कश्मीर की कश्मीरियत को जीवित रखने वाली कोटा रानी

kashmir kelaके.एम. मुंशी की राष्ट्रबोध कराने वाली टिप्पणी

के.एम. मुंशी अपनी पुस्तक ‘ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश’ के पृष्ठ 24 पर लिखते हैं :-‘‘सन 1199 से लेकर 1526 तक के संघर्ष काल का इतिहास दिल्ली सल्तनत की उपलब्धियों के एक पक्षीय वर्णनों से भरा हुआ है, क्योंकि वह दरबारी इतिहासकारों के वर्णन पर आधारित है। जबकि वास्तविकता यह है कि अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक के कुछ वर्षों के शासनकाल के अतिरिक्त शेष समय में मुसलमानों का प्रभावी शासन दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों तक ही सीमित रहा।’’

अपने गौरव पूर्ण इतिहास की संघर्ष गाथा पर के.एम. मुंशी की यह टिप्पणी उचित ही है जो हमें अपने गौरव बोध, राष्ट्रबोध और इतिहास बोध से भर देती है।

आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव भी कुछ ऐसा ही कहते हैं

इसी प्रकार की एक विचारणीय टिप्पणी आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘दिल्ली सल्तनत’ के पृष्ठ 35-38 पर की है। वह लिखते हैं-‘‘यदि हम अपने देश के इतिहास की एशिया अफ्रीका तथा यूरोप के उन देशों के इतिहास से तुलना करें जिन्होंने कायरता पूर्वक एक ही झटके में अरब तथा तुर्क आक्रमणकारियों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया था, तो हमें अपने पूर्वजों की अवश्य ही सराहना तथा प्रशंसा करनी पड़ेगी, क्योंकि उन्होंने दीर्घकाल तक उन शत्रुओं के विरूद्घ डटकर संघर्ष किया जिन्होंने तूफानी वेग से संसार के तीन महाद्वीपों पर सैनिक, राजनीतिक तथा धार्मिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। एशिया अफ्रीका तथा यूरोप के अनेक देशों ने तो अरबों के आक्रमण के आगे कुछ वर्षों में ही घुटने टेक दिये थे (फिर भी उन देशों के लोगों को वीर माना जाता है यह कितना अतार्किक तथ्य है, विशेषत: तब जब भारत के लोगों के सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष करते रहने पर भी लोग कायर कह देते हैं) किंतु सिंध ने 75 वर्षों के संघर्ष के पश्चात आत्मसमर्पण किया था, अश्वलायन (अफगानिस्तान) दो सौ वर्षों तक डटकर शत्रु का सामना करता रहा, पंजाब ने 156 वर्षों तक (870 से 1026 ई.) मुकाबला किया। मोहम्मद गोरी के 1175 ई. में भारत पर प्रथम आक्रमण से लेकर 1316 ई. अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु तक तुर्कों को कश्मीर, असम, उड़ीसा तथा केरल को छोडक़र शेष भारत को ही विजय करने में 150 वर्ष लगे थे। इतना समय लगने पर भी यह विजय पूर्ण नही थी। मध्ययुग में राजस्थान को  पूर्णत: कभी नही जीता गया और संपूर्ण सल्तनत काल में गंगा दोआब के जमींदारों से कर वसूलने के लिए प्रतिवर्ष आक्रमण करना  पड़ता है।’’

वेदना के अनछुए स्थल

हमारे लिए जहां गौरव बढ़ाने वाले ऐसे तथ्य उपस्थित हैं वहीं कुछ ऐसे तथ्य भी हैं, जिन्होंने हमें वेदना से भर दिया है। यदि वेदना के उन स्थलों को अनछुआ छोड़ा गया तो भी यह लेखमाला अपूर्ण ही रहेगी। क्योंकि इसका उद्देश्य वेदना को भी स्पष्ट करना है, जिससे कि हम यह भी समझ सकें कि जब चारों ओर विजय वैभव और वीरता ही बिखरे पड़े थे, तो भी हम गुलाम कैसे रहे? कैसे इस देश में इस्लाम का इतना विस्तार हो गया? कारण बहुत से हैं, उन सब पर प्रकाश डालना तो एक नया ग्रंथ तैयार करना होगा, यहां तो हम केवल अपने धर्म के ठेकेदारों की ओर से की गयी प्रमुख चूकों का ही उल्लेख करेंगे।

