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इतिहास के पन्नों से

आइए जानें, कश्मीर का रोमांचकारी इतिहास

शिबन कृष्ण रैणा

कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर का इतिहास गोनन्द-२ नाम के राजा से प्रारम्भ किया हैI यह वह समय है जब पाण्डवों के राजा युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ था। गोनन्द-२ मगध के राजा जरासंघ का निकट-सम्बन्धी था।यमुना तट पर जब श्रीकृष्ण के साथ जरासंघ ने युद्ध किया, तो इसमें गोनन्द-२ ने भी भाग ले लिया था। गोनन्द-२ के पश्चात उनके पुत्र दामोदर ने कश्मीर का शासन संभाला।कल्हण के अनुसार दामोदर के पश्चात ३५ राजाओं ने कश्मीर पर शासन किया मगर इनके सम्बन्ध में आज तक किसी भी इतिहासकार को कोई प्रमाणिक सामग्री प्राप्त नही हुई है।विश्वास किया जाता है कि इनका सम्बन्ध पाण्डवों की वंश परम्परा से रहा होगा कयोंकि कश्मीर में पाण्डवों के बहुत से खंडहर प्राप्त हुए हैं। कल्हण ने अपनी कृति में ऐसे केवल आठ राजाओं का उल्लेख अनुमान के आधार पर किया है। इनके नाम हैं लव,कुश, खाजेन्द्र, सुरेन्द्र, गोधारा, सुवर्ण, जनक और शचीनार। बडशाह के राजत्वकाल में इन अज्ञात राजाओं पर शोध के बाद श्रीवर ने ‘जैन-राजतरंगिणी’ में केवल तीन ऐसे राजाओं का उल्लेख किया है। इनके नाम हैं हरणदेव, भीमसेन तथा संदिमान। इनमें से अन्तिम के नाम पर ’संदिमाननगर’ बसा हुआ था ।कहा जाता है कि इन्होंने अपने राज्य का विस्तार गांधार से कनौज तक किया था।
भारत के समकालीन ऐतिहासिक तथ्यों से हमें जिन राजाओं की सही जानकारी प्राप्त होती है, उनमें मगध के सम्राट अशोक का नाम सर्वोपरि है ।चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने कश्मीर में बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए पांच हजार बौद्ध-भिक्षु भेजे थे।अशोक को श्रीनगर की राजधानी ‘पुराणादिष्ठान:’ (वर्तमान पांद्रेठन) बसाने का श्रेय प्राप्त है। इनके राजत्वकाल में यहां ६६ हजार मकान थे ।बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए इन्होंने यहां कई बौद्ध-विहारों का निर्माण किया था। बौद्ध-धर्म के वे प्रशंसक थे। कहा जाता है कि वे वर्ष में एक बार हरमुकट गंगा जाकर भगवान शिव की पूजा करते थे। इन्होंने विजेश्वर (वर्तमान बिजबिहारा) में दो भव्य मंदिरों का निर्माण कर इन्हें भगवान् शिव को समर्पित किया था। इस समय स्मृतिस्वरूप पुराणा दिष्ठान: में इनका बनाया एक जीर्णप्राय बौद्धविहार विधमान है।

५ वीं शती में हूण आक्रान्ताओं ने उत्तरी-भारत पर आक्रमण किया। इनमें मिहिरकुल का नाम सर्वोपरि है ।इन्होंने पीरपांचाल दर्रे को पार करके कश्मीर-घाटी में प्रवेश किया। दरअसल, तोरमाण भारत वर्ष पर आक्रमण करने वाला चीन से आने वाले हूणों का नेता था जिसने 500 ई के लगभग मालवा पर अधिकार किया था। मिहिरकुल तोरमाण का ही पुत्र था, जिसने हूण साम्राज्य का विस्तार अफ़ग़ानिस्तान तक किया। तोरमाण ने कई विजय अभियान किये थे, एक बड़े विस्तृत भू-भाग पर अपना साम्राज्य स्थापित किया था। अपनी विजयों के बाद उसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की थी। भारत के काफ़ी बड़े क्षेत्रफल पर उसने अपनी विजय पताकाएँ फहराई थीं जिसमें कश्मीर भी शामिल था।