चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति से भारत कैसे इससे निपटेगा

 अभिनय आकाश

चीन काफी लंबे समय से भारत को हिन्द महासागर में घेरने के प्रयास में लगा है। जिसके लिए वो एक योजना पर काम कर रहा है जिसे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है। हालांकि स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स एक पौधा होता है जो मोतियों की माला के समान होता है।

माला क्या होती है? सीधा और सरल जवाब है- एक अलंकारिक वस्तु, जो फूलों से या अन्य चीजों मसलन पत्ती, कागज आदि से बनायी जाती है। यूं तो मालाएं कई प्रकार की होती हैं; जैसे फूलों की, रत्नों की, बीजों की एवं धातुओं की आदि। लेकिन मोतियों की माला का एक पौधा होते हैं, जिसे अंग्रेजी में स्ट्रिंग ऑफ प्लर्स कहते हैं जो अपने नाम के अनुरूप लगभग गोलाकार, छोटे मटर के आकार के पत्तों द्वारा आसानी से पहचाने जा सकते हैं। पत्तियों के तने पर उगते हैं, जो सुंदर ढंग से प्लांटर्स और हैंगिंग बास्केट के ऊपर फैल जाते हैं। लेकिन आज हम बात स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नामक पौधे की नहीं बल्कि चीन की एक नीति, एक योजना की करेंगे, आप कहेंगे, कमबख्त, हर जगह घुसा चला आता है और कुछ न कुछ करता ही रहता है। चीन की इस योजना को मोतियों की माला, स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है। आपको ये लगता होगा कि चीन हमेशा अपनी सीमा से आगे बढ़कर बॉर्डर वाले इलाकों के जरिये भारत में कब्जा जमाना जमाना चाहता है। लेकिन ये अकेला ऐसा इलाका नहीं है जहां से चीन भारत को घेरने की कोशिश करता है।

चीन काफी लंबे समय से भारत को हिन्द महासागर में घेरने के प्रयास में लगा है। जिसके लिए वो एक योजना पर काम कर रहा है जिसे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है। चीन भारत को इसी माला के तहत दक्षिण दिशा में हिन्द महासागर में जगह-जगह से घेरने का प्लान बना रहा है। उसकी मंशा है कि ऊपरी सिरे से पहले ही चीन और पाकिस्तान की उपस्थिति है जबकि नीचे के हिस्से में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों के सहारे नौसेना के जरिये भारत को घेरा जाए। हम एक-एक करके आज सभी देशों के रास्ते चीन के जाल को इस विश्लेषण के माध्यम से आपके लिए डिकोड करेंगे। साथ ही आपको बताते हैं कि भारत कैसे इस खतरे से निपटेगा।  
सबसे पहले आपको बताते हैं कि आखिर क्या है स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स 
दक्षिणी  छोर पर हिन्द महासागर के जरिए चीन भारत को घेरना चाहता है। भारत को घेरने की कोशिश में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों का इस्तेमाल कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हंबनटोटा, बांग्लादेश के चिटगोंग पोर्ट, म्यांमार का क्यौकप्यू पोर्ट,  मालदीव के फेयधूफिनोल्हु द्वीप को चीन ने अपना बेस बनाया। भारत को घेरने की इस नीति को चीन स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का नाम देता है। चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति उसकी उसी सिल्क रूट का हिस्सा है जिसे वो बेल्ट एंड रोड एनिसिएटिव का नाम देता है। कंबोडिया से शुरू होकर म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान से होते हुए ये रास्ता सुडान तक जाता है। अगर आप इस रास्ते को जोड़ते हैं तो ये साफ तौर पर भारत को घेरता हुआ दिखाई पड़ता है। भारत को घेरने की रणनीति के तहत ही चीन इन देशों के पोर्ट और द्वीप पर अपने बेस बना रहा है। 