कश्मीर के इस्लामीकरण के संबंध में

सर्वप्रथम हम कश्मीर के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं कि ये ये पृष्ठ हमें इस पवित्र धरती के इस्लामीकरण होने की क्या साक्षी देते हैं? इसके इस्लामीकरण के लिए कौन लोग और कौन सी परिस्थितियां उत्तरदायी रही हैं? इस पर सूक्ष्म सा प्रकाश हम इस लेख में डालना चाहेंगे।

हिंदू राजा जयसिंह के प्रयास

कश्मीर ने अपनी अस्मिता का संघर्ष लड़ा, जिससे कश्मीर की कश्मीरियत युग-युगों तक सुरक्षित और संरक्षित रही। पर बारहवीं शताब्दी के आते-आते परिस्थितियां कुछ बिगडऩे लगीं। 1150 ई. तक भी राजा जयसिंह ने पड़ोस के हिंदू राजाओं का सहयोग प्राप्त कर उभरती हुई मुस्लिम शक्ति का दमन करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की। यह वह काल था जब विदेशी शक्तियां कश्मीर को हड़पने की तैयारियां करने लगी थीं।

धीरे-धीरे चढऩे लगा था विष

प्रारंभ में कश्मीर में सरकारी नौकरियों और सैनिक बनकर सेना में प्रवेश पाने में विदेशी शक्तियां सफल हुईं। मुस्लिम लोगों ने इन स्थानों पर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर कश्मीर की नसों में विष फैलाना आरंभ किया। इस विषैली भावना ने कश्मीर की पारम्परिक एवं स्वाभाविक एकता को भंग कर दिया। धर्मांतरण की प्रक्रिया शनै: शनै: प्रारंभ हुई। सह अस्तित्व की भावना लुप्त होने लगी और हमने देखा कि ‘बर्फ में आग लगने लगी’।

कश्मीरी पंडितों ने की भारी चूक

1301 ई. में कश्मीर के राजसिंहासन पर सहदेव नामक शासक विराजमान हुआ। कश्मीर में बाहरी तत्वों ने जिस प्रकार अस्त व्यस्तता फैला रखी थी, उसे सहदेव रोकने में पूर्णत: असफल रहा। इसी समय कश्मीर में लद्दाख का राजकुमार रिंचन आया, वह अपने पैत्रक राज्य से विद्रोही होकर यहां आया था। यह संयोग की बात थी कि इसी समय यहां एक मुस्लिम सरदार शाहमीर स्वात (तुर्किस्तान) से आया था। कश्मीर के राजा सहदेव ने बिना विचार किये और बिना उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लिए इन दोनों विदेशियों को प्रशासन में महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये। यह सहदेव की अदूरदर्शिता थी, जिसके परिणाम आगे चलकर उसी के लिए घातक सिद्घ हुए। इतिहासकार हसन अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में लिखता है’’ :-

‘‘इसी प्रकार समय कटता रहा, जबकि एक भयानक विपत्ति ने कश्मीर देश को हिला दिया। इससे एक दूरगामी किस्म का संकट उत्पन्न हो गया, जो एक युग निर्माण करने वाले परिवर्तनों का शुभारंभ था। तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य को क्रूर आक्रामक की दया पर छोडक़र सहदेव किश्तवाड़ की ओर भाग गया। डुलचू ने हत्याकांड का आदेश दे दिया। हजारों लोग मार डाले गये। उससे भी अधिक लोग साथ आये तातार व्यापारियों के हाथों गुलाम के रूप में बेच दिये गये। कस्बों को आग लगा दी गयी, खड़ी फसलें नष्ट कर दी गयीं। यहां आठ महीने रहने के पश्चात डुलचू 50,000 ब्राह्मणों को दास बनाकर ले गया। परंतु देवकर दर्रा पार करते हुए बर्फानी तूफान से उसकी सारी सेना और दास नष्ट हो गये।’