उसका प्रभुत्व सम्भवत: मध्यप्रदेश की पहाड़ियों तथा मध्य भारत तक व्याप्त था। बहुत बड़ी संख्या में तोरमाण के चाँदी के सिक्के बरामद हुए हैं। इनके राजत्वकाल में कश्मीर की राजधानी सकाला (वर्तमान स्यालकोट) थीं ।ये एक निर्दयी राजा हुए हैं। इन्होंने कई बौद्ध-भिक्षुओं को निरपराध मार डाला। बौद्ध विहार और स्तूप नष्ट करवाए ।इनके स्थान पर मंदिरों का निर्माण कराया। कहा जाता है, एक बार इन्होंने पीर-पंचाल से एक हाथी को गिरते हुए देखा ।उसकी चिंघाड़ को सुनकर वे इतने खुश हुए कि इन्होंने उसी समय अपने मनोरंजन के लिए एक सौ हाथियों को उसी स्थान से गिराने का आदेश दे दिया। इसके बाद उनके पुत्र ने कश्मीर का शासन संभाला। ये बड़े कृपालु राजा हुए हैं। इन्होंने अपने पिता के प्रति जनता की कटु-स्मृतियों को दया एवं सौहार्द में परिवर्तित किया। इसी वंशपरंपरा के अन्य पांच राज हुए हैं-सीतानंद, वसुनन्द, नारा, अशोक तथा प्रतापदित्य। इनमेंसे अंतिम का एक पुत्र जलौक तथा पौत्र तुंजीन था। इनकी शासनावधि में कश्मीर की ललितकलाओं का अभूतपूर्व विकास हुआ।
राजतरंगिणी में ऐसे कई राजाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने जनता की काफी सेवा की है ।इनमें गोपादित्य के पुत्र मेघवाहन का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने असम के राजा की पुत्री अमृतप्रभा के साथ विवाह किया था। उसने एक पुत्र को जन्म दे दिया जिसका नाम श्रेष्ठसेन था।उसके दो पुत्र हुए।एक का नाम था तनुजा तथा दूसरे का प्रवरसेन ।ये दोनों कार्यकुशल राजा थे। तनुजा के दो पुत्र थे, तोरमान और हिरण्य ।इनमे से पहले तोरमान ने कश्मीर का शासन संभाला ।तोरमान का जो लड़का हुआ, वह अपने चाचा के नाम पर प्रवरसेन-१ कहलाया। प्रवरसेन-१ कारकोट वंश परम्परा से सम्बन्ध रखते थे। अपने पूर्वजों का राज वापस लेने के उद्देश्य से इन्होंने मातृगुप्त के विरुद्ध कांगड़ा में सेना इकट्ठी की। बाद में इन्होंने कश्मीर राज्य का विस्तार भारत के उत्तरी सीमाओं तक किया।
कश्मीर-इतिहास में कारकोट वंशीय राजाओं की शासनावधि स्वर्ण-युग के नाम से अभिहित की जाती हैं। इस वंश परम्परा का शासन ६ वीं शती से शुरु होकर ८ वीं शती के मध्य तक स्थिर रहता है। इस वंश परम्परा से सम्बंधित जो लोकप्रिय राजा हुए हैं, उनमें चन्द्रपीड, ललितादिव्य मुक्तापीड, जयपीड तथा सुखवर्मन का नाम उल्लेखनीय है। चन्द्रपीड वीर एवं साहसी राजा थे ।कहा जाता है, उस समय चीन का राजा भी उनका नाम लेते डर जाता था। परन्तु सारे भारत में कारकोट वंश के यशकीर्ति की किरण प्रज्जवलित करने का श्रेय ललितादिव्य मुक्तापीड़ा को प्राप्त है।कश्मीर-इतिहास में इनको सर्वोच्च स्थान प्राप्त है ।अपने राजत्वकाल में इन्होंने सेना को पंजाब, गुजरात, मालवा, कठियाबाड तथा मेवाड तक तथा दूसरी ओर बिहार तथा बंगाल तक भेजा था। इसके अतिरिक्त इन्होंने कश्मीर राज्य का विस्तार तिब्बत और बद्खंशा तक किया ।कश्मीर-घाटी के नवनिर्माण में इनका अनुपमेय योग रहा है ।मटन में मार्तंड मंदिर का निर्माण तथा परिहासपुर (वर्तमान शादीपुर) का बसाना इन्हीं की देन है। कल्हण के अनुसार ललितादित्य ने यहाँ अपना निवास और चार मंदिरों का निर्माण कराया था। इन में से एक विष्णु मुक्तकेशव को समर्पित था, जिसमें 84.000 तोले सोने की प्रतिमा स्थापित की गई थी। इसी तरह के एक मंदिर में चांदी की एक प्रतिमा थी। उन्होंने एक भगवान बुद्ध की तांबे की प्रतिमा बनवाई जो “आकाश को छूती थी”।
