वैदिक हिंदू धर्म के लिए इंडोनेशिया से आए शुभ संकेत

बात 1960 के दशक की है। जब देश के प्रधानमंत्री पंडित नेहरु थे। पंडित जी कहने को ‘पंडित’ थे पर धर्मनिरपेक्षता का भूत उन पर इस कदर चढ़ गया था कि स्वयं को ‘दुर्भाग्यवश’ हिंदू मानते थे। उन पर इस्लामिक संस्कृति का रंग चढ़ा था और ईसाइयत के ढंग से जीने को वह अपना सौभाग्य मानते थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा भी ऐसी ही थी। 60 के दशक में वह इंडोनेशिया अर्थात हिंदेशिया की यात्रा पर गए थे। तब वहां के राष्ट्रपति सुकर्णो थे। राष्ट्रपति सुकर्णो ने प्रधानमंत्री नेहरु के सम्मान में बहुत ही भव्य कार्यक्रम का आयोजन कराया। प्रधानमंत्री नेहरू राष्ट्रपति सुकर्णो के साथ एक ऊंचे मंच पर विराजमान थे, तभी वहां रामलीला का मंचन आरंभ हो गया। रामलीला के मंचन पर भारत के धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री नेहरू जी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने मंच पर साथ में बैठे राष्ट्रपति सुकर्णो से पूछ लिया कि -”आप तो मुस्लिम हैं तो फिर यह रामलीला का मंचन क्यों?” तब राष्ट्रपति सुकर्णो ने जो उत्तर दिया उसे सुनकर पंडित नेहरू की आंखें खुली की खुली रह गई थीं। उन्होंने कहा था कि-”नेहरू जी! हमने मजहब बदला है, अपने पूर्वज नहीं बदले, हमारे पूर्वज तो आज भी राम ही हैं।”
   यह कितना सुखद समाचार है कि अपने पूर्वजों के प्रति पूर्णतया निष्ठावान रहा देश आज भी अपने आपको आर्य वैदिक संस्कृति के साथ जोड़कर गर्व और गौरव की अनुभूति करता है। उसी के चलते अब वहाँ के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्ण की सुकमावती
ने हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया है। उन्होंने मुस्लिम मजहब छोड़कर आर्य हिंदू वैदिक धर्म अपना लिया है।
सुकमावती हिंदू धर्मशास्त्र के सभी नियमों और अनुष्ठानों की भी समझ रखती हैं। इंडोनेशिया के पूर्व राष्‍ट्रपति सुकर्णो की बेटी सुकमावती सुकर्णोपुत्री के धर्म परिवर्तन के लिए बाली के सुकर्णो सेंटर हेरिटेज एरिया में एक पारंपरिक कार्यक्रम किया गया। इसमें सुधी वदानी प्रक्रिया के द्वारा सुकमावती हिंदू धर्म में सम्मिलित हुईं।
वास्तव में आर्य वैदिक परंपराओं के प्रति जुड़ाव और आत्मीय लगाव उन्हें अपने पूर्वजों से परंपरा में प्राप्त हुआ था । उन्होंने कभी भी एक आम मुसलमान की तरह हिंदू वैदिक संस्कारों से घृणा नहीं की बल्कि उनके साथ अंतर्मन से जुड़ी रहीं। इतना ही नहीं, उनका सारा देश अपने आपको आर्य वैदिक सभ्यता और संस्कृति से जुड़े रखने पर गर्व और गौरव की अनुभूति करता है।
       1987 में इसी इंडोनेशिया की सरकार ने भारत को अपना  पूर्वज मानते हुए भारत से वैदिक हिंदू साहित्य खरीदने के लिए अपना एक प्रतिनिधिमंडल भारत भेजा। उस समय देश के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी थे और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को उस समय अर्जुन सिंह देख रहे थे। तब उस प्रतिनिधिमंडल को भारत से बिना हिंदू साहित्य खरीदे ही लौटना पड़ गया था। कारण कि हमारे अधिकारियों ने उनसे यह कह दिया था कि आपके ‘ऑर्डर’ में ‘हिंदू साहित्य’ शब्द लगा है और भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां सांप्रदायिक साहित्य विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार भारत में जहां साहित्य को भी सांप्रदायिक बना लिया गया- वहीं इस्लामिक देश इंडोनेशिया को उसी साहित्य की अपेक्षा भारत से थी जो उसे हिंन्देशिया बनाता था और जिसे वह अपनी नई पीढ़ी को समझा कर अपने गौरवपूर्ण अतीत से उसे परिचित कराता।
   भारत की आजादी के बाद जो नेतृत्व भारत में उभरा उसने भारत और भारतीयता से घृणा करने को ही राज्य धर्म स्वीकार किया। यही कारण था कि वह भारत की आत्मा के साथ खिलवाड़ करता हुआ भारत के मानस पुत्रों के साथ भी खिलवाड़ करने से बाज नहीं आया। हिंदेशिया यद्यपि आज मुस्लिम संस्कृति से जुड़ा हुआ देश है , परंतु इसके उपरांत भी वह अपने आपको भारत का मानस पुत्र मानने में कोई संकोच नहीं करता है।
     अब जबकि इंडोनेशिया के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति सुकर्णो की बेटी और पाँचवें राष्ट्रपति मेगावती सोकर्णोपुत्री की बहन सुकमावती सुकर्णोपुत्री ने इस्लाम का त्याग कर दिया है और हिंदू धर्म को अपना लिया है तो क्या ही अच्छा होता कि भारत के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता, परंतु लगता है कि अभी भी भारतवर्ष में कांग्रेसी और कम्युनिस्ट विचारधारा के पत्रकारों की भरमार है। तभी तो धर्मनिरपेक्षता के संभावित खतरे को भांपकर इन लोगों ने इस महत्वपूर्ण समाचार को समाचार पत्रों में प्रमुखता नहीं दी । इस घटना के घटित हो जाने के बाद इंडोनेशिया में 500 साल पुरानी उस भविष्यवाणी के सच साबित होने की बात की जाने लगी है, जिसमें कहा गया था, ”मैं वापस आऊँगा और हिंदू धर्म फिर से लौटेगा।”