राजा की अदूरदर्शिता का दु:खद परिणाम

कितनी भयानक परिस्थितियों में राजा ने जनता को छोड़ दिया था, यह इस उद्घरण से स्पष्ट हो गया। राजा की अकर्मण्यता और प्रमाद के कारण हजारों लाखों की संख्या में हिंदू लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया। जनता की स्थिति दयनीय थी। राजतरंगिणी (जोनाराज) पृष्ठ 152-155 पर उल्लेख है-‘जब हुलचू वहां से चला गया, तो गिरफ्तारी से बचे कश्मीरी लोग अपने गुप्त स्थानों से इस प्रकार बाहर निकले, जैसे चूहे अपने बिलों से बाहर आते हैं। जब राक्षस डुलचू द्वारा फैलाई गयी हिंसा रूकी तो पुत्र को पिता न मिला और पिता को पुत्र से वंचित होना पड़ा, भाई भाई से न मिल पाया। कश्मीर सृष्टि से पहले वाला क्षेत्र बन गया। एक ऐसा विस्तृत क्षेत्र जहां घास ही घास थी और खाद्य सामग्री न थी।’

रिन्चन उतर आया विद्रोह पर

इस घटना का उल्लेख करने का हमारा विशेष प्रयोजन यह था कि इस घटना के पश्चात सहदेव के राज्य में पूर्णत: अराजकता फैल गयी। जिसका लाभ उसके मंत्री रामचंद्र ने उठाया और वह शासक बन बैठा। परंतु रिंचन भी इस अवसर का लाभ उठाने से नही चूका। जिस स्वामी ने उसे शरण दी थी उसके राज्य को हड़पने का दानव उसके हृदय में भी उभर आया और भारी उत्पात मचाने लगा। विद्रोह जब घर को भी नही छोड़ता है, तब उससे बाहर को छोड़ देने की आशा नही करनी चाहिए। रिंचन जब अपने घर से ही बागी होकर आया था तो उससे दूसरे के घर शांत बैठे रहने की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी? उसके मस्तिष्क में विद्रोह का परंपरागत कीटाणु उभर आया, उसने रामचंद्र के विरूद्घ विद्रोह कर दिया। रामचंद्र ने जब देखा कि रिंचन के हृदय में पाप हिलोरें मार रहा है, और उसके कारण अब उसके स्वयं के जीवन को भी संकट है तो वह राजधानी छोडक़र लोहर के दुर्ग में जा छिपा।

रिंचन को पता था कि शत्रु को जीवित छोडऩा कितना घातक सिद्घ हो सकता है? इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम किया और अपने कुछ सैनिकों को गुप्त वेश में रामचंद्र को ढूंढने के लिए भेजा। जब रामचंद्र मिल गया तो उसने रामचंद्र से कहलवाया कि रिंचन समझौता चाहता है। वात्र्तालाप आरंभ हुआ तो छल करते हुए रिंचन ने रामचंद्र की हत्या करा दी।

हो गया कश्मीर पर रिंचन का अधिकार

इस प्रकार कश्मीर पर रिंचन का अधिकार हो गया। यह घटना 1320 की है। उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी से विवाह कर लिया था। इस प्रकार वह कश्मीर का राजा बनकर अपना राज्य कार्य चलाने लगा। कुछ लोगों का मत है कि महारानी कोटा ने अपनी इच्छा से रिंचन से विवाह किया था। जिसमें उसकी दूरदर्शिता झलकती थी। इस  प्रकार का मत रखने वाले लोगों का विचार है कि कोटा रानी एक कूटिनीतिज्ञा थी और उसे पता था कि अब कश्मीर को तभी बचाया जा सकता है जब रिंचन के विचारों में परिवर्तन कर उसका भारतीयकरण किया जाए। इसलिए कोटा रानी ने रिंचन से विवाह करना उचित समझा और उसकी अद्र्घांगिनी बनकर राजकार्यों में रूचि लेने लगी। कोटा रानी की सूझबूझ और दूरदर्शिता के कारण रिंचन कश्मीर पर शासन तो करने लगा, परंतु उसे जनसाधारण का विश्वास प्राप्त नही हुआ। कोटा रानी की बुद्घिमत्ता को और दूरदर्शिता को अंतत: कितने लोगों ने समझा है?