ललितादित्य को हिन्दू-धर्म पर अविचल विश्वास था, परन्तु साथ ही साथ बौद्ध-धर्म पर भी श्रद्धा रखते थे। यही कारण है कि इन्होंने बौद्धों के भी कई विहार बनाये जिनमे उष्कर का बौद्ध-विहार उल्लेखनीय है।कलापरखी और विद्वान होने के कारण इनके शाही दरबार में कई विद्वान और कला प्रेमी मौजूद रहते थे।
कारकोट वंश के राजाओं के अवसान के बाद अवन्ति वर्मन ने यहां उत्पल वंश की स्थापना की।ये अवन्तिपुर नगर के निर्माता थे। इनके राजमहल में आनन्द वर्द्धन तथा रत्नाकर जैसे विद्वान मौजूद रहते थे।प्रसिद्ध इंजिनियर सुया, जिन्होंने कश्मीर को बाढ़ के आतंक से बचाने के लिए वितस्ता के तटों पर कई बांध बनाये, इनका एक दरबारी इंजिनियर था।वर्तमान सोपुर कस्बा सूया के ही नाम पर बसा हुआ है। अवन्ति वर्मन के पुत्र शंकर वर्मन भी एक सकुशल प्रशासक, राजनीतिक और सफल योद्धा थे।कहा जाता है, इनके पास ६ लाख से अधिक सेना थी।अपने राजत्वकाल में झेलम और चिनाब का मध्य क्षेत्र पुन: जीत लिया। यह सारा क्षेत्र कारकोट राजाओं के राजत्वकाल में विदेशियों ने अपने अधिकार में कर लिया था। इसके पश्चात ३४ वर्षों की कालावधि में लगभग दस उत्पल वंशीय राजाओं ने कश्मीर का शासन संभाला जिनमें शंकर वर्मन की पत्नी भी एक थीं।इसी कड़ी के अन्तिम राजा क्षेमगुप्त का उल्लेख भी मिलता है जो विलासी स्वभाव के थे।
क्षेमगुप्त के निधन के बाद उनके बेटे अभिमन्यु ने कश्मीर का शासन संभाला। मगर शासन की असली भागदौर उसकी माता दिद्दा के हाथों में थी।दिद्दा बहुत सुन्दर थी, लेकिन एक टांग से लंगड़ी थी। कश्मीर का शासन अन्तिम रूप से सँभालने की इच्छा से उसने अपने दो पौत्रों त्रिभुवन और भीमगुप्त का वध करवाया।दिद्दा लोहार वंश से सम्बन्ध रखती थीं।अपने राजत्वकाल में वह तुंग नामक एक चरवाहा से प्रेम करने लगी जिसको बाद में उसने कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया।अपना कोई सन्तान न होने के कारण उसने भाई के पुत्र संग्राम राज को कश्मीर का राजकुमार बनाया।वह एक सकुशल शासिका थीं।उसने ‘दिद्दमठ’ (वर्तमान दिद्दमर) का निर्माण किया।इसे लोग लंगड़ी और चुड़ैल रानी कहते थे, परंतु वह बहुत ही बहादुर और सुंदर थी। उसके चर्चे संपूर्ण भारत में थे।
प्राचीन संस्कृत कल्हण ने कश्मीर के इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिला शासक दिद्दा का उल्लेख किया है। कहते हैं कश्मीर के राजा क्षेमेन्द्र गुप्त एक बार आखेट पर निकले और उन्होंने एक बहुत खूबसूरत लड़की को देखा और वे उसे दिल दे बैठे, परंतु वह लड़की अपंग/लंगड़ी थी। राजा ने फिर भी उससे विवाह किया।