ईडब्ल्यूएस मामले में कांग्रेस हटी पीछे, अब भाजपा कर रही है लाभ लेने की कोशिश

 अभिनय आकाश

सवर्णों को आरक्षण देने का कांग्रेस का प्रोजोक्ट अगली सरकार के साथ भी कायम रहा। मनमोहन सिंह की सरकार सत्ता में आई। जिसने 10 जुलाई 2006 को मेजर जनरल (रिटायर्ड) एसआर सिन्‍हो की अगुवाई में तीन सदस्‍यीय आयोग का गठन किया। आयोग ने 2010 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। लेकिन इस आयोग की रिपोर्ट पर यूपीए की सरकार ने अमल करने के बारे में सोचा भी नहीं।

सुप्रीम कोर्ट में एक मामला चल रहा है। मेडिकल बोर्ड में भर्ती वास्ते होने वाली परीक्षा नीट में आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर। 26 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मामले को लेकर अपना जवाब दाखिल किया। जिसमें कहा गया कि कोई आठ लाख रुपये सालाना या उससे कम कमाता है तो वो कमजोर श्रेणी या ईडब्ल्यूएस श्रेणी में गिना जाएगा। केंद्र ने ये भी बताया की आठ लाख रुपये की लिमिट सेट करने वाला फैसला सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट पर आधारित है। मंडल कमीशन की सिफारिश लागू करने के बाद से ही आर्थिकर आधार पर आरक्षण देने की जमीन कांग्रेस द्वारा तैयार की गई थी लेकिन उसे कभी अमल में लाने की कोशिश यूपीए शासनकाल के दौरान नहीं हुई। जिसे अब वर्तमान दौर में बीजेपी इस्तेमाल कर रही है। ऐसे में आज के इस विश्लेषण में जानेंगे कि आखिर क्या है सिन्हो आयोग, इसे बनाने की क्यों पड़ी थी जरूरत और इसकी सिफारिशों को क्यों अमल में नहीं लाया गया था। 

वर्तमान में क्यों चर्चा में आया 
वैसे तो ये मामला नीट से जुड़ा है लेकिन इसको जानने के लिए 2019 में आपको लिए चलते हैं। इस साल केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की गई थी। फिर केंद्र सरकार ने 29 जुलाई 2021 को नीट परीक्षा में आरक्षण को लेकर एक फैसला लिया। केंद्र सरकार ने कहा कि अंडर ग्रैजुएट या पोस्ट ग्रैजुएट मेडिकल कॉलेज में ओबीसी समुदाय को 27 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा। इस फैसले के सामने आने के बाद नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। याचिका लगाकर कहा कि केंद्र सरकार का फैसला सुप्रींम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि किसी भी स्थिति में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं होनी चाहिए। ये भी कहा गया कि सरकार ओबीसी वाला क्राइटेरिया ईडब्ल्यूएस पर कैसे लागू कर सकती है। 21 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा कि ईडब्ल्यूएस कोटा निर्धारित करने के लिए कोई मानदंड स्थापित किए गए। ईडब्ल्यूएस कोर्टा के निर्धारण में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र को ध्यान में रखा गया। जिसको लेकर केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया। सरकार ने ईडब्ल्यूएस के लिए आठ लाख के क्राइटेरिया सेट करने को सही ठहराया है। केंद्र की तरफ से कहा गया है कि सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट पर ये फैसला लिया गया है। केंद्र ने कहा कि आठ लाख की सीमा बांधना संविधान 14,15 और 16 के अनुरूप है। 