पंडितों ने किया धर्म विरूद्घ आचरण

कोटा रानी अपने पति का पूर्ण भारतीयकरण कर देना चाहती थी, उसमें वह सफल भी होती जा रही थी, पर देश का जनसाधारण रानी की इस बुद्घिमत्ता को समझ नही पा रहा था। दुख इस बात का नही है कि देश का जनसाधारण रानी की इस कूटनीति को समझने में असफल रहा, दुख तो इस बात का है कि जो औरों को कूटनीति और बुद्घिमत्ता का पाठ पढ़ाते हैं, वे पंडित लोग भी रानी की बुद्घिमत्ता को समझने में असफल रहे।

रिंचन बनना चाहता था हिंदू

रानी ने अपने पति को शनै: शनै: भारतीय धर्म और संस्कृति का इतना प्रेमी बना दिया कि वह हिंदू धर्म स्वीकार करने की योजनाएं बनाने लगा। कोटा रानी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थी और उसका दृष्टिकोण राष्ट्रीय था, भारतीय संस्कार उसके रोम-रोम में रचे-बसे पड़े थे। इसलिए वह अपने पति से भी ऐसी ही अपेक्षा करती थी कि वह भी भारत के राष्ट्रीय मूल्यों को अपना कर भारतीय धर्म को स्वीकार करे। रानी की कूटनीति, पति के प्रति सत्कार भाव और भारत की संस्कृति के प्रति असीम अनुराग का ही फल था कि अंतत: राजा रिंचन ने भारतीय धर्म स्वीकार करने का निर्णय ले ही लिया। रानी ने भी इसके लिए राजा को परामर्श दिया कि इस कार्य के लिए अर्थात हिंदू धर्म में दीक्षित होने के लिए वह पंडितों के पास जाए। फलस्वरूप रिंचन ने तत्कालीन पंडितों के समक्ष अपने मन की बात कही।

पंडितों ने किया निराश

भारत को अपच का बहुत पुराना रोग है। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि इस अपच के रोग को समाज के मार्गदर्शक ब्राह्मण वर्ग ने बहुत फैलाया है। इसी सोच के कारण देश में अस्पृश्यता और ऊंच-नीच की अमानवीय धारणा का भी विकास हुआ और बहुत से लोग जो अपने ही हमारे भाई बंधु रहे हैं, हमारे लिए घोर घृणा और उपेक्षा का पात्र बन गयेे। बौद्घिक अंधकार, पाखण्ड, दम्भ और अज्ञान कुछ ऐसे रोग थे जो उस समय के ब्राह्मण वर्ग पर कश्मीर में सिर चढक़र बोल रहे थे। इसलिए जब उनके पास राजा का स्वयं को हिंदू धर्म में दीक्षित करने संबंधी प्रस्ताव गया तो वे खिन्न हो उठे और उन्होंने राजा को हिंदू धर्म में लेकर दीक्षित करने के लिए स्पष्ट मना कर दिया।

तब रिंचन बन गया मुसलमान

रिंचन के लिए पंडितों ने जो परिस्थितियां उत्पन्न की थीं वे बहुत ही अपमानजनक थीं। जिससे उसे असीम वेदना और संताप ने घेर लिया। पर वह शीघ्र ही संभला और उसने एक कठोर निर्णय लिया, ऐसा कठोर निर्णय कि जिससे संपूर्ण भारत वर्ष आज तक पीडि़त है।