लोहार राजवंश रानी दिद्दा बचपन में ही युद्ध कला में पारंगत हो गई थी और वह तरह-तरह के खेलों में भी निपुण थी। राजा क्षेमेन्द्र गुप्त ने जब पहली बार उसे देखा तो उसकी खूबसूरती पर मोहित होकर उससे विवाह कर लिया। बाद में रानी ने राजकाज में भी भागीदारी निभानी शुरू कर दी।दिद्दा बहुत ही तीक्ष्णबुद्धि वाली महिला थी और वह तथा उसके सैनिक गुरिल्ला युद्ध करना जानते थे। रानी बहुत ही चालाकी से जंग लड़ती थी इसीलिए उसे लंगड़ी रानी और चुड़ैल रानी भी कहा जाता था।मान्यता है कि जब कई राजा-महाराजा दिद्दा से हार गए तो उन्होंने अपनी शर्म को छुपाने के लिए दिद्दा को चुड़ैल कहना शुरू कर दिया जिसके चलते वह चुड़ैल रानी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।यह भी मान्यता है कि जब दिद्दा के पति क्षेमेन्द्र गुप्त की मृत्यु हुई तो सत्ता हासिल करने के लिए उसके शत्रुओं ने उसे सती प्रथा का हवाला देकर सती करवाना चाहा परंतु दिद्दा बहुत ही चतुर थी उसने अपनी नीति के चलते क्षेमेन्द्र गुप्ता की पहली पत्नी को सती करवा दिया और अपनी शर्तों के बल पर राजगद्दी पर ताकतवर महिला बनकर बैठ गई और उसने लगभग 50 वर्षों राज किया।
संग्राम्राज के बाद जिन राजाओं ने कश्मीर का राजपाठ संभाला उनमें हर्ष का नाम उल्लेखनीय है।हर्ष एक सकुशल प्रशासक होने के साथ-साथ कलाप्रेमी और एक कवि भी थे। इनके दरबार में विद्वानों, कवियों एवं संगीतज्ञों की चहल-पहल हर समय समय रहती थीं। कश्मीरी संगीत में कर्नाटक-संगीत की शैलियों का सम्मिश्रण करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त है। इन्ही के राजत्वकाल में कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की है। अपने राजत्वकाल के अंतिम दिनों में डामर कबीले के सरदारों ने उससे सत्ता छीनने की कोशिश की, परन्तु हर्ष ने इनको अपने पुरे युद्ध-कौशल से हराया। मगर दुर्भाग्य से ऐसे हमले बार-बार होते रहे।अन्त में हर्ष की सेना को मुँह की खानी पड़ी। इनका राजमहल नष्ट कर दिया गया।देश में अशांति फैल गयी।अन्त में जब इन्होंने कश्मीर से बाहर भागने की कोशिश की तो इनका वध कर दिया गया। इसके बाद डामर कबीले के सरदारों ने सत्ता अपने हाथों में ले ली। इन सरदारों में मुख्य थे उचल और ससुला इन दोनों ने लगभग २० वर्षों तक कश्मीर पर अपना एकाधिकार स्थापित किया।इसी बीच हर्ष के पौत्र भीक्षचार्य ने उनसे सत्ता हथियाने के कई प्रयत्न किये, परन्तु इनके सारे प्रयास असफल रहे।
कश्मीर में हिन्दू शासन के अन्तिम राजा जयसिंह हुए हैं।यह ससुल का पुत्र था। यद्दपि इनके बाद उपाध्याय, रामदेव आदि नरेशों ने कश्मीर का राजपाठ संभाला है, परन्तु इनके शासन-काल का तिथि निश्चित नही है।इनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि कजाला नामक किसी तुर्की आक्रान्ता ने इन्हें मार डाला है।
