बाइडेन जिनपिंग की बैठक में क्यों नहीं उठा भारत का मुद्दा

 अभिनय आकाश

जिनपिंग और बाइडेन के बीच करीब साढ़े तीन घंटे की बातचीत का क्या नतीजा निकला ये चीन ने अपने फाइटर्स को ताइवान भेजकर साबित कर दिया। अमेरिका एक सुपर पावर है और चीन सुपर पावर बनने की ख्वाहिश लिए है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से एक टकराव रहा है।

एक दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के नेता हैं, तो दूसरा अपने देश का सबसे ताकतवर नेता है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के बीच तीन घंटे चौबीस मिनट तक वर्चुअल मीटिंग हुई। जिनपिंग जिस रसूख का ख्वाब देखते हैं। जिस मुल्क की ताकत की बराबरी में चीन को लाने का लक्ष्य रखते हैं। जिस हैसियत को पाने के लिए दिन रात हथियारों की टेस्टिंग करते हैं। उसी शख्स से जिनपिंग की डायरेक्ट बातचीत हुई। लेकिन जिनपिंग ने बात को संभालने की बजाए और बिगाड़ दिया। जिनपिंग ने एक बार फिर बाइडेन को ताइवान पर धमकाने की कोशिश की है। जिनपिंग और बाइडेन के बीच करीब साढ़े तीन घंटे की बातचीत का क्या नतीजा निकला ये चीन ने अपने फाइटर्स को ताइवान भेजकर साबित कर दिया। अमेरिका एक सुपर पावर है और चीन सुपर पावर बनने की ख्वाहिश लिए है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से एक टकराव रहा है। इस मीटिंग को लेकर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं की गई और न ही किसी तरह के संयुक्त बयान के बारे में बात की गई। लेकिन इस मीटिंग को इसलिए भी बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं जिसमें आपसी सहमति बन सकती है। ऐसे में क्या हुआ जिनपिंग और बाइडेन की बैठक में आपको बताते हैं। 

मुलाकात के कूटनीतिक मायने क्या हैं
अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन लोकप्रियता के मामले में लगातार गिरावट वाली ही रेटिंग प्राप्त कर रहे हैं। जिसको लेकर बाइडेन पर जबरदस्त दवाब भी है। ऐसे में बाइडेन की तरफ से वो सारे प्रयास किए जा रहे हैं जिससे उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में इजाफा हो। जिनपिंग के साथ उनकी बातचीच इस लिहाज से अहम रोल निभा सकता है। हालिया कुछ महीनों के घटनाक्रम से ये तो साफ है कि अमेरिका चीन के साथ रिश्तों को सुधारने की चाहत रखता है। जिसकी बानगी बाइडेन प्रशासन की तरफ से की जा रही पहल से भी देखा जा सकता है। वहीं इससे इतर एक सुपरपावर मुल्क की भाषा बोलने वाला चीन लगातार अमेरिका के सामरिक हितों को चुनौती पेश करने में लगा है। 
बाइडन को ‘पुराना मित्र’ बताया 
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुखातिब होते हुए कहा कि हमने बहुत  समय एक दूसरे से बात करते हुए बिताया है। मेरी आशा है कि आज शाम भी हम बेबाक बातचीत कर पाएंगे। शी ने जवाब में दोस्ताना सुर में कहा कि ये सामने बैठकर बात करने जैसा तो नहीं है लेकिन मुझे अपने पुराने दोस्त से मिलकर बहुत खुशी हुई है। शी ने बाइडन को ‘पुराना मित्र’ बताया और कहा, ‘राष्ट्रपति बाइडन, मैं आपके साथ काम करने, आपसी सहमति बनाने, सक्रिय कदम उठाने और चीन-अमेरिका के संबंधों को सकारात्मक दिशा में ले जाने को तैयार हूं।  
ताइवान पर चीन ने धमकाया, दखल को आग से खेलना बताया
जिनपिंग अपनी बात कहने में एक हद तक सफल रहे। खासकर ताइवान मुद्दे पर उन्‍होंने बाइडन प्रशासन को अपनी नीति साफ कर दी। ताइवान के सवाल पर चीन ने बाइडेन को आगाह किया कि अगर ताइवान ने किसी भी तरह से अपनी स्वाधीनता की तरफ कदम बढ़ाने की कोशिश की तो ये चीन के लिए उस लाल लकीर को लांघने सरीका होगा। जो चीन ने कार्रवाई करने के लिए खींच रखी है। चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार राष्ट्रपति शी ने बाइडेन को साफ बता दिया कि अगर अमेरिका ताइवान की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है तो वो अपने हाथ जला बैठेगा। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कड़ा रूख अपनाते हुए कहा कि चीन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा हितों की निश्चित रूप से रक्षा करेगा। इसके साथ ही ताइवान को लेकर चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कोई भी आग से खेलेगा वह जल जाएगा। जिनपिंग ने कहा कि चीन का उदय रोका नहीं जा सकता।  

