-आर्यसमाज धामावाला देहरादून का वार्षिकोत्सव सोल्लास सम्पन्न- “अध्यात्म में यदि थोड़ा भी प्रवेश हो जाता है तो जीवन भर आनन्द आता हैः स्वामी सच्चिदानन्द”

ओ३म्

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आर्यसमाज धामावाला, देहरादून ऋषि दयानन्द के जीवनकाल में स्थापित समाज है। यह समाज सन् 1879 में स्थापित हुई थी। आज इस समाज का तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव सोल्लास सम्पन्न हुआ। हम भी इस समारोह में सम्मिलित हुए। आरम्भ में समाज की यज्ञशाला में यज्ञ हुआ। यज्ञ के बाद जलपान एवं उसके बाद भजन एवं सत्संग का आयोजन हुआ। सत्र के आरम्भ में गुरुकुल पौंधा के 4 छोटे ब्रह्मचारियों ने वेदमंत्रों को ‘घनपाठ’ में बोलकर प्रस्तुत किया। घनपाठ सुनकर प्राचीनकाल में वेदपाठ की परम्परा का अनुमान हुआ कि कैसे हमारे पूर्वज वेदमन्त्रों की रक्षा के लिए प्रयास करते थे। यही कारण था कि आज भी हमें वेदों के शुद्ध पाठ सुलभ हैं। यह चारों ब्रह्मचारी, इनका गुरुकुल एवं आचार्यगण बधाई के पात्र हैं।

मन्त्रपाठ के बाद आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक पं. सत्यपाल सरल जी जी के भजन हुए। भजन गाने व ढोलक पर उन्हें श्री मोहन लाल आर्य जी ने संगति दी। श्री सत्यपाल सरल जी ने जो पहला भजन सुनाया उसके बोल थे ‘दिन दिन आयु बीती जाये विषयों में जीवन मत न गवायें’। सरल जी ने दूसरा भजन कवि नीरज जी का लिखा प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘जिन्दगी दुल्हन है एक रात की’। इस भजन को श्रोताओं ने बहुत पसन्द किया। इस भजन के मध्य श्री सरल जी ने कहा कि हम आंखों से बाहर के संसार को देखते हैं परन्तु हम अपने अन्तर्मन को संवारने की कोशिश नहीं करते। सरल जी ने तीसरा भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘जिन्दगी की राहों में चन्द दिन का मेला है। प्रभु के सिवा और कौन कोई अकेला है।’ इस भजन को भी बहुत पसन्द किया गया। सरल जी ने कुल पांच भजन प्रस्तुत किये जिससे वातावरण ईश्वर के प्रति भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेम का बन गया। सरल जी ने भजनों के मध्य अनेक प्रेरक प्रसंग भी सुनायें। ऐसा सत्संग मनुष्यों को सौभाग्य से ही मिलता है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे समाज के युवा मंत्री श्री नवीन भट्ट जी ने श्री सत्यपाल सरल जी के भजन व गीतों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द चाहते थे कि देशवासी वेदों की ऋचायें बोलें, उनके अर्थों को जाने और वेदानुसार जीवन में आचरण करें।

पं. सत्यपाल सरल जी के भजनों के बाद जयपुर से पधारे युवा संन्यासी स्वामी सच्चिदानन्द जी का गायत्री मन्त्र के महत्व पर धाराप्रवाह, विद्वतापूर्ण एवं गवेषणापूर्ण व्याख्यान हुआ। स्वामी जी ने कहा कि बीस हजार से अधिक मन्त्र वेदों में हैं। वेदों का एक मन्त्र प्रत्येक सनातनी बन्धु व बच्चों को भी याद होता है। वह पवित्र मन्त्र गायत्री मन्त्र है। इस मन्त्र की हम सभी के जीवन में महत्ता है। सभी माता-पिता अपने बच्चों को इस मन्त्र को स्मरण कराते हैं। यह मन्त्र गायत्री छन्द में होने से गायत्री मन्त्र कहलाता है। स्वामी जी ने बताया कि वेदों की ऋचायें वा मन्त्र कुल सात छन्दों में हैं। स्वामी जी ने इन सात छन्दों के नाम भी बताये। इन्हीं सात छन्दों में रचित सब पद्यात्मक वेद मन्त्रों का पाठ मिलता है। स्वामी सच्चिदानन्द जी ने बताया कि गायत्री छन्द में आबद्ध अनेक मन्त्र वेदों में हैं परन्तु एक ही मन्त्र गायत्री मन्त्र के नाम से विख्यात है। स्वामी जी ने एक प्रसंग में कहा कि कमल कीचड़ में पैदा होता है, इसीलिए इसे कमल कहते हैं। स्वामी जी ने कहा कि गायत्री मन्त्र ही सच्चा गुरु मन्त्र है। उन्होंने कहा कि गायत्री मन्त्र से इतर भिन्न-2 गुरु-मन्त्र के नाम से जो मन्त्र आधुनिक गुरु अपने शिष्यों को देते हैं वह सब पाखण्ड हैं। इस पर उन्होंने किंचित विस्तार से चर्चा भी की।