जयसिंह की मृत्यु के बाद, कश्मीर की राजनीतिक स्थिति शान्ति पूर्ण नहीं रही।अब से लगभग दो शतियों तक किसी भी राजा ने स्थायी रूप से यहां का शासन नहीं संभाला। इसी कालावधि में उत्तरीय क्षेत्रों से आये कई मुसलमान आक्रान्ताओं ने कश्मीर पर अपने एकाधिकार स्थापित करने के प्रयत्न किये, किन्तु दुर्गम पहाड़ी रास्तों के कारण वे यहां प्रवेश नही कर पाये। लेकिन राजा सहदेव की गलत राजनीतिक नीतियों के कारण अब कश्मीर में विदेशियों का प्रवेश करना असंभव नहीं रहा। आखिर वह समय भी आया जब दिल्चू नामक एक विदेशी आक्रान्ता ने कश्मीर पर आक्रमण किया।अब्बुल फजल के अनुसार ये चंगेज खां के वंशज तथा कंधार के राजा के सेनाध्यक्ष थे। इधर स्वात के शाहमीर, तिब्बत के रेंचनशाह तथा दर्दिस्तान के लंकर चक्र यहां शरणार्थी बनकर आये।बाद में ये सहदेव के शाही दरबार में उच्च पदों पर बने रहे।दिल्चू आक्रान्ता के आक्रमण से सत्रस्त,सहदेव कश्मीर छोड़कर किशवाड़ चले आये। कश्मीर में इनके प्रधानमंत्री रामचंद्र की बेटी कोटा रानी ने शासन संभाला। इसने पर्शिया से आये उचल आक्रान्ता को कश्मीर से बाहर खदेड़ दिया। माना जाता है कि इसके लिए इसने रेंचनशाह से सहायता मांगी।बाद में इसने रेंचनशाह के साथ विवाह किया।
रेंचनशाह एक सकुशल प्रशासक था।वह बुलबुलशाह नामक एक मुस्लिम दरवेश के हाथों इस्लाम-धर्म में दीक्षित हुए थे। इनके निधन के बाद सहदेव के भाई उदयन देव ने कश्मीर का शासन संभाला।कोटा रानी ने उसके साथ पुनर्विवाह किया। इनके राजत्वकाल में विदेशी आक्रान्ताओं ने कश्मीर पर पुनः आक्रमण किया। लेकिन इनको तुरंत खदेड़ कर बाहर भगाया गया।उदयनदेव की मृत्यु के बाद कोटा रानी ने स्वयं कश्मीर पर शासन किया।५० दिनों तक शासन करने के पश्चात शाहमीर ने जो कोटा रानी का मुख्यमंत्री भी था, सुलतान शम्सुद्दीन के नाम से कश्मीर पर अपना एकाधिकार स्थापित किया और ‘सलातीने-कश्मीर’नामक वंश परम्परा की नींव डाली।बाद में इसी वंश परम्परा के राजाओं ने २२२ वर्षों तक कश्मीर का शासन संभाला।कहना न होगा कि इसी कालावधि में कश्मीर में हमदान के मीर-अली सय्यद ने इस्लाम का प्रचार किया।
शाहमीरी वंश परम्परा के सुलतान सिकंदर ‘बुतशिकन’ और जैनुलाब्धीन ‘बडशाह’ के नाम कश्मीर के इतिहास में विशेष महत्व रखते हैं।इनमें से प्रथम को मूर्तिभंजक कहा जाता है क्योंकि वह मूर्ती-पूजा के विरोधी थे।कहते हैं कि इस क्रूर शासक ने यहां के अनेक मंदिरों और पूजास्थलों को गिराया।अनेक हिन्दुओं का नर-संहार किया जिसके फलस्वरूप उस समय यहां केवल ग्यारह हिन्दू-घर बच गये थे। परन्तु जनता पर किये गये अत्याचार की कटु-स्मृतियों को इस आतायी शासक के पुत्र जैनउलाब्दीन ‘बडशाह’ ने भुलवा दिया।इन्होंने अपने राजत्वकाल में यहां से भागे हुए हिन्दुओं को बाहर से बुलाकर घाटी में फिर बसाया।इनके शाही-दरबार में बहुत से कवि, विद्वान एवं नीति-निपुण मंत्री थे।श्रीभट्ट नामक वैद्य, जिसने उसकी जान बचायी थी,उनको अपना शिक्षा/स्वास्थ्य मंत्री बनाया।कश्मीर के नव-निर्माण में इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किये है।इनके राजत्वकाल में कश्मीरी ललित कलाओंका प्रभूतपूर्व विकास हुआ।
शाहमीरी वंश के बाद चकों ने कश्मीर पर स्थायी रूप से अपना एकाधिकार स्थापित किया। इनमें युसुफशाह ‘चक’ का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने यहां की सुप्रसिद्ध कवयित्री हब्बाखातून के साथ विवाह किया था।बाद में मुग़ल सम्राट अकबर ने कश्मीर को अपने एकाधिकार में कर लिया। इनके पहले बाबर, हिमायूं आदि ने भी कश्मीर को हथियाने के असफल प्रयास किये थे। इस बीच मुगल बादशाहों का कश्मीर के नव-निर्माण में अनुपमेय रहा। कश्मीर के मुग़ल बाग-बगीचे इसी नव-निर्माण के सूचक हैं।