ताइवान में किसी भी उकसावे वाली हरकत का अमेरिका करेगा विरोध
जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति ने शी को आश्वस्त किया कि अमेरिका अभी भी अपनी वन चाइना पॉलिसी पर कायम है। जिसके अनुसार अमेरिका एक सार्वधौमिक चीन देश को मान्यता देता है। लेकिन इसके साथ ही अमेरिका ने ये भी साफ कर दिया कि वो ताइवान में यथास्थिति और शांति को कमजोर करने वाली किसी भी हरकत का पुरजोर विरोध करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका का ये बयान ताइवान को समझाने के लिए दिया गया है कि वो अपनी स्वतंत्रता की घोषणा न करे। लेकिन उससे ज्यादा जरूरी संदेश चीन के लिए था कि वो ताइवान पर हमला करने का विचार छोड़ दे। 
इस साल तीसरी वार्ता
शी और बाइडन के बीच यह तीसरी वार्ता है। इससे पहले, दोनों नेताओं ने सितंबर में फोन पर लंबी बातचीत की थी। अमेरिका और चीन के बीच मौजूदा तनावपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि में दोनों नेताओं ने यह बैठक की। बाइडन उत्तर पश्चिमी चीन में उइगर समुदाय के लोगों के मानवाधिकारों के हनन, हांगकांग में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों को कुचलने, स्व-शासित ताइवान के खिलाफ सैन्य आक्रामकता सहित कई मुद्दों पर बीजिंग की आलोचना करते रहे हैं। वहीं, शी के अधिकारियों ने बाइडन प्रशासन पर निशाना साधते हुए, उस पर चीन के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए हैं। 
बाइडेन-शी की बैठक को भारत कैसे देख रहा है?
अमेरिका-चीन वार्ता प्रक्रिया पर भारत की बहुत करीब से नजर बनी हुई थी। भारत और चीन पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से सीमा गतिरोध का सामना कर रहे हैं। भारत क्वाड का हिस्सा है और अमेरिका के साथ इसका रणनीतिक संरेखण बहुत स्पष्ट रहा है। वहीं ट्रम्प हो या बाइडेन दोनों के शासनकाल के दौरान अमेरिकी प्रशासन ने चीन को एक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा है। लेकिन चीन और अमेरिका की वार्ता में भारत का जिक्र नहीं हुआ। हालांकि, सीमा विवाद के बड़े दायरे में भारत अप्रत्‍यक्ष रूप से शामिल हो सकता है। बाइडन ने सीमा विवाद का जिक्र किया था, लेकिन उन्‍होंने भारत का नाम नहीं लिया। जिनपिंग ने भी भारत का जिक्र नहीं किया। 
अमेरिका और चीन के संबंधों का इतिहास
चीन और अमेरिका के बीच रिश्तों की शुरुआत 1970 में पाकिस्तान के जरिए शुरू हुई। इसे ‘पिंग-पॉन्ग डिप्लोमेसी’ भी कहा जाता है। इसमें अमेरिका की टेबल-टेनिस टीम चीन गई थी। इसके बाद 1972 में राष्ट्रपति निक्सन चीन की आठ दिनों की यात्रा पर गए। इसके सात साल बाद दोनों देशों के बीच पूरी तरह से कूटनीतिक संबंध स्थापित हो गए। अमेरिकी डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 636 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापारिक समझौता चीन के साथ किया। यह पूरी तरह से चीन के पक्ष में झुका हुआ था।

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