मंडल कमीशन
 साल 1990 जिसे भारतीय सामाजिक इतिहास में ‘वाटरशेड मोमेंट’ कहा जा सकता है। अंग्रेज़ी के इस शब्द का मतलब है- वह क्षण जहां से कोई बड़ा परिवर्तन शुरू होता है। हाशिए पर पड़े देश के बहुसंख्यक तबके से इतर जातीय व्यवस्था में राजनीतिक चाशनी जब लपेटी गई तो हंगामा मच गया। समाज में लकीर खींची और जातीय राजनीति के धुरंधरों के पांव बारह हो गए। 7 अगस्त 1990, तत्तकालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान संसद में किया तो देश जातीय समीकरण के उन्माद से झुलसने लगा। मंडल कमीशन की सिफारिश के मुताबिक पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरी में 27 फीसदी आरक्षण देने की बात कही गई। जो पहले से चले आ रहे अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलने वाले 22.5 फीसदी आरक्षण से अलग था। वीपी सिंह के इस फैसले ने देश की सियासत बदल दी। सवर्ण जातियों के युवा सड़क पर उतर आए। आरक्षण विरोधी आंदोलन के नेता बने राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया। कांग्रेस पार्टी ने वीपी सरकार के फैसले की पुरजोर मुखालफत की और राजीव गांधी मणिशंकर अय्यर द्वारा तैयार प्रस्ताव लेकर आए, जिसमें मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज किया गया। जिस मंडल कमीशन लागू करने के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने वीपी सिंह सरकार के खिलाफ मतदान किया और वो सरकार गिर गई। उसके बाद आई नरसिंह राव सरकार 
इंदिरा साहनी केस 
आरक्षण पर बहस हो और इस मामले का जिक्र न हो ऐसा हो नहीं सकता है। इंदिरा साहनी दिल्ली की पत्रकार थी और वीपी सिंह ने मंडल कमीशन को ज्ञापन के जरिये लागू किया था। इंदिरा साहनी इसके वैध होने को लेकर 1 अक्टूबर 1990 को सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। तब तक वीपी सिंह सत्ता से जा चुके थे और चंद्रशेखर नए प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन उनकी सरकार ज्यादा दिन चली नहीं। 1991 के चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। 25 सितंबर 1991 को राव ने सवर्णों के गुस्से को शांत करने के लिए आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर दिया। नरसिम्हा राव ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था एक ज्ञापन के जरिये ही लागू की थी। इन दोनों ज्ञापनों पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संवैधानिक पीठ बनी। जिसके सामने आरक्षण के आधार, संविधान के अनुच्छेद 16 (4) और 16 (1) और 15 (4) व 16 (1) के पछड़ा वर्ग की समानता जैसे सवाल थे। बता दें कि संविधान के 14 से लेकर 18 तक के अनुच्छेद में जो मजमून लिखा है उसे हम समानता के अधिकार के नाम से जानते हैं। इसमें लिखा गया है कि सरकार जाति, धर्म या लिंग के आधार पर किसी भी किस्म का भेदभाव नहीं कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इंद्रा साहनी केस में फैसला देते समय इस आरक्षण को खारिज कर दिया। नौ जजों की बेंच ने कहा था कि आरक्षित स्थानों की संख्या कुल उपलब्ध स्थानों के 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इसी ऐतिहासिक फैसले के बाद से कानून बना था कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

मनमोहन सरकार ने बनाया आयोग
सवर्णों को आरक्षण देने का कांग्रेस का प्रोजोक्ट अगली सरकार के साथ भी कायम रहा। मनमोहन सिंह की सरकार सत्ता में आई। जिसने 10 जुलाई 2006 को मेजर जनरल (रिटायर्ड) एसआर सिन्‍हो की अगुवाई में तीन सदस्‍यीय आयोग का गठन किया। आयोग ने 2010 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। लेकिन इस आयोग की रिपोर्ट पर यूपीए की सरकार ने अमल करने के बारे में सोचा भी नहीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राजनीतिक नुकसान के डर से रिपोर्ट पर मौन साधते हुए इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था, जबकि उनकी यूपीए सरकार के पास कार्यकाल के 4 साल बचे थे।
आयोग बनाने के पीछे मकसद
जुलाई 2006 में सिन्हो आयोग के गठन का बड़ा कारण चार महीना पहले यानी 5 अप्रैल 2006 को तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण लागू करने की घोषणा थी। 2005 में ही संविधान संशोधन को जमीन पर उतारने की घोषणा की थी। लेकिन इसके खिलाफ भारी विरोध खड़ा हो गया। उत्तर भारत के कई शहरों में डॉक्टरों और मेडिकल के छात्र इसको लेकर सड़कों पर उतर आए और यहां तक की विरोध स्वरूप मरीजों का इलाज भी बंद कर दिया गया था। जिस वजह से दवाब में आकर कांग्रेस की तरफ से सवर्णों के गुस्से पर मरहम लगाने के लिए आयोग बनाने वादा दांव खेल गया। लेकिन इसकी रिपोर्ट और सुझाव वर्षों तक धूल फांकते  रहे। 
आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
आयोग की रिपोर्ट में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग  के लिए एक श्रेणी देने की सिफारिश की थी, जिसको ओबीसी या अन्य पिछड़ा वर्ग के समान लाभ मिलेगा। लाभार्थियों की पहचान के लिए जिन आधार को शामिल किया गया उसमें पूछा गया कि क्या वे करों का भुगतान करते हैं, वे एक वर्ष में कितना कमाते हैं और कितनी भूमि के मालिक हैं? आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ राज्यों में सामान्य श्रेणी और ओबीसी की निरक्षरता दर ‘लगभग समान’ है, हालांकि सामान्य जातियों में अशिक्षा की स्थिति एससी/एसटी/ओबीसी की तुलना में कम है। जबकि सामान्‍य वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति एससी-एसटी से बहुत आगे थी और ओबीसी से बेहतर थी। इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में एक जगह ये लिखा है कि सवर्ण (जनरल कैटेगरी) गरीबों की पहचान करने के लिए आय सीमा वही रखी जा सकती है, जो ओबीसी नॉन क्रीमी लेयर की सीमा है। 

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