मुगलों के बाद अफगानों ने कश्मीर पर शासन किया।पठान सरदारों ने यहां के लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार किये।इन्होंने कश्मीर के नव-निर्माण के प्रति कोई ध्यान नही दिया।इनके राजत्वकाल में यहां लगभग २८ राजाओं ने शासन की डोर संभाली। इनमें से एक हिन्दू भी था।उसका नाम सुखजीवन था। इनके कार्यकाल में यहां के हिन्दुओं को काफ़ी सुविधाएँ प्राप्त हुई।इसके अतिरिक्त इसी कालावधि में दीवान नंदराम तिक्कू नामक एक कश्मीरी पंडित काबुल का प्रधान मंत्री बन गया था। कुछ समय के लिए उसका नाम वहां के सिक्कों पर उत्कीर्ण था। पठानों के अन्तिम शासक का नाम था जबार खां।वह बड़ा ही क्रूर शासक था। उसी ने हिन्दुओं को शिवरात्रि का पर्व ग्रीष्मकाल में मनाने का आदेश दिया था।कहते हैं कि लोगों के प्रति जबार खां के नृशंस अत्याचार को देखकर, यहां का एक प्रतिनिधि मण्डल बीरबल दर मिर्जा के नेतृत्व में पंजाब के महाराजा रंजीतसिंह के पास सहायतार्थ गया।महाराजा रंजीतसिंह ने जबार खां को परास्त करने के लिए अमृतसर से एक विशाल सिक्ख-सेना कश्मीर भेजी।दोनों की सेनाओं का पीरपंचाल के दर्रे पर कड़ा मुकाबला हुआ, जिसमें सिक्ख सेना की विजय हुई और जबार खां मारे गये।इसके पश्चात सिक्खों ने कश्मीर पर लगभग छबीस २६ वर्षों(१८२०-१८४६) तक शासन किया।
१८४६ से लेकर १९४७ तक कश्मीर में पर डोगरा शासकों का आधिपत्य रहा।इस वंश के प्रथम राजा का नाम महाराजा गुलाबसिंह था।इन्होंने लाहौर-संधि के अंतर्गत ६ मार्च १८४६ ई. को अंग्रेजों से कश्मीर-घाटी को ६५ लाख रूपयों में खरीदा था।(कई जगह ७५ लाख का उल्लेख है।) ये बड़े वीर तथा उत्साही राजे हुए हैं।इन्होंने अपनी कार्यकुशलता से लद्दाख, तिब्बत तथा अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों को अपनी राज्य में मिला दिया और वर्तमान जम्मू-कश्मीर की स्थापना की।महाराजा गुलाबसिंह के बाद उनके सुयोग्य पुत्र महाराजा रणवीरसिंह कश्मीर के राजा बने।इन्होंने अपने कार्यकाल में यहां कई मंदिरों का निर्माण किया। धर्मार्थ ट्रस्ट तथा रघुनाथ संस्कृत विद्यालय की स्थापना की तथा अनेक हस्तलिखित संस्कृत ग्रंथों का संकलन करवाया।इसके अतिरिक्त राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने में इन्होंने अनुपम योगदान प्रदान किया है। इनके पश्चात महाराज प्रतापसिंह ने कश्मीर का राजपाठ संभाला। इन्होंने ४० वर्षों तक यहां शासन किया।अपने राजत्वकाल में इन्होंने यहां शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ कई शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना की।इसके अतिरिक्त इन्होंने बानिहाल कार्ट रोड, झेलम वैली रोड, शाली स्टोर, मोहरा विधुतघर आदि की स्थापना की। इनके निधन के बाद हरिसिंह कश्मीर के राजा बने।ये डोगरा वंश परम्परा के अन्तिम राजा हुए हैं। इन्होंने जनता के कल्याण के लिए उल्लेखनीय कार्य किये