स्वामी सच्चिदानन्द जी ने ऋषि दयानन्द प्रणीत संस्कार-विधि और उसमें वर्णित वेदारम्भ संस्कार की चर्चा कर बताया कि इस संस्कार में गुरु अपने ब्रह्मचारियों को जिस मन्त्र का सबसे प्रथम उपदेश करते हैं वह गायत्री मन्त्र ही होता है। गुरु द्वारा इस मन्त्र का उपदेश किये जाने के कारण इसे गुरु मन्त्र भी कहा जाता है। इसके बाद स्वामी जी ने गायत्री मन्त्र के ऋषि दयानन्द कृत अर्थों पर विस्तार से समीक्षा पूर्वक प्रकाश डाला और इस मन्त्र के अर्थ के अनेक प्रमाण प्रस्तुत कर विशेषतायें बताईं। आर्यसमाज के विद्वान स्वामी सच्चिदानन्द जी ने मन्त्र के अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेदों में निहित ओ३म् शब्द ईश्वर का मुख्य तथा निज नाम है तथा उन्होंने ईश्वर के अन्य अनेक नामों पर भी प्रकाश डाला। स्वामी जी ने ईश्वर के अनहद तथा आहत नामों की चर्चा की और उन पर भी सोदाहरण प्रकाश डाला। ओ३म् को उन्होंने ईश्वर का अनहद नाम बताया। स्वामी जी ने ईश्वर के आहत नामों पर प्रकाश डाला। स्वामी सच्चिदानन्द जी ने अपने व्याख्यान में शब्दोच्चारण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला और कहा कि उच्चारण से पूर्व उन शब्दों को बोलने की प्रेरणा आत्मा से बुद्धि को होती है, बुद्धि मन को प्रेरणा करती है। मन प्राणों को तथा प्राण वाणी को प्रेरणा करते हैं। स्वामी जी ने कहा कि जो पद इन्द्रियों से उच्चारण किये जाते व उत्पन्न होते हैं उन्हें आहत पद कहते हैं। विद्वान वक्ता ने आगे कहा कि जो चीज उत्पन्न होती है वह नष्ट भी होती है। ओ३म् शब्द को स्वामी जी ने अनहद शब्द बताया और कहा कि यह शब्द उत्पन्न नहीं हुआ है। यह संसार में अनादि काल से है और सदा रहेगा। स्वामी जी ने नासा के वैज्ञानिकों की सम्मति के आधार पर कहा कि ब्रह्माण्ड में जो ध्वनि सुनाई देती है वह अनहद ओ३म् की ध्वनि सुनाई देती है।

स्वामी सच्चिदानन्द जी ने आगे कहा कि संसार के सभी मतों यथा बौद्ध, जैन, ईसाई तथा इस्लाम मत में ओ३म् शब्द मिलता है। स्वामी जी ने बौद्ध मत और जैन मत के कुछ मन्त्रों को बोल कर सुनाया जिसमें ओ३म् शब्द विद्यमान है। स्वामी जी ने इस्लाम में ओ३म् के परिवर्तित शब्द आमीन पर भी प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि ईसाई मत में ईश्वर को omnipresent तथा omnipotent आदि शब्दों से वर्णित किया जाता है। यह omni शब्द ओ३म् का ही अपभ्रंस व परिवर्तित रूप है। इस विषय में स्वामी जी ने अन्य जानकारियां भी दी। इसके बाद स्वामी जी ने गायत्री मन्त्र के प्रथम शब्द ‘भूः’ से आरम्भ कर अन्य सभी शब्दों के अर्थों सहित उनके रहस्यों पर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि हम परमात्मा को प्राणों से भी प्रिय कहते हैं परन्तु यथार्थ में वह हमें भौतिक वस्तुओं से अधिक प्रिय लगता दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा इसका मतलब है कि हम परमात्मा को जानते नहीं हैं।

