखता है । जो वृहत्तर भारत  को अपना देश मानता है ।  जिसके हृदय में वृहत्तर भारत की तस्वीर रहती है और जो अखंड भारत के निर्माण का शिवसंकल्प  धारण करके चलता है , जो अपने महान पूर्वजों की संतान होने पर गर्व और गौरव की अनुभूति करता है। जो अपने धर्म पर इतराता है, अपनी संस्कृति पर इठलाता है। जो भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने के लिए कार्य करता है – वह हिन्दू है।
हिंदू वह भी है जो धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, अपरिग्रह, धी: , विद्या, सत्य और अक्रोध में विश्वास रखता है। जो अहिंसा को जीवन का भूषण मानता है। हिंदू वह भी है जो भारत के चार वर्णों की व्यवस्था और उनके धर्म का पालन करना अपने लिए अनिवार्य मानता है। हिंदू वह भी है जो 16 संस्कारों को जीवन का आधार मानकर चलता है और हिंदू वह भी है जो अष्टांग योग के माध्यम से जीवन को मोक्ष तक ले जाने की पगडंडी का निर्माण करता है।

अतीत गौरवमय रहा वर्तमान जिसके हाथ में ।
भविष्य उज्जवल भी रहेगा शाम में प्रभात में।।

जो पितृ-भूमि पुण्य-भूमि मानता निज देश को।
हिंदू सदा कहते उसे – अपनाये किसी वेश को ।।

मजहब पूजा पद्धति जिसको ना हिला सकती कभी।
तलवार मजहब की जिसे नहीं रुला सकती कभी।।

निज पूर्वजों के देश का सम्मान दिल से जो करे।
सदा हिंदू के हृदय में ही ऐसे भाव भक्ति के भरे ।।

जो अखंड भारत की साधना करता रहे दिन रात ही ।
जो दिव्य भारत की मूर्ति को रखता है अपने साथ ही।।

रखकर वेद में विश्वास उनका करता रहे प्रचार भी ।
‘आर्य’ हिंदू है वही जो योग का करता रहे प्रसार भी।।

       उपरोक्त श्लोक में अप्रत्यक्ष रूप से रामचंद्र जी जैसे हमारे सभी महान पूर्वजों को पुराणकार ने नमन किया है और उनके उन महान कार्यों का अभिनंदन किया है जिनके द्वारा भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का निर्माण हुआ है। तभी तो पुराणकार ने यह स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति अपने महान पूर्वजों के प्रति आस्थावान होकर इस भारत भूमि को अपने पूर्वजों की पवित्र भूमि मानता है, वही हिंदू है। भारत की भूमि पुण्यभूमि इसलिए नहीं है कि यहां बहुत अच्छी हवा और बहुत अच्छा पानी उपलब्ध है बल्कि इसलिए पुण्य भूमि है कि यहां पर अनेकों महान ऋषियों ने तप किया है। उनके तप और साधना ने भारत भूमि को पुण्य भूमि बनाया है। उनकी संतान के रूप में हमें अपनी इस पुण्य भूमि का ऋणी होना चाहिए। जिस पर हमें जन्म लेने का सौभाग्य मिला है। इस पुण्य भूमि की पावन रज में खेलकर अनेकों ऐसे क्षत्रिय महारथी बड़े हुए हैं जिन्होंने अपने महान कार्यों की सुगंध संपूर्ण भूमंडल पर बिखेरी है। उन सभी तपस्वी क्षत्रियों के शिरोमणि श्री राम हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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