किसी पुस्तक में लेखक की बिना सहमति के किया गया संशोधन परिवर्तन कितना उचित ?

कुछ समय पूर्व कुरान की कुछ आयतों को हटाने के लिए श्री वसीम रिजवी द्वारा न्यायालय के द्वार खटखटाने पर देश भर में चर्चा का माहौल बना था। एक बार ओस्ट्रेलियन ब्रोडकास्टिंग कोर्पोरेशन को दिए एक इन्टरव्यू में तसलीमा नसरीन ने कहा था कि इस्लाम महिलाओं के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करता है और यदि वे सम्मान के साथ जिना चाहती है तो उन्हें इस्लामिक कानूनों परे/बाहर रहना पड़ेगा। साथ ही यह भी कहा कि कुरान में “संशोधन” की आवश्यकता है। पूर्व भी दि. 9 मई 1994 के The Statesman में छपे एक साक्षात्कार में तसलीमा ने कहा था, “मैं कुरान में सामान्य परिवर्तनों के पक्ष में नहीं हूँ। इससे कुछ लाभ नहीं होगा। कुरान पूरी तरह से संशोधित (thoroughly revised) होना चाहिए।”

सुविख्यात लेखक-चिंतक श्री राम स्वरूप जी कुरान या किसी भी अन्य पुस्तक में लेखक की अनुमति के बिना संशोधन/परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे। अपनी पुस्तक Woman in Islam में इस विषय पर अपना मत स्पष्ट करते हुए वे लिखते है कि, “पहले, केवल मूल लेखक को ही अपनी पुस्तक में संशोधन या शुद्धिकरण (काट-छांट) करने का अधिकार होता है। दूसरे, कुरान जैसी किताब के पाठकों को उसे मूल रूप में पढने का पूरा अधिकार है।”

वे आगे लिखते है, “मेरा मानना है कि कुरान की पुनर्व्याख्या (re-interptretation) या उसमें संशोधन (revision) की कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु कुरान की समीक्षा होनी चाहिए और उसका पुनर्परीक्षण (re-examine) और पुनर्मूल्यांकन (reapparise) होना चाहिए। कुरान के पुनर्लेखन की भी कोई आवश्यकता नहीं है; कुरान का आलोचनात्मक मस्तिष्क औए सचेत हृदय से पुनर्पठन (re-reading) होना चाहिए… इसकी और अधिक व्यापक रूप से चर्चा होनी चाहिए। इसकी केवल प्रशंसा ही होनी चाहिए इस आग्रह का बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई स्थान नहीं।” (Woman in Islam, पृ. vii-viii)

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