स्वामी सच्चिदानन्द जी ने कहा कि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने परमात्मा को भौतिक सम्पत्ति से अधिक महत्वपूर्ण जानकर ही उसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया और अपने पिता की सम्पत्ति को ठुकरा दिया था। इसी प्रसंग में उन्होंने गौतम बुद्ध और महाराज भृतहरि के उदाहरण भी दिए जिन्होंने परमात्मा को प्राप्त करने के लिए अपने राज्य व सम्पत्ति का त्याग किया था। स्वामी जी ने कहा कि हमने अज्ञानतावश परमात्मा रूपी सोने को पीतल और पीतल रूपी जड़ व भौतिक पदार्थों को सोना समझ रखा है। उन्होंने कहा परमात्मा वस्तुतः सच्चा सोना है तथा सृष्टि के सभी पदार्थ पीतल के समान हैं। स्वामी जी ने यह भी बताया कि परमात्मा ने संसार में कोई भी पदार्थ निरर्थक व अनुपयोगी नहीं बनाया। इस कारण परमात्मा निरर्थक नहीं हो सकता। स्वामी सच्चिदानन्द जी ने परमात्मा को सुखस्वरूप व सभी मनुष्य आदि प्राणियों को सुख देने वाला बताया। सुखस्वरूप होने से ही परमात्मा सभी प्राणियों को दुःखों से छुड़ाता है। स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा अपने उपासकों को सुख देता है।

स्वामी जी ने कहा कि जातकर्म संस्कार में पिता अपने पुत्र की जिह्वा और ईश्वर का नाम ओ३म् लिखता है। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे पुत्र यह जान सके कि उसका सच्चा सनातन पिता परमात्मा ही है। उसे यह भी पता चल जाये कि उसके जीवन व जन्म का लक्ष्य ओ३म् अर्थात् परमात्मा को प्राप्त करना है। जातकर्म संस्कार से यह भी शिक्षा मिलती है कि मनुष्य के जीवन का उद्देश्य वेदों को पढ़ना-पढ़ाना और उसकी शिक्षाओं पर आचरण करना है। संस्कार में सन्तान को बताया जाता है ‘त्वं वेदोऽसि’ अर्थात् उसका नाम वेद है। उसे जीवन में वेदों का अध्ययन करना है। स्वामी जी ने यह भी कहा कि परमात्मा संसार का निमित्त कारण है। वह उपादान कारण नही है। संसार का उपादान कारण प्रकृति है जो कि ईश्वर से भिन्न जड़ पदार्थ है। स्वामी जी ने कहा कि हम सब मनुष्यों के वरण करने योग्य केवल और केवल परमात्मा ही है। उससे श्रेष्ठ संसार में अन्य कोई नहीं है।

स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा दिव्य स्वरूप वाले हैं। अध्यात्म वह चीज है कि जिसमें यदि थोड़ा भी प्रवेश हो जाता है तो जीवन भर आनन्द ही आनन्द आता है। इसी के साथ स्वामी जी का व्याख्यान समाप्त हुआ। इसके बाद स्वामी सच्चिदानन्द जी को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में पधारे अनेक व्यक्तियों को भी सम्मानित किया गया। आयोजन में उत्तराखण्ड सभा के प्रधान श्री मनमोहन तिवारी जी भी पधारे थे। उनका भी सम्मान किया गया। श्री मनमोहन तिवारी जी ने सभा को भी सम्बोधित किया। उन्होंने आर्यसमाज धामावाला के एक प्रमुख सदस्य मास्टर दलीप सिंह जी से जुड़े अपने अनेक संस्मरण प्रस्तुत किये। कार्यक्रम में वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा, आर्य उप प्रतिनिधि सभा देहरादून के प्रधान श्री शत्रुघ्न सिंह मौर्य तथा मंत्री श्री भगवान सिंह राठौर भी पधारे थे। उन्होंने स्वामी जी का पुष्प गुच्छ आदि पदार्थ प्रस्तुत कर उनका सम्मान किया। वार्षिक उत्सव का कार्यक्रम सफल रहा। कार्यक्रम की समाप्ति ने सभी सहभागियों ने ऋषि लंगर ग्रहण किया। कार्यक्रम की सफलता का श्रंेय आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर कुमार गुलाटी तथा मंत्री श्री नवीन भट्ट जी सहित सभी पदस्थ अधिकारियों एवं सदस्यों को हैं। हमें भी आज आर्यसमाज में अपने अनेक पुराने सहयोगी मित्र एवं विद्वान सदस्य मिले। हमें आयोजन में उपस्थित होकर प्रसन्नता का अनुभव हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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