    सुकमावती ने कड़ी सुरक्षा के बीच अपने 70वें जन्मदिन पर हिंदू धर्म को आत्मसात किया है। कोविड महामारी के कारण सुधी वदानी रस्म के दौरान लगभग 50 मेहमान ही थे, उसमें से भी अधिकतर परिवार के सदस्य ही थे। इसके लिए बाली में सुकर्णो सेंटर हेरिटेज एरिया में एक पारंपरिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। सुकमावती की दादी न्योमन राय सिरिम्बेन हिंदू बनने के इस फैसले के लिए काफी हद तक वजह बनी हैं। उनकी दादी न्योमन राय सिरिम्बेन भी एक हिंदू हैं, जो बाली की रहने वाली थीं।
    उल्लेखनीय है कि आज इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है। एक समय में यहाँ हिंदू धर्म का बहुत अधिक प्रभाव था। उस समय सारे देश में आर्य हिंदू वैदिक संस्कारों की तूती बोलती थी। बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हर देश की तरह यहां भी जब अपना आतंक फैलाना आरंभ किया तो धीरे-धीरे इंडोनेशिया के मूल स्वरूप को समाप्त किया जाने लगा। धीरे-धीरे इस्लाम जावा और सुमात्रा के द्वीपों में फैल गया और 15 वीं शताब्दी तक समृद्ध हुआ। यहाँ इस्लाम के आगमन के बाद हिंदुओं की संख्या घटने लगी, जिससे देश में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा दे दिया गया। आज भी इंडोनेशिया के हिंदू अपने पूर्वजों विशेष रूप से राजा जयभय और पुजारी सबदापालन की भविष्यवाणियों पर विश्वास रखते हैं।
       सबदापालन इंडोनेशिया के सबसे शक्तिशाली मजापहित साम्राज्य के राजा ब्रविजय पाँचवीं के दरबार में एक सम्मानीय पुजारी थे। जब देश का इस्लामीकरण होना शुरू हुआ और 1478 में ब्रविजय पाँचवीं इस्लाम में परिवर्तित हो गए, तब सबदापालन ने राजा को शाप दिया था। उन्होंने देश में प्राकृतिक आपदा आने और राजनीतिक भ्रष्टाचार का शाप देते हुए 500 साल बाद यहाँ लौटने की कसम खाई थी। साथ ही पुजारी ने इस्लाम के चंगुल से इस देश को मुक्त करने और फिर से यहाँ हिंदू धर्म को मानने वालों की संख्या बढ़ेगी, ऐसी भविष्यवाणी की थी।
   यदि भारतवर्ष की हिंदूवादी शक्तियां और संसार में शांति स्थापित करने के प्रति संकल्पित सज्जन शक्ति इंडोनेशिया की राष्ट्रपति द्वारा किए गए इस ऐतिहासिक निर्णय का सही ढंग से स्वागत और सम्मान करें तो निश्चय ही यह निर्णय एक ऐतिहासिक निर्णय हो सकता है।  जिससे न केवल वैदिक संस्कृति को समझने, मानने और स्वीकार करने का अवसर विश्व के लोगों को प्राप्त होगा अपितु संसार में वास्तविक शांति स्थापित करने में भी सहायता प्राप्त होगी।
   हम भारतवासियों के बारे में यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि हम अपने अतीत के गौरवशाली पक्ष को भी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने में संकोच करते हैं। भारत की कांग्रेसी सरकारों ने धर्मनिरपेक्षता का कुसंस्कार हमारे भीतर इतना भर दिया है कि हमें अपने आपसे ही घृणा होने लगती है । हम अपने आपको या तो कहीं बहुत कमजोर समझते हैं या फिर अपने धर्म को लेकर सशंकित रहते हैं कि हमारा धर्म पूर्णतया अवैज्ञानिक और रूढ़िवादी या जड़तावादी है। इसका एक कारण यह भी है कि भारत की आजादी के बाद भारत के स्कूलों / विद्यालयों में वैदिक सभ्यता संस्कृति की बातें करना या वैदिक दृष्टिकोण से प्रार्थनाएं कराना तक भी सांप्रदायिक माना गया। जबकि इस्लामी या ईसाई परंपरा के अनुसार प्रार्थना कराना धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक अच्छी बात माना गया। उसका परिणाम यह हुआ कि हमारे बच्चे अपने धर्म और अपने देश के गौरवशाली इतिहास से कटते चले गए। जिन लोगों ने यह षड्यंत्र चलाया उनके कारण आज हमारी युवा पीढ़ी में बहुत सारे युवक ऐसे हैं जो अपने धर्म और अपने देश के इतिहास को या तो जानते नहीं हैं या उनसे घृणा करते देखे जाते हैं। इंडोनेशिया की नेता के द्वारा अब जिस दिशा में कदम उठाया गया है, हमें अपेक्षा करनी चाहिए कि उसके परिणाम भारत की युवा पीढ़ी में एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देखने को मिलेंगे। निश्चय ही इस समय इंडोनेशिया ने भारत के लिए शुभ संकेत दिए हैं। उन्हें समझ कर हमें ‘धर्म की सेवा’ के लिए संकल्पित होना चाहिए।
   

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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