कब दुनिया के सामने खुली चीन की पोल
‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’  का जिक्र आज से करीब 16 साल पहले (2005 में) अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय ने ‘एशिया में ऊर्जा का भविष्य’ नाम की एक खुफिया रिपोर्ट में किया था। पेंटागन की इस रिपोर्ट में चीन द्वारा समुद्र में तैयार किए जा रहे ‘मोतियों’ का विस्तृत विवरण दिया गया था। ये समुद्र में पाए जाने वाले मोती नहीं बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का-स्ट्रैट, बंगाल की खाड़ी और अरब की खाड़ी तक (यानि पूरे हिंद महासागर में) सामरिक ठिकाने (बंदरगाह, हवाई पट्टी, निगरानी-तंत्र इत्यादि) तैयार करना था। हालांकि उस वक्त इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ये ठिकाने अपने ऊर्जा-स्रोत और तेल से भरे जहाजों के समुद्र में आवागमन की सुरक्षा के लिए तैयार कर रहा है। लेकिन जरुरत पड़ने पर इन सामरिक-ठिकानों को सैन्य-जरुरतों के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है।
पाकिस्तान
चीन की योजना का सबसे अहम रास्ता पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट है जहां से सीपीईसी सड़क जा रही है। चीन को ये पता है कि उसके जितने भी व्यापार होते हैं वो समुद्री रास्ते से होते हैं। इसलिए चीन सीपीईसी का सहारा लेता है। सीपीईसी इतना खर्चीला प्रोजक्ट है जिसने पाकिस्तान की जीडीपी को चौपट कर दिया। चीन की मंशा भी ऐसी ही थी क्योंकि गरीब पाकिस्तान उसका गुलाम बनकर रहेगा। ग्वादर पोर्ट बलूचिस्तान में आता है, जिसे अशांत क्षेत्र माना जाता है। चीन न केवल ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से पाकिस्तानी नौसेना की सहायता करेगा, बल्कि  बंदरगाह का उपयोग करके टकराव की स्थिति में आक्रामण भी कर सकता है। पेंटागन की एक रिपोर्ट ने भी इससे पहले पाकिस्तान में एक पूर्ण नौसैनिक अड्डा बनाने की मंशा को लेकर खुलासा किया था। 
जिबूती 
जिबूती में चीन ने अपना नेवल बेस बना लिया है। ये चीन के बाहर विदेश में उसका पहला नेवल बेस है। फरवरी 2016 में चीन ने इस पर काम शुरू किया था। भारत के दाहिने ओर अरब सागर के पास जिबूती स्थित है। लाल सागर के किनारे बसे इस देश को चीन भारत को घेरने की अपनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की नीति के शुरुआत के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। यहां अपने नेवल बेस को बनाने के लिए चीन ने दुनिया के सामने बहाने के तौर पर यूएन पीस किपिंग मिशन और एंटी पॉरेसी ऑपरेशन का नाम दिया है। चीन ने कहा है कि इस बेस से वो मानवीय सहायता के मिशन को अंजाम देगा। 

मालदीव
चीन पर भरोसा करना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसकी ये योजना जिबूती तक ही सीमित नहीं है। मालदीव में अब्दुल्ला यामीन की चीन समर्थित सरकार थी। लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा था। उनके कार्यकाल के दौरान मालदीव के फेयधूफिनोल्हु द्वीप में उसने अपना मिलिट्री बेस बना लिया है। 2066 तक के लिए मालदीव की सरकार से चीन ने इस द्वीप को 4 मिलियन डॉलर की लीज पर लिया हुआ है। चीन के अधिकार में आने के बाद से इस द्वीप के आकार में 38 हजार स्क्वायर मीटर से एक लाख स्क्वायर मीटर की बढ़ोतरी हुई है। चीन ने कहा है कि ये उसका अधिकार है कि वो इस द्वीप का कैसे प्रयोग करता है। अगर चीन का ये मिलिट्री बेस पूरी तरह से काम करने लगता है तो हिन्द महासागर में इस मिलिट्री बेस की दूरी लक्ष्यद्वीप से केवल 900 और भारत की मुख्य भूमि से 1 हजार किलोमीटर की दूरी पर होगा।  
म्यांमार
म्यांमार के क्याकप्यू बंदरगाह में चीन की मौजूदगी है। बंगाल की खाड़ी में स्थित बंदरगाह ने चीन को एक वाणिज्यिक समुद्री सुविधा प्रदान की है जिसका उपयोग संघर्ष के समय एक सैन्य सुविधा के रूप में किया जा सकता है। चीन ने यहां काफी निवेश किया है और क्यायुकु और कुनमिंग को जोड़ती 2400 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन इसका एक उदाहरण है। भारतीय तटों के निकट एक अन्य चीनी उपस्थिति कोको द्वीप समूह में है। कोको द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उत्तर में स्थित हैं और संघर्ष के समय रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चीन के पास कथित तौर पर वहां एक सैन्य अड्डा भी है।