सन १९४७ ई. में भारत का विभाजन होने पर नवगठित देश पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए असफल प्रयास किया। इसी बीच महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर राज्य का विलय भारत के साथ किया तथा अपने राजकीय अधिकार जनता के प्रतिनिधियों को सौंप दिये।सन १६५३ ई. तक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री रहे।इनके पश्चात बक्शी गुलाम अहमद कश्मीर के नये प्रधानमंत्री बने।बाद में इन्होंने कामराज प्लान के अंतर्गत त्याग पत्र दे दिया।इनके पश्चात कुछ महीनों के लिए ख्वाजा शम्सुद्दीन कश्मीर के नये प्रधान मंत्री बने। इन्हीं के राजत्वकाल में हजरतबल से हजरत मोहम्मद के पवित्र बाल की चोरी हो गयी थी। बाद में गुलाम अहमद सादिक कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। दिसंबर १६७१ ई. में इनकी मृत्यु के बाद सैयद मीर कासिम कश्मीर के नये मुख्यमंत्री बने रहे। सन १६७४ ई. में शेख-इंदिरा समझौते के अंतर्गत सैयद मीर कासिम ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला एक बार फिर कश्मीर के मुख्यमंत्री बने।
शेख अब्दुल्ला की मृत्यु हो जाने बाद उनके सुपुत्र डॉ. फारूक अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने।कालान्तर में फारूक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला ने राज्य के मुख्य-मंत्री का पद संभालाI गुलाम मोहम्मद शाह(गुल शाह),गुलाम नबी आज़ाद,मुफ़्ती मुहम्मद सैयद,उनकी सुपुत्री महबूबा मुफी आदि भी जम्मू-कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैंI
5 अगस्त २०१९ को भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 की ताकतों को खत्म कर 31 अक्टूबर २०१९ से सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर प्रदेश को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख इन दो अलग केंद्र-शासित राज्यों में विभाजित कर दिया। अब दोनों केंद्र-शासित राज्यों में संसद के बने कई कानून लागू हो सकेंगे।
सचमुच, पांच अगस्त २०१९ का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जायगा। जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा ३७० को हटाने के प्रस्ताव को राज्य-सभा ने इसी दिन अपनी मंजूरी दे दी।
मोटे तौर पर धारा 370 हटने का मतलब है कि अब जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर में अलग झंडा भी नहीं रहेगा। जम्मू-कश्मीर में देश के दूसरे राज्यों के लोग ज़मीन ख़रीद सकेंगे और नौकरी भी पा सकेंगे और इसी के साथ जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल न हो कर 5 साल होगा। इस धारा के हटने से जम्मू-कश्मीर में उद्यमी अपने प्रतिष्ठान/उद्योग आदि लगा सकेंगे जिससे वहां के नागरिकों को विकास और रोजगार के नए-नए अवसर प्राप्त होंगे।वहां के नागरिकता कानून में विसंगति की वजह से लगभग छह दशकों से बिना किसी अधिकार के शरणार्थियों का जीवन जी रहे लाखों लोगों को बराबरी का दर्जा हासिल होगा। कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की प्रक्रिया शुरू होगी। प्रदेश के बाहर शादी करने वाली कश्मीर की बेटियों को अपनी पैतृक संपत्ति में उनका जायज़ अधिकार हासिल हो सकेगा आदि-आदि।

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