बांग्लादेश में हिंदू संहार गत कई दशकों से सतत जारी विश्व की सबसे बड़ी घटना

शंकर शरण।

बांग्लादेश में दुर्गापूजा पंडालों का विध्वंस, मंदिरों पर हमले और हिंदुओं की हत्याओं पर दुनिया के अधिकांश लोग इसके बावजूद अनभिज्ञ हैं कि यह सब पहली बार नहीं हुआ। बांग्लादेश में हिंदू संहार गत कई दशकों से सतत जारी विश्व की सबसे बड़ी घटना है। इसे नरसंहार कहना अतिरंजना नहीं। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन, 1948 में नरसंहार (जेनोसाइड) परिभाषित है। इस प्रस्ताव की धारा-दो के अनुसार जेनोसाइड का अर्थ है किसी राष्ट्रीय, नस्ली, धार्मिक या जातीय समूह के विरुद्ध ऐसा काम जो उसे पूर्णत:/अंशत: नष्ट करने की क्षमता रखता हो। प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि किसी समूह विशेष पर ऐसी स्थितियां लादना, जिनसे उसका पूर्णत:/अंशत: भौतिक नाश करने की मंशा हो। साफ है कि हथियारों से किसी समूह को सीधे मार डालने के अलावा किसी समूह के विरुद्ध ऐसी कानूनी, आर्थिक, सांस्कृतिक व्यवस्थाएं करना भी नरसंहार है, जिनसे उसका क्रमश: नाश निश्चित हो। इस दृष्टि से बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार अभूतपूर्व और सबसे बड़ा है। यह नि:शब्द और धीमा रहा है, इसलिए भी बाहरी दुनिया इससे अनजान रही है।

यह विडंबना है कि 1971 में भारतीय मदद से पाकिस्तानी क्रूरता से मुक्त होकर बने बांग्लादेश ने भी हिंदुओं को वंचित करना जारी रखा। जैसे 1974 में बना वेस्टेड प्रापर्टी एक्ट। इसका अर्थ है कि जो हिंदू बांग्लादेश छोड़कर चले गए या जिन्हें सरकार ने शत्रु कह दिया, उनकी जमीन सरकार लेकर जिसे चाहे, दे देगी। व्यवहार में इसका यह उपयोग भी हुआ कि किसी हिंदू को मार-धमका कर भगा दिया गया या उसे देश के लिए शत्रुवत कहकर उसके परिवार की संपत्ति छीनकर किसी मुसलमान को दे दी गई, चाहे परिवार का कोई एक ही व्यक्ति बाहर गया हो या उसे शत्रु कहा गया हो। किसी कत्ल कर दिए गए हिंदू की संपत्ति भी ले ली जाती है, जिसका शव न मिला हो।

1988 में संविधान संशोधन कर इस्लाम को बांग्लादेश का राजकीय मजहब बना दिया गया। इससे हिंदुओं की स्थिति कानूनन भी नीची हो गई। उनके विरुद्ध हिंसा, जबरन मतांतरण, संपत्ति छीनने, दुष्कर्म आदि के मामले बढ़ गए। इन्हीं हथकंडों का वर्णन प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपनी पुस्तक ‘लज्जा’ में किया, जिससे उन पर मौत का फतवा आया। तबसे उन्हें बाहर भागकर छिप कर रहना पड़ा रहा है। उन्हें कोसा गया, जबकि वह वामपंथी लेखिका रही हैं। उन्हें इसीलिए कोसा गया कि सावधानी से छिपाई गई लज्जा को उन्होंने बाहर ला दिया। उनके बाद अमेरिकी शोधकर्ता रिचर्ड बेंकिन की पुस्तक ‘ए क्वाइट केस आफ एथनिक क्लींसिंग-द मर्डर आफ बांग्लादेशी हिंदू’ ने उसका प्रामाणिक आकलन किया।