बांग्लादेश
बांग्लादेश में चटगांव बंदरगाह के विकास में भी चीन ने आर्थिक मदद मुहैया कराई। ये बंदरगाह बंगाल की खाड़ी के तट पर है। वह इसपर कब्जे से समुद्री जाल बिछाना चाहता है। चीन ने बांग्लादेश में बहुत निवेश किया है और बांग्लादेश और म्यांमार दोनों ओबीओआर की उप-परियोजना, बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआईएम) के महत्वपूर्ण बिंदु हैं। चीन द्वारा बांग्लादेश को चटगांव के पास नौसैनिक अड्डे की अनुमति देने के लिए दबाव डालने की खबर भी सामने आई। 
श्रीलंका 
भारत के श्रीलंका के साथ सदियों से मजबूत संबंध रहे हैं, चीन ने श्रीलंका की धरती में भी अपने पैर जमा लिए। चीनी कंपनी ने श्रीलंका के दक्षिणी-पूर्वी हिस्से में एक बंदरगाह हंबनटोटा विकसित किया है और श्रीलंका सरकार ने भी चीनी कंपनी को इसके नियंत्रण की अनुमति दी है। पिछली राजपक्षे सरकार ने चीनियों को इस बंदरगाह के निर्माण की अनुमति दी थी और संभावना है कि वह चीन को यहां एक नौसैनिक अड्डा बनाने की अनुमति दे सकती है। चीन इस देश को तकनीकी और वित्तीय सहायता भी मुहैया करा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर वह भारत के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल करने दे सके।
भारत ने चीन का मुकाबला करने की क्या योजना बनाई
भारत ने दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्‍यवस्‍था को साथ लेकर चलने के मकसद से एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी को लॉन्‍च किया था। इसके अलावा वियतनाम, दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया, थाइलैंड और सिंगापुर जैसे देशों के साथ अहम सैन्‍य अड्डे और रणनीतिक समझौतों को अंजाम दिया गया है ताकि चीन को जवाब दिया जा सके। भारत ने म्‍यांमार के साथ नौसैनिक साझेदारी शुरू की है। इसके तहत म्‍यांमार की नौसेना को इंडियन नेवी की तरफ से ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि क्षेत्र में भारत की मौजूदगी बढ़ सके। भारत म्यांमार के सिटवे पोर्ट पर अपना व्यापारिक-बंदरगाह तैयार करने लगा है। देश के सबसे दूरस्थ राज्य, मिजोरम को कोलकता से जोड़ने के लिए वर्ष 2008 में भारत ने म्यांमार के साथ कालाडान प्रोजेक्ट के लिए करार किया। ये बंदरगाह कालडन नदी के जरिए भारत के मिजोरम से जुड़ जायेगा ताकि वहां से कार्गो-जहाज आवागमन कर सके। पाकिस्तान के ग्वादर में पोर्ट बना रहा है तो भारत भी ईरान के चाहबर-पोर्ट बनाने में जुट गया है। चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के मध्य में स्थित है। यहां पर भारत के पश्चिमी तट से आसानी से पहुंचा जा सकता है। मालदीव पोर्ट के पास ही यहां पर मिलिट्री रडार लगा दिया। जिसकी वजह से यहां पानी के जहाज, नौसेना के जहाज जितनी भी गतिविधियां होती हैं उस पर नजर रखी जा सकती है। मालदीव सेशेल्‍स और ओमान में भी भारतीय नौसेना सक्रिय हो रही है. सिंगापुर के साथ साल 2017 में एक कॉन्‍ट्रैक्‍ट साइन किया गया था।

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