जब प्रात:काल में रिंचन अपने शयनकक्ष में अपने पलंग पर सो रहा था तो उसके कान में किसी निकट की मस्जिद से अजान की आवाज आयी। ‘किंकत्र्तव्य विमूढ’  की अवस्था में रात भर करवटें बदलते रहने वाले रिंचन को अंतत: अपनी दुविधा का समाधान मिल गया। मस्जिद से अजान देने वाला सूफी बुलबुलशाह था। रिंचन अपने कक्ष से बाहर निकला और सीधे सूफी बुलबुलशाह के पास चला गया। बुलबुलशाह को उसने अपने मन की व्यथा कथा सुना दी और उससे इस्लाम में दीक्षित होने का आग्रह करने लगा। बुलबुलशाह ने गर्म लोहा देखकर तुरंत चोट मारी और एक घायल पक्षी को उसने सहलाकर अपने यहां आश्रय दे दिया। रिंचन ने भी बुलबुल शाह का हृदय से स्वागत किया।

रानी की भावनाएं भी टूट गयीं

जिस कोटारानी ने भारत की संस्कृति और धर्म को बचाने के लिए एक विदेशी को भारतीय बनाया और उसका भारतीयकरण करते-करते हिंदू बनाने पर उसे सहमत कर लिया, जिस काम के लिए कोटा रानी ने अपने सतीत्व की भी परवाह नही की और बस अपना एक ही जीवन ध्येय बना लिया कि अब जैसे भी हो कश्मीरियत को बचाया जाए, उस रानी की भावनाएं भी टूट गयीं, जब उसने पंडितों के हठी स्वभाव को साक्षात अपनी आंखों से देखा। रानी के राष्ट्रवादी चिंतन और राष्ट्रीय प्रयासों को बड़ा भारी धक्का लगा। वह भी दुख और अवसाद में डूब गयी।

वेदना बन गयी अभिशाप

जब लोग सामने खड़े अवसर को, हाथ आये क्षणों को बड़ी कठिनता से बने संयोग को और सौभाग्य से मिले दैव को पहचानने में चूक कर जाते हैं, तो जो लोग जानते हैं कि हमने कितनी भारी चूक कर दी है उन्हें दुख तो होता ही है साथ ही उनके हृदय से उस समय वेदना के साथ जो शब्द निकलते हैं वे अभिशाप बन जाते हैं।

कश्मीर में रानी कोटा के अभिशाप से हम अभी तक उभर नही पाए हैं। भारत के विभाजन से हमारा कलेजा तो बाद में फटा था कश्मीर के विखण्डन के बीजारोपण के समय पहला कलेजा तो रानी कोटा का ही फटा था। कश्मीर की केसर की क्यारियों में जितने कलेजे फटे पड़े हैं क्या हम उन कलेजों में से रानी कोटा का कलेजा खोज सकते हैं? संभवत: नही, क्योंकि अब कलेजों का ढेर ही इतना ऊंचा हो गया है कि उसमें किसी एक विशेष व्यक्ति का कलेजा खोजा जाना संभव नही है।

रिंचन बन गया सदरूद्दीन

अब रिंचन रिंचन नही था ना ही वह परिवर्तित होता जा रहा राष्ट्र वादी हिंदू था। अब वह भारतीय भी नही था और अब उसे भारतीय संस्कृति के प्रति या भारतीय धर्म के प्रति भी कोई लगाव नही था। इन सबके स्थान पर अब वह मियां सदरूद्दीन था। अचानक प्रतिक्रिया स्वरूप बना मुसलमान था। भारत की भूमि अब उसके लिए पितृभूमि न रहकर शत्रु भूमि हो गयी थी और वह हिंसा और घृणा से भर उठा था-भारतीयता के प्रति, भारतीय धर्म के प्रति और भारतीय संस्कृति के प्रति।

उसने अपनी आंखों से देख लिया था कि भारत का ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्’ का आदर्श किस प्रकार कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथ ही कठपुतली है और वे अपनी शक्तियों का किस प्रकार दुरूपयोग करते हैं?