सतत संहार एवं उत्पीड़न से ही बांग्लादेश की हिंदू आबादी नाटकीय रूप से गिरी है। उस क्षेत्र में करीब 30 प्रतिशत हिंदू थे, जो 1971 तक 20 प्रतिशत हो गए। आज वे मात्र आठ-नौ प्रतिशत बचे हैं। इस लुप्त आबादी का एक-दो प्रतिशत ही भागकर बाहर गया। शेष मारे गए या छल-बल से मतांतरित करा लिए गए। यह केवल इस्लामी संगठनों, पड़ोसियों, बदमाशों, राजनीतिक दलों द्वारा ही नहीं, सरकारी नीतियों से भी हुआ। कल्पना कीजिए कि भारत सरकार गैर हिंदुओं की संपत्ति लेकर उसे हिंदुओं को दे सकने का कानून बनाए। तब पूरी दुनिया में आलोचना की कैसी आंधी उठेगी, लेकिन ठीक ऐसा ही कानून बांग्लादेश में मजे से चल रहा है, जबकि उसके दुष्प्रभाव से वहां हिंदुओं का विनाश प्रामाणिक तथ्य है। ढाका विवि के प्रो. अब्दुल बरकत की पुस्तक ‘इंक्वायरी इंटू काजेज एंड कांसीक्वेंसेस आफ डिप्राइवेशन आफ हिंदू माइनारिटीज इन बांग्लादेश’ में इसके विवरण हैं।

वैश्विक स्तर पर भी इतनी बड़ी आबादी का कहीं और विनाश नहीं हुआ है। हिटलरी होलोकास्ट ने 60 लाख यहूदियों का सफाया किया था, जबकि बांग्लादेश में करोड़ों हिंदू खत्म किए जा चुके हैं-क्रमश: संहार और जबरन मतांतरण द्वारा। यह सब इतना बेरोकटोक इसीलिए चल रहा, क्योंकि भारतीय शासकों, दलों और मीडिया ने चुप्पी रखी। इसीलिए उस पर पश्चिमी देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कभी-कभार मरियल बयान आते हैं। फलत: बांग्लादेश में जिहादी और सरकारी लोग इस भरोसे रहते हैं कि कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। यदि दुनिया चिंता करती तो वहां स्थिति सुधर सकती थी। कई मामलों में बांग्लादेश बाहरी सहायता पर निर्भर है। वह न्यायोचित वैश्विक दबाव ङोलने की स्थिति में नहीं। बांग्लादेश में आज जो भी हिंदू हैं, वे धीमे संहार के निशाने पर हैं।

बांग्लादेश से भागकर आए हुए हिंदू सबसे अधिक संख्या में बंगाल में रहते हैं। यहां भी उन पर वैसे ही तत्वों का वैसा ही हमला होता रहा है। कई वर्ष पहले रिचर्ड बेंकिन ने कई बस्तियों में जाकर यह प्रत्यक्ष देखा था। सत्ताधारी कम्युनिस्टों और कट्टर इस्लामियों की साठगांठ से कई बार हिंदू शरणार्थियों की पुरानी बस्ती पर कब्जा कर उन्हें पुन: भगा दिया जाता था। मनचाही चीज छीनने के लिए बच्चों, लड़कियों के अपहरण की तकनीक का औजार यहां भी काम आता है। हिंदू-मुस्लिम सम्मिलित आबादी वाले कई गांव धीरे-धीरे पूरी तरह से मुस्लिम गांव में बदल गए। वहां के लावारिस मंदिर इसके संकेत करते हैं। गत विधानसभा चुनावों के बाद भी यह हुआ। यानी बांग्लादेश सरीखा हिंदू विनाश भारत तक आ चुका है, पर भारत के प्रभावशाली लोग बांग्लादेश हिंदुओं और बंगाल में भी उत्पीड़न सह रहे हिंदुओं के प्रति उदासीन हैं।

भारत की उदासीनता से ही यूरोपीय, अमेरिकी सरकारें और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी इसे महत्व नहीं देतीं। इस प्रकार बंगाल के दोनों भाग में हिंदू क्रमश: प्रताड़ित, अपमानित, मरते, घटते जा रहे हैं। यह प्राकृतिक रूप से नहीं, बहुमुखी जिहाद से हो रहा है। कानूनी और गैरकानूनी, दोनों तरीकों से। बांग्लादेश में हिंदू-विनाश रोकने में भारतीय हस्तक्षेप कारगर हो सकता था अथवा हिंदुओं के सहज जीवन जीने का कोई अन्य प्रबंध हो सकता था, किंतु इस दिशा में कोई कारगर पहल नहीं हुई। फलत: पूरी दुनिया को इसके बारे में नगण्य जानकारी है।

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