कोटा रानी ने किया पति को संभालने का प्रयास

कोटा रानी ने अब भी अपने पति को संभालने का प्रयास किया और इस बात का हरसंभव प्रयास किया कि रिंचन प्रतिक्रिया स्वरूप किसी भी स्थिति परिस्थिति में कोई ऐसा कार्य न कर बैठे जो पूरे हिंदू समाज के लिए घातक सिद्घ हो। रानी की विवेकशीलता अपने स्थान पर थी और रिंचन की मानसिकता अपने स्थान पर। उसने तात्कालिक आधार पर चाहे कोई बड़ा घातक निर्णय कश्मीरी हिंदुओं के लिए नही लिया, परंतु उसने कश्मीर का पहला मुसलमान बनकर भविष्य की अनेकों समस्याओं का बीजारोपण इस प्रकार किया कि उसी बीज की फसल को सारा देश आज तक काट रहा है।

रानी ने अपने बुद्घि कौशल से फिर बचा लिया कश्मीर

कोटा रानी कूटनीतिज्ञा और एक योग्य शासिका थी। उसने अपने पति सदरूद्दीन और पुत्र हैदर के मुसलमान रहते भी बड़ी सावधानी से अपने धर्म की रक्षा की और स्वयं हिंदू ही बनी रही। कश्मीर के पूर्व राजा सहदेव ने विदेशी आक्रमण कारी डुलचू के आक्रमण का सामना न करके युद्घ से पलायन का रास्ता अपना लिया था। तब वह गांधार की ओर चला गया था। इस पलायन में उसका भाई उड्डयन देव भी उसके साथ ही था। कश्मीर में जब रिंचन का शासन दुर्बल हुआ तो यह उड्डयन देव पुन: कश्मीर आ गया। उसने रिंचन के राजभवन पर आक्रमण कर दिया। संघर्ष में रिंचन घायल होकर गिर गया तो उसके गिरने को उसकी मृत्यु का समाचार बनाकर नगर में प्रसारित कर दिया गया। रानी कोटा ने बड़ी कठिनता ेसे स्थिति को संभाला। परंतु रिंचन बच नही पाया और उसकी मृत्यु हो गयी। रिंचन ने अपने एक विश्वसनीय मंत्री शाहमीर के संरक्षण में रानी और अपने पुत्र हैदर को सौंप दिया। उड्डयन देव ने जब रिंचन के राजभवन पर आक्रमण किया था तो उसमें से वह घायल रिंचन से जान बचाकर भागने में सफल हो गया था।

रानी ने उड्डयन देव से किया विवाह

रिंचन की मृत्यु के पश्चात उड्डयन देव ने कश्मीर को हथियाने के प्रयास जारी रखे। उसने रानी कोटा और उसके पुत्र हैदर के लिए जितनी समस्याएं खड़ी कर सकता था उतनी करने का प्रयास किया। रानी कश्मीर के लिए कोई योग्य प्रशासक खोज रही थी। इससे भी अधिक उसे कश्मीर के भविष्य की चिंता थी, उसे भारतीय धर्म और संस्कृति से असीम अनुराग था, इसलिए उसने पुन: दूरदर्शिता का परिचय दिया और राष्ट्रहित में उड्डयन देव से विवाह का प्रस्ताव रख दिया।

मुसलमान बने पुत्र को भी भुला दिया रानी ने

इसके लिए रानी ने अपने पुत्र के अधिकारों की भी बलि चढ़ा दी थी। वह नही चाहती थी कि उसका पुत्र एक मुस्लिम के रूप में कश्मीर पर शासन करे। जस्टिस मलिक साहब लिखते हैं :-‘‘कश्मीर पुन: अस्त व्यस्त कर दिया गया। यद्यपि रिंचन ने शांति की नींव रख दी थी, परंतु वह अराजक तत्वों को पूर्णतया दबाने में सफल नही हुआ था। रिंचन के निधन के पश्चात इन्हीं अराजक तत्वों ने सिर उठाया। कोटा रानी ने अनुभव किया कि अपने सीमित साधनों द्वारा वह देश को नियंत्रण में नही रख सकती। अत: जब उड्डयन देव एक बड़ी सेना लेकर कश्मीर की ओर बढ़ रहा था, रानी ने उसे अपना सिंहासन तथा हाथ देने की पेशकश की, तथा अपने पुत्र हैदर के अधिकार त्याग दिये। उड्डयनदेव ने सिंहासन पर बैठते ही बड़ी शान से रानी कोटा से विवाह कर लिया।’’

अधिकांश इतिहासकारों ने रानी के इस निर्णय की भी यह कहकर प्रशंसा की है कि रानी ने यह निर्णय भी राष्ट्रहित में लिया था। उड्डयनदेव की पत्नी के रूप में शासन सूत्र पुन: उसी के हाथ में रहे, परंतु शाहमीर के हाथों में कश्मीर सुरक्षित नही था। दूसरे रानी हर स्थिति में कश्मीर में हिंदू संस्कृति को फूलते फलते देखना चाहती थी। उसने परिस्थितियों को  सदा समझकर निर्णय लिये।  रानी ने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाकर सदा स्थितप्रज्ञता का परिचय भी दिया।

दुष्ट के हाथों से कश्मीर की रक्षा की

कोटा रानी कूटनीतिज्ञा तो थी ही साथ ही वह साहस और धैर्य की भी साक्षात मूर्ति ही थी। उड्डयन देव के काल में कश्मीर पर परशियन तातार अचला का आक्रमण हुआ। उड्डयन देव अपने पारिवारिक संस्कार के कारण राजधानी से भाग गया। पर रानी ने मैदान नही छोड़ा उसने अपने लोगों का साहस बढ़ाया और स्वयं युद्घ संचालन के लिए आ गयी। मुस्लिम इतिहासकार मुहम्मदीन फाक ने अपनी पुस्तक ‘‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’’ में लिखा है-‘‘अपने परिवार के पदचिन्हों पर चलते हुए उड्डयन देव तिब्बत भाग गया। परंतु कोटा रानी ने एक उत्साहवर्धक अपील से कश्मीर की स्थानीय देश भक्ति को जाग्रत किया। हजारों लोग कोटा रानी के झण्डे तले एकत्र हो गये और उन्होंने तातारों के दांत खट्टे कर दिये। कश्मीर संकट मुक्त हो गया।’’

देशभक्त वीरांगना कोटा रानी को नमन

रानी के सफल सैन्य संचालन से उसका यौद्घेय स्वरूप प्रकट हुआ और उसके एक सच्ची देशभक्त वीरांगना होने का परिचय मिला। रानी ने परास्त होती अचला की सेना के लिए एक संदेश भेजा कि यदि अचला महल में आ जाए तो हम उसे यहां का राजा बना देंगे, क्योंकि राजा उड्डयन देव यहां से चले गये हैं। इतना ही नही रानी स्वयं अपनी अनेकों सखियों के साथ उसके लिए उपस्थित होंगी। मूर्ख अचला रानी के प्रेमजाल में फंस गया। उसने अपनी सेना लौटा दी और स्वयं महल में आ गया। नियत समय पर उसकी रानी और उसकी सखियों से करायी गयी। अचला बड़ी व्यग्रता से रानी की प्रतीक्षा कर रहा था। रानी के निकट आने पर उसने जैसे ही रानी को अपनी बांहों में लेने के लिए हाथ बढ़ाया रानी ने तलवार के एक ही वार से शत्रु का प्राणांत कर दिया। रानी भी बच गयी, कश्मीर भी बच गया और देश का धर्म भी बच गया। रानी की लड़ाई स्वतंत्रता की लड़ाई थी और उसे इसी रूप में सम्मान मिलना चाहिए। कोटा रानी को और उसकी वीरता को, उसकी कूटनीति को और देशभक्ति को बार-बार नमन।

क